आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हखण्ड । ३५४
तैसे कीरति यदुनन्दन की द्वापर फैलिगई अधिकाय ॥
सूर औ मीराबाई कलियुग पायो स्वाद भूमिमें आय ४
ललिते चक्खन को ललचायो गायो आल्हा छन्द बनाय ॥
कहौं निकासी अब आल्हा कै सुमिरन देवनको बिसराय ५
अथ कथाप्रसंग ॥
एक समइया की बातैं हैं यारो मानो कही हमार ॥
लिल्ही घोड़ीपर चढ़ि बैठो माहिल उरई का सरदार १
तिकृतिकृतिकृतिकूटिटुईहाँकत दिल्ली शहर पहुँचा जाय ॥
लागिकचहरी दिल्लीपति की जिनका कही पिथौराराय २
आवत दीख्यो तिन माहिलका अपने पास लीन बैठाय ॥
बड़ी खातिरी करि माहिल कै पूँछन लाग पिथौराराय ३
काहे आये उरई वाले आपन हाल देउ बतलाय ॥
इतना सुनिकै माहिल बोले साँची सुनो पिथौराराय ४
मलखे सुलखे आल्हा ऊदन इनका दीखे देश डेराय ॥
आज बनाफर की समता को ठाकुर आन नहीं दिखलाय ५
चार चौहदी के डाँड़े पर मलखे किलालीन बनवाय ॥
जो कछु चाहैं आल्हा ऊदन सो सब करिकै देयँ दिखाय ६
कौन दूसरिहा है आल्हा का सम्मुख बात करै जो जाय ॥
मान न रहिगे क्यहु नरेश के चारो बढ़े बनाफरराय ७
हमका मानैं भल मामा करि खातिर करैं रोज अधिकाय ॥
हमहूं जानत हैं ब्रह्मा सम राजन साँच दीन बतलाय ८
अधिक पियारे पै तिनते तुम मानो कही पिथौराराय ॥
तुम्हें लरिकईं सों जानत हौं सीधो सादो आप स्वभाव ६
तिनकी धरती का स्वामी मैं त्यहिका पास लियो बैठाय ॥