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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

१ आल्हखण्ड । ३५६
कौनसी विपदा तुमपर आई जो सेवकको लीन बुलाय २१
इतना सुनिकै राजा बोले साँची सुनो बनाफरराय ॥
बेंदुल हंसामनि हरनागर पपिहा और कबूतरि भाय २३
पाँचो घोड़ा पिरथी माँगे, सो अब दीन चही पहुँचाय ॥
चिट्ठी आई महराजा की धावन बैठ बनाफरराय २४
इतना सुनिकै आल्हा बोले राजन साँच देयँ बतलाय ॥
अपने घोड़ा हम देबे ना चहु चढ़िआवै पिथौराराय २५
लड़ि भिड़ि लेबे हम पिरथी ते देबे समरभूमि समुझाय ॥
जियत न पाई कोउ घोड़नको साँची सुनो चँदेलेराय २६
इतना सुनिकै राजा बोले मानो कही बनाफरराय ॥
रारि मिटावो दै घोड़न को यामें भलापरै दिखलाय २७
घोड़ा अइहैं नहिं दिल्ली को मोहबा तुरत लेउँ लुटवाय ॥
ऐसी चिट्ठी पृथीराज की सो पढ़िलेउ बनाफरराय २८
घोड़ा पैहैं जो पिरथी, ना मोहवा तुरत गाँसिहैं आय ॥
कितन्यो घोड़ा लड़ि मरिहैं ऐसे पाँच देउ पठवाय २९
अंकुश विषका तुम गाड़ो ना मानो कही बनाफरराय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३०
काह हकीकति है पिरथी कै मोहवानगर मँझावें आय ॥
दतिया जीति उरैछा जीत्यों जीत्यो सेतुबंधलों जाय ३१
जीति पेशावर मुलतानाली बूँदी थर थर थर्राय ॥
राज्य कमायूंका लै लीन्ह्यों झंडाअटक दिह्योंगड़वाय ३२
जितनी तिरिया हैं मेवात में संध्या समय नित्त पछितायें ॥
काह हकीकति है पिरथी कै दिल्ली काल्हिलेउँ लुटवाय ३३
एक पिथौरा कै गिनती ना लाखन चढ़ें पिथौरा आय ॥