आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] आल्हानिकासी। ३६५ १३
जौंरा भौंरा दुइ हाथिन को हमरे द्वारे देयँ पछार १२८
खता माफ करि हम आल्हाकै औ कनउज माँ लेंय बसाय ॥
इतना सुनिकै सय्यद् बोले धावन पठै लेउ बुलवाय १२६
तब महराजा कनउज वाला तुरतै धावन दीन पठाय ॥
खबरि सुनाई त्यहि आल्हा को तुमको राजा रहे बुलाय १३०
मीरासय्यद् तहँ बैठे हैं तिनहिन हमें दीन पठवाय ॥
इतना सुनिकै आल्हाऊदन दोऊ भाय बनाफरराय १३१
अपनी अपनी असवारिनचढ़ि तहँते कूच दीन करवाय ॥
जौंरा भौंरा मस्ता हाथी जयचंद द्वारेदीन ढिलाय १३२
आल्हा ऊदन दोऊ भाई पहुंचे तुरत द्वारपर आय ॥
जयचंद बोले तब आल्हाते मानो कही बनाफरराय १३३
हथी पछारो जो द्वारे पर तौ तकसीर माफ द्वैजाय ॥
इतना सुनिकै उदयसिंहने मनमांसुमिरिशारदामाय १३४
ताकिकै मस्तक इक हाथी के भाला हना लघुरवा भाय ॥
पैठिग भांला त्यहि हाथी के तुरतै गिरा पछारा खाय १३५
दन्त पकारकै फिरि दूसरे के ऊदन दीन्ह्यो द्वार लिटाय ॥
देखि वीरता उदयसिंह की जयचंद बहुतगयो हर्षाय १३६
बाँह पकरिकै फिरि आल्हा कै औ दरबार पहुँचा जाय ॥
कीनि खातिरी भल ऊदन की खालीमहलदीनकरवाय १३७
लै कै लश्कर तब कनउज मां बसिगे तहां बनाफरराय ॥
खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डागड़ानिशाकोआय १३८
परे आलसी खटिया तकितकि सन्तन धुनी दीन परचाय ॥
आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय १३६
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहै चन्द औ सूर ॥