आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलाखनिका बिवाह । ३७१ ५
भई तयारी ह्वाँ ब्याहे की फागुन मास पहूँचा आय ३४
न्यवत पठावा सब राजन को राजा कनउज के सरदार ॥
पावत चिट्ठी के राजा सब कनउज आयगये त्यहिबार ३५
तेल औ मायन नहखुरआदिक ब्याहन कुँवाँक्यार व्यवहार ॥
नेग चार सब पूरन ह्वैगे लागे सजन शूर सरदार ३६
झीलमबखतर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥
सुमिरि भवानीसुत गणेश को राजा जयचंद भये तयार ३७
आल्हा बैठे पचशब्दापर ऊदन बेंदुल पर असवार ॥
गंगापाँवर कुड़हरि दाला मामा लाखनि का सरदार ३८
सूरज राजा परहुल वाला सोऊ बेगि भयो तय्यार ॥
सिर्गी घोड़े की पीठि पर सय्यद बनरस का सरदार ३६
पूंजि गोबर्द्धनि संदोहिनि अरु लाखनि फूलमती त्यहिबार ॥
सुमिरि भवानीसुत गणेश को पलकी ऊपर भये असवार ४०
बाजे डङ्का अहतक के बारालाख फौज तैयार ॥
आगे हलका भा हाथिन का पाछे चलन लागि असवार ४१
चले सिपाही त्यहि पीछेसों रब्बाचले पवन की चाल ॥
मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ४२
गर्द उड़ानी अति मारग में लोपे अन्धकार सों भान ॥
हाथी चिघरैं घोड़ा हींसैं घूमत जावैं लाल निशान ४३
भयो कलाहल अति मारग में जंगल जीव गये थर्राय ॥
उनइस दिन के फिरि अर्सा में बूँदी पास गये नगच्याय ४४
चार कोस जब बूँदी रहिगै जयचंद तम्बू दीन गड़ाय ॥
गड़िगे तम्बू सब राजन के सब रंग ध्वजा रहे फहराय ४५
अपने अपने सब तम्बुन में राजा नृत्य रहे करवाय ॥