आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलाखनिका विवाह । ३७३ ७
ब्याहन आये लखनाको अगुआकार बनाफरराय ५६
आल्हा ऊदन के बारीहन रूपन जानो नाम हमार ॥
ऐपनवारी लै आयन है पावैं नेग आपके द्वार ५७
कीरति गावत रूपनबारी जावैं आल्हाके दरबार ॥
इतना सुनिकै राजा बोले चाहिये नेग काह तब द्वार ५८
रूपन बोले महराजाते चाहैं यही आपके द्वार ॥
दुइघंटाभरि चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ५६
कीरति गावत रूपन जावै होवै जगमें नाम तुम्हार ॥
बारी आवा बघऊदन का द्वारे कठिन कीन तलवार ६०
इतना सुनिकै गंगाधर ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥
जाय न पावै रूपन बारी आरी होय लोहके घाय ६१
इतना सुनिकै रजपूतन ने अपनी खैंचिलीन तलवार ॥
रूपन बारी बेंदुल परते गरुई हाँक दीन ललकार ६२
प्राणपियारे ज्यहि होवैं ना सोई लड़ै आय सरदार ॥
धावा कीन्ह्यो रजपूतनने बेंदुल भली मचाई रार ६३
टापन मारे रजपूतन का काहू दाँतन लेय चबाय ॥
जब मनपावै सो रूपनका तड़पत उड़ा दूरलगजाय ६४
का गति वरणौं तहँ रूपनकौ दूनों हाथ करै तलवार ॥
बड़े लड़ैया बूँदीवाले तेऊ हनैं अपनी वार ६५
दुइ दश पन्द्रह बीसक तीसक गिरिगे समरभूमि मैदान ॥
देखि तमाशा गंगाधर जी द्वारे बहुत भये हैरान ६६
क्रोधित हैकै महराजा ने आपै खैंचिलीन तलवार ॥
ऐंड़ लगायो तब रूपन ने घोड़ा चला गयो वापार ६७
मारु मारु औ हल्ला करिकै पाछे चले बहुत सरदार ॥