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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

लाखनिका विवाह । ३७५

देश हमारे की रीती यह इकलो लड़का देउ पठाय ८०
नाई बारी दूनों नेगी इनको लेवें संग लिवाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोउ हाथ जोरि शिरनाय ८१
ग्यारह नेगी औ सहिबाला इतने पठै देउ महराज ॥
इतना सुनिकै राजा बोले भावै करो तौन तुमकाज ८२
जो मन भावै सो करु ऊदन तुमको दीन पूर अधिकार ॥
बनि सहिबाला तब ऊदन गे नेगी बने और सरदार ८३
बैठि पालकी में लखराना अपनी लिये ढालतलवार ॥
संग जवाहर के चलि दीन्हे नेगीबने शूर सरदार ८४
आसा लीन्हे कोउ हाथेमा मुरछल कोऊ डुलावत जाय ॥
झण्डी लीन्हे कोऊ नेगी कोऊ रहे मशाल दिखाय ८५
बूँदी केरे नर नारी सब भारी भीर कीन अधिकाय ॥
रूप देखिकै लखराना का मनमें कामदेव शर्माय ८६
धरी पालकी गै फाटक पर बैठे सबै शूर सरदार ॥
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एकेतलवार ८७
बाहर आये तब गंगाधर औ लाखनिते कह्यो सुनाय ॥
जल्दी चलिये तुम भीतर को भौंरीसमयगयो नगच्याय ८८
इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर नेगी लीन्हे संग लिवाय ॥
भीतर पहुँचा जब मन्दिर के तहँ नहिंखम्भपरादिखराय ८६
लौटन लाग्यो जब बाहर को आये शूरवीर तब धाय ॥
मारु मारु कै हल्ला करिकै ऊदन उपर पहुँचे आय ६०
चली सिरोही तब आँगनमा हाहाकार शब्दगा छाय ॥
नेगी बनिकै जे क्षत्री गे तेसब दीन्ह्यो जूझ मचाय ६१
तेरा क्षत्री कनउजवाले बूँदी केर पाँचमै जवान ॥