आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हानिकासी । ३५५ २
तुम अस राजा को दुनियामें ज्यहितेप्रीतकरौअधिकाय १०
इतना सुनिकै पिरथी बोले माहिल उरई के सरदार ॥
यतन बताओ यहि समया में जासों जायँ बनाफर हार ११
इतना सुनिकै माहिल बोले मानो कही पिथौराशय ॥
पाँच बछेड़ा मोहबे वाले तिनका आप लेउ मँगवाय १२
बेंदुल हंसामनि हरनागर पपिहा और कबूतरि पाँच ॥
उड़न बछेड़ा ये पाँचों हैं इनबल लड़ैं बनाफर साँच १३
पाँचो घोड़न के पाये ते साँचो विजय होय महराज ॥
जीति न पैहौ तिन पाँचो ते साँचोसाँच पाँच शिरताज १४
इतना सुनिकै पिरथीपतिने तुरतै लीन्ही कलम उठाय ॥
लिखिकै चिट्ठी परिमालिकको औ माहिलको दीनसुनार १५
सुनिकै चिट्ठी पिरथीपतिकै माहिल बड़ा खुशी हैजाय ॥
तुरतै धावन को बुलवायो पिरथी चिट्ठी दीन पठाय १६
लैके चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥
जहाँ कचहरी परिमालिक कै धावन तहाँ पहुँचा जाय १७
कीन दण्डवत महराजा को चिट्ठी फेरि दीन पकराय ॥
लैके चिट्ठी पृथीराज की आँकुइआँकुनजरिकैजाय १८
तुरत बुलायो निज धावन को की आल्हा को लाउ बुलाय ॥
इतना सुनिकै धावन चलिभा दशहरिपुरै पहुँचा जाय १६
तुम्हें बुलावत महराजा हैं यह आल्हा ते कह्यो सुनाय ॥
इतना सुनिकै आल्हा ऊदन पहुँचे नगर मोहोबे आय २०
जहाँ कचहरी परिमालिक की दोनों गये बनाफरराय ॥
हाथ जोरिकै आल्हा ऊदन ठाढ़े भये शीश को नाय २१
आल्हा बोले परिमालिक ते राजन् साँच देउ बतलाय ॥