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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

आल्हानिकासी । ३६१ ६
काह हकीकतिहै मानुष के सुख दुख देनहार भगवान ८२
बातें सुनिकै ये आल्हा की मलखे ठीक लीन ठहराय ॥
क्यहु समुझायेते मनिहैं ना आल्हाउदयसिंह दोउ भाय ८३
मिला भेंट करि सब काहू सों मलखे कूच दीन करवाय ॥
जायकै पहुंचे सिरसागढ़ में महलन खबरि बताई जाय ८४
नदी बेतवा को उतरत भे दूनों भाय बनाफरराय ॥
ढाई दिनके फिरि अर्सा में झावर गये बनाफर आय ८५
बिजुली चमकै कउँधा लपकै कहुँ कहुँ मेघ रहे गहराय ॥
मेढ़ुक बोलैं चौगिर्दा ते वीछी साँपनकी अधिकाय ८६
नचैं मुरैला कहुँ जंगल में झींगुर कहुं करैं झनकार ॥
किह्यो बसेरा तटयमुना के नाहर उदयसिंह त्यहिबार ८७
बनी रसोई रजपूतन की सबहिन जेंव लीन ज्यौनार ॥
भोर भुरहरे मुर्गा बोलत उतरे घाट कालपी क्यार ८८
तहँते चलिकै परडुल पहुंचे दूनों भाय बनाफरराय ॥
दिना द्वैक रहि त्यहि थान में तहँते कूच दीन करवाय ८९
जायकै पहुँचे अस .... में जहँ पानीको कष्टाय ॥
इन्दल बेंदुल दोउ प्यासे भे इनके ..... । ११०
रहा न बीरा तहँ पानन का जो बनाफरराय ॥
ताकि व्यविरया इन्दल बेंदुल पानी .... ल्हुरवाभाय ११५
आधा पानी आधी माटी जाब तिन्हैं लीन लुटवाय ॥
हाय मुसीबत अस परिगैहै सेहुको अन्नदीन छिरकाय ११६
सुनवाँ रोई त्यहि समया में बुताफलहू दीन चलाय ॥
फाटै छाती नहिं द्यावलि कै चिं वापू रहे मचाय ११७
आल्हा सोचैं त्यहि समया में ऊदन छप्पर दीन गिराइ ॥