आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ आल्हखण्ड । ३७०
चौक पुराई गजमोतिन सों चन्दन पीढ़ा दीन डराय २१
तापर बैठे लखराना जब गावन लगीं सुहागिल आय ॥
द्यो जवाहिर गंगाधर का तहँ पर टीका दीन चढ़ाय २३
बीरा दीन्ह्यो जब लाखनि को सम्मुख छींक भई तब आय ॥
रानी तिलका त्यहि समया में बोली राजै वचन सुनाय २४
ब्याह न करिबे हम बूँदी मा टीका आप देयँ लौटाय ॥
परम पियारे लखराना के बीरा लेत छींकमै आय २५
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
जो कछु होवै इनके जीका हमरो लीन्ह्यो मूडकटाय २६
टीका फेरयो महरानी ना जान्यो शकुन छींककामाय ॥
सो सवरमा यहि मानुष का पौवन नाक गिगवतजाय २७
यहिकी छींकनका अशकुन ना माता भरम देउ बिसराय ॥
राजा बोले फिरि रानी ते साँची कहै बनाफरराय २८
जो अस हालत सबहोती ना टीका तुरत देत लौटाय ॥
इतना सुनिकै तिलका रानी अपनो भरमदीन विसराय २६
फेरि जवाहिर सब नेगिन को सुवरण कड़ा दीन पहिराय ॥
जितनी सामारह टीका की सो आँगनमा दीन धराय ३०
राजाजयचंद उन नेगिन का सुवरण कड़ा दीन पहिराय ।
साल दुसाला मोहनमाला इनहून दीन तहाँपर आय ३१
बड़ी खुशानी दुहुँ तरफाके नेगिन मनै भई अधिकाय ।
विदामँगिकै चला जवाहिर बूँदी शहर पहूँचा जाय ३२
हाल बतायो महराजा का जाविधि टीका भयो चढ़ाय ॥
भई खुशहाली गंगाधर के फूले अंग न सके समाय ३३
नामी राजा कनउज वाले बेटा कीनकाज खुबजाय ॥