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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

चन्द्रावलि की चौथ । ३११ २६
को गति बरर्णै रणशूरन कै सम्मुख करें समर मैदान १५४
मान न रहिगे क्यहु क्षत्रिनके सब के छूटि गये अरमान ॥
बहुतक करहैं समरभूमि में अधजलपरे अनेकन जवान १५५
बहुतक सुमिरैं घर अपने को औ मन परे परे पछितायँ ॥
बहुतक क्षत्री गिरैं समर में काटे वृक्ष सरिस भहराय १५६
नदी भयङ्कर बही रकत की त्यहिमाँ गिरे ऊंट गज धाय ॥
छुरी कटारी मछली ऐसी ढालैं कछुवा परैं दिखाय १५७
परीं लहासैं तहँ मनइन की छोटी डोंगिया सम उतरायँ ॥
बहैं सिवारा जस नदिया माँ तैसे बहे बाल तहँ जायँ १५८
भूत पिशाच योगिनी नाचैं गावैं गीत बीर बैताल ॥
श्वान शृगालन की बनिआई गीधन गरे परे जयमाल १५६
चिघरैं हाथी रणमण्डल में डगरैं बड़े बड़े सरदार ॥
भगरैं मत्तखे रणशूरन ते डगरैं डारि डारि हथियार १६०
रहि अभिलाषा नहिं केहू के जो फिरि करै वहाँपर मार ॥
जितने लड़का वीरशाह के बाँधे सिरसा के सरदार १६१
रहें सिपाही जे बौरी के भागे डारि ढाल तलवार ॥
भागे क्षत्रिन का मारैं ना नाहर मोहबे के सरदार १६२
रीति पुरानी इन छोड़ी ना कतहूँ समर भूमि में ज्वान ॥
पूरो क्षत्रीपन करतीं ना मरतीं नहीं समर मैदान १६३
तौ यह गावत को गाथा फिरि तजिकै सकल आपनो काम ॥
यह सब जानत है अपने मन रहिहै एक रामको नाम १६४
तबहूँ मानत है जीवन बहु तजिकै कर्म्म धर्म्म इतमाम ॥
यह नहिं जानत है अपने मन साँचो धर्मकर्म सुखधाम १६५
गये सिपाही नृप द्वारे पर औ सब हाल बताये जाय ॥

२* आल्हखण्ड । ३१२
बन्धनसुनिकै सब लड़िकनको राजा गये सनाकाखाय १६६
खबरि पहुँचिगै रनिवासे में राजा रानी लीन बुलाय ॥
बौहर आई चन्द्रावलि तहँ सोऊगई कथा सब गाय १६७
'हमरे घरके माहिल बैरी उनके चुगुलिनका वयपार ॥
कहा मानिकै तुम माहिल का दादा किह्योयहांलग रार १६८
ना सुनिपावा मैं पहिले ते माहिलदीन्ह्यो रारि लगाय ॥
तौ अस हालत कसहोतै अब तबहीं देति सबै समुझाय १६६
योगी बनिकै ब्रह्मा आये सूरति दीख दूरि ते माय ॥
होति खटपटी जो ऊदन ते ब्रह्माभाय न अउतोधाय १७०
टेक कठिन है बघऊदन कै हम खूब जानैं ठीक स्वभाव ॥
मिलिये दादा अब आल्हा ते याही जानो नीक उपाव १७१
सुनि सुनि बातें सब बौहर की रानी नृपति दीन समुझाय ॥
सुनिकै बातें महरानी की राजा ठीक लीन ठहराय १७२
आगि लगाई माहिल ठाकुर नातेदारी दीन तुराय ॥
राजा सोचत यह अपने मन पहुँचातुरतसिंहासनआय १७३
कलम दवाइति कागज लैकै । चिट्ठी लिखनलाग ततकाल ॥
जितनी बातें माहिल कहिगा लिखिगेयथातथ्यनरपाल १७४
फिरि कछु बातें चन्द्रावलिकी लम्बो पत्तो लिखा बनाय ॥
बन्धन छोरो सब पुत्रन को तुरतै विदा लेउ करवाय १७५
कीनि घटिहई माहिल ठाकुर नाहक रैसा दीन लगाय ॥
कहा मानिकै हम माहिल का साँचोसाँच गयन बौराय १७६
लिखी विधाता कै मेटै को साँचो कहैं गीत सब गाय ॥
लिखिकै चिट्ठी दै धावन को राजा बैठिगये शिरनाय १७७
लैकै चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा जहाँ बनाफरराय ॥

चन्द्रावलि की चौथ । ३१३ ११
चिट्ठी दीन्ह्यो सो आल्हा को ठाढ़ो भयो शीशकोनाय १७८
लागि कचहरी तहँ आल्हा कै रुमि झुमि रहीं पतुरियानाच ॥
आल्हा बाँचन चिट्ठी लागे हैगा रंग भंग तहँ साँच १७६
पढ़िकै चिट्ठी आल्हा ठाकुर सबको दीन्ह्यो हाल बताय ॥
माहिल ठाकुर की किरपा ते इतना परा परिश्रमआय १८०
फिकिरिम माहिल हैं ऊदनकी निश्चय समुझि परै यहिबार ॥
जाको रक्षक रघुनन्दन है ताको जाय न बाँकोबार १८१
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर बन्धन तुरत दीन छुड़वाय ॥
कहि समुझायो सबलरिकन ते राजै खबरि जनावो जाय १८२
ब्रह्मा आवत इन्द्रसेन सँग इनका बिदा देयँ करवाय ॥
माहिल मामा हमरे लागैं तातेकिहिनिदिल्लगीआय १८३
त्यहिमा सज्जन तुम महराजा सोऊ दया दीन बिसराय ॥
क्षम्यो ढिठाई अब हमरी तुम तुम्हरीशरणगये हमआय १८४
नातेदारी में उत्तमहौ आहिउ कृष्णबंश महराज ॥
गुरू श्वशुर सों संगर ठानैं क्षत्री जन्म युद्धके काज १८५
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर सबको बिदा कीन ततकाल ॥
ब्रह्मा पहुँचे बीरशाह घर औसबकह्यो बनाफरहाल १८६
सुनिकै बातें सब आल्हा की राजा बिदा दीन करवाय ॥
बैठि पालकी में चन्द्रावलि गौरा पारवती को ध्याय १८७
बहुधन दीन्हो ब्रह्मा ठाकुर महरन पलकी लीन उठाय ॥
दशहूँ लरिकिन सों महराजा आये जहाँ बनाफरराय १८८
आवत दीख्यो बीरशाह को आल्हा मिले अगारी आय ॥
मिला भेंटकरि सबसों राजा अपने धाम गये हर्षाय १८६
बाजे डंका भहतंका के आल्हा कूच दीन करवाय ॥

३१ आल्हखण्ड । ३१४
चौंड़ा सूरज दिल्ली पहुँचे आल्हा गये मोहोबे आय १६०
बेटी पहुँची जब महलन में मल्हना मिली अगाड़ी धाय ॥
बारह रानी परिमालिक की बेटी देखि गई हरषाय १६१
सावन भावन गावन लागीं आवन लागि विदेशी ज्वान ॥
मल्लन कल्लन फरकन लागे थिरकनलागिमेघअसमान १६२
दादुर बोलन जलमें लागे विरहिन उठी करेजे पीर ॥
बिना पियारे घर पीतम के कैसे धरै नारि मनधीर १६३
सवैया ॥
कैसे धरै मनधीर तिया परदेश पिया ज्यहि सावन छाये ।
राग औरङ्ग अनंग कि जंग उमंग भरै पियकी सुधिआये ॥
गात सबै तियके सकुचात बिदेश परे पिय पेट खलाये ।
कहाकहूँ ललिते विधिप्रीति अनीति किरीति सदादरशाये १६४
गवैं सुहागिल सब सावन में बारामासी मेघ मलार ॥
गड़े हिंडोला हैं घर घर में दर दर सावन केरि बहार १६५
काग उड़ावन उनघर लागीं जिन घर परे पिया परदेश ॥
सावन रावन उनके लागै जिनके चिट्ठीके अन्देश १६६
नहीं तो सावन अतिपावन है गावन गीत क्यार त्यवहार ॥
हमें सुहावन मनभावन है सावनक्यारसकलव्यवहार १६७
चौथि पूरिभै चन्द्रावलि कै ह्योति होय तरंग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १६८
सेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥
तारागण सब चमकन लागे सावन मेघ रहे घहराय १६६
कहुँ कहुँ तारा कहुँ कहुँ वादल नभहू भयो कलियुगी आय ॥

चन्द्रावलि की चौथि। ३१५ ५३
आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवौ प्रागनारायणभाय २००
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चंद औ सूर ॥
मालिक ललिते के तवलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २०१
माथ नवावों पितु अपने को मन में रामचन्द्र को ध्याय ॥
तुम्ही खेवैया हौ नैयाके ओ रघुरैया होउ सहाय २०२
माघ कृष्ण तिथि श्रीगणेशकी ताते वार वार पदध्याय ॥
सम्बत वनइस सै पचपन में पूरों भयो आज अध्याय २०३
इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण
जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलानिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध
कृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत चन्द्रावलिचौथिपूर्णवर्णनंनाम
द्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥
चन्द्रावलि की चौथि सम्पूर्ण ॥
॥ इति ॥

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अथ आल्हखण्ड ॥
बलखबुखारे की लड़ाई अथवा इन्दल
हरण व विवाह वर्णन ॥
सवैया ॥
बाजत झांझ मृदंग तहाँ औ सबै मुरचंगनसों स्वर गावैं ।
बाजत तार सितारनके यकत इनकी गति कौन बतावैं ॥
राजत बीण तहाँ तबला अवर जहँ झुंडन झुंडन आवैं ।
गाजत कृष्ण तहाँ ललिते अब जहाँ शिव गोपीरूप बनावैं १
सुमिरन ॥
मैया भैया और बपैया सब दिशि देखा खूब निहार ॥
बिना चरैया गैयावाला दैया कौन होय रखवार १
बूड़ै नैया भवसागर में कोउ न मिलै खिवैया हाल ॥
मैया यशुमति केर कन्हैया भैया साँच कहैं सुरपाल २
पारलगैया म्वरि नैया के गैयापाल कृष्ण महराज ॥
और खेवैया को नैया का जाकीशरण लेयँ हम आज ३

२ आल्हखण्ड । ३१८
तुम्ही गुसैयाँ दीनबन्धु हौ ओ ब्रह्मण्यदेव ब्रजराज ॥
लाज रखैया बाम्हन तनकी साँचे एक कृष्ण महराज ४
शरणहि ताकत विप्र सुदामा पायो सकल सम्पदा राज ॥
छूटि सुमिरनी गई कृष्ण की इन्दल ब्याह बखानों आज ५
अथ कथाप्रसंग ॥
परब दशहरा की जग जाहिर बुड़की हेतु जाय संसार ॥
भारी मेला श्रीगंगा को हिंडनक्यार पूर त्यवहार १
बहुतक छैला अलबेला तहँ घोड़न उपर भये असवार ॥
करी तयारी श्रीगंगा की चक्कस लिये बुलबुलनक्यार २
जेठदुपहरी भारी ह्वैकै ब्यारी करैं वृक्षतर आय ॥
देखि गँवाँरी तहँ नारी नर बोला तुरत बनाफरराय ३
कहाँ तयारी नर नारी करि ब्यारी किह्यो यहाँपर आय ॥
देखि बनाफर को नर नारी बोले साँच देयँ बतलाय ४
कीन तयारी हम विठूर की भारी पर्ब दशहरा केरि ॥
चकित ह्वैकै ऊदन दीख्य चारिउ दिशातर्फ फिरिहेरि ५
भारी मेला अलबेला तहँ रेला चला जाय सबराह ॥
घोड़ बेंदुला का चढ़वैया आयो जहाँ बैठ नरनाह ६
हाथ जोरिकै तहँ आल्हा के ऊदन बोले शीश नवाय ॥
करें तयारी हम गंगा की दादा हुकुमदेउ फरमाय ७
इतना सुनिकै आल्हा बोले साँची सुनो लहुरवा भाय ॥
देश देशके राजा अइहैं होई भीर भार अधिकाय ८
रारि मचैहौ तुम मेला में हमपर ऐरी आपदा आय ॥
ताते जावो नहिं मेला को मानो कही लहुरवा भाय ९
इतना सुनिकै माहिल बोले तुम सुनिलेउ बनाफरराय ॥

इन्दलहरण । २१६ ३.
लड़िका ऊदन अब नाहीं हैं जो तहँ रारि मचैहैं जाय १०
बातें सुनिकै ये माहिल की आल्हा बोले बचन बनाय ॥
तुम चलिजावो माहिल मामा तौ हम ऊदन देयँ पठाय ११
इतना सुनिकै माहिल बोले हम तो करब जाय असनान ॥
करो तयारी ऊदनठाकुर आल्हाबचन मानिपरमान १२
आल्हा बोले फिरि देबाते तुमहूं जाउ साथ यहिकाल ॥
पै तुम बच्यो बघऊदन को जहँपर होय रारिको हाल १३
इतना कहिकै आल्हाठाकुर महलन फेरिगयो अलसाय ॥
करै तयारी ऊदन लागे बाँके घोड़ लीन कसवाय १४
कच्छी मच्छी हरियल मुश्की सुर्खा सुरंगा रङ्ग बिरंग ॥
तुर्का गर्रा पँचकल्यानी सब्ज़ा स्याह एकही रंग १५
चुने सिपाही लिये संग में जिनते हारिगई तलवार ॥
संजा रिसाला घोड़नवाला लग भग जानो एक हजार १६
सजे सिपाही पंद्रासौ लग एकते एक लड़ैया ज्वान ॥
बाजे डंका अहर्तंका के घूमन लागे लाल निशान १७
इन्दल आये त्यहि समया में ऊदन पास पहुंचे आय ॥
हमहूं चलिबे श्री गंगा को चाचा लेवो साथ लिवाय १८
इतना सुनिकै ऊदन बोले बेटा मानो कही हमार ॥
दादा भौजी जो रोकैं ना हमरे साथ होउ तय्यार १६
इन्दल चलिभे तब महलन को माता पास पहुंचे जाय ॥
हाथ जोरिकै इन्दल बोले मातैं बार बार शिरनाय २०
हुकुम कराय देउ दडुवा सों आवों चाचा साथ नहाय ॥
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बारबार समुझाय २१
पर्व दशहरा की टरिजावै फिरि तुम आयो गङ्ग नहाय ॥

४ आल्हखण्ड । ५२०
भारी मेला है बिठूर का जो तुम जेहो पूत हिराय २२
हौ इकलौता म्वरी कोखि में ताते मोर प्राण घबड़ाय ॥
इतना सुनिकै इन्दल बोले माता साँच देयँ बतलाय २३
जान न पावैं जो गंगा को तौ मरिजयँ जहरको खाय ॥
हुकुम देवावै की दइवाते की अब घेरै बैठि पछिताय २४
सुनिकै बातें ये इन्दल की सुनवाँ गई सनाका खाय ॥
गई तड़ाका ढिग आल्हा के इन्दल हाल बतावा जाय २५
बातें सुनिकै सब सुनवाँ की आल्हा बोले वचन सुनाय ॥
लिखी विधाता की मेटै को अब तुम देवो पूत पठाय २६
जहर खायकै जो मरिजाई तौहू शोच होय अधिकाय ॥
पार लगैहैं श्रीगंगाजी यहमत ठीक लीन ठहराय २७
इतना सुनिकै सुनवाँ चलिभै इन्दल पास पहुँची आय ॥
औ बुलवायो बघऊदन को सबियाँ हाल कह्यो समुझाय २८
इन्दल बिगरे हैं महलन में गंगा इन्हें देउ अन्हवाय ॥
पै हम सौंपति त्वहिं इन्दलको देवर बार बार शिरनाय २९
किह्यो बखेड़ा नहिं मेला मैं रेला होय तहाँ अधिकाय ॥
वहाँ न जायो इन्दल लैकेँ मान्यो कही वनाफरराय ३०
इतना सुनिकै ऊदन इन्दल दोऊ चलिभे शीश नवाय ॥
जायकै पहुँचे फिरि फौजन में लश्कर कूच दीन करवाय ३१
बायें घोड़ा है देवा का दहिने बेंदुल का असवार ॥
बीच म जावै इन्दल ठाकुर कम्मर परी एक तलवार ३२
पांच दिनौना मारग लागे छठयें दिवस पहुंचे जाय ॥
भारी मेला भा बिठूर मौ आवा तहां कनौजीराय ३३
बाजै डंका तहँ ऊदन का लाखनि धावन लीन बुलाय ॥

[Page Header] इन्दलहरण । ३२१ ५

कहि समुझावा त्यहि धावनको डंका बन्द देउ करवाय ३४
हुकुम कनौजी का नाहीं है डंका कोऊ बजावै आय ॥
इतना सुनिकै धावन चलिकै डंका बजत दीन रुकवाय ३५
कहा न मान्यो जब बघऊदन देवा ठाकुर उठा रिसाय ॥
तुम्हें मुनासिव यह चहिये ना सबसों बैर बढ़ावो भाय ३६
चलिकै मिलिये अब लाखनिसों उनसों हुकुम लेउ करवाय ॥
हीनी तुम्हरी कछु हैहै ना मानो कही बनाफरराय ३७
सुनिकै बातें ये देवा की ऊदन मानिगयो त्यहिकाल ॥
पाँच दुमाला दुइ हीरा लै चलिभा देशराजका लाल ३८
नचै पतुरिया त्यहि तम्बूमें ज्यहिमें रहें कनौजीराय ॥
ऊदन ठाकुर तहँ पहुँचतभा राखी भेंट अगाड़ी जाय ३६
हाथ पकरिकै लाखनिराना अपने पास लीन बैठाय ॥
कही हकीकति बघऊदन ने लाखनिहुकुमदीनफरमाय ४०
बाजै डंका इक ऊदन का औरन बन्द देउ करवाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय ४१
सुनो हकीकति अभिनन्दनकी हंसा ताको राजकुमार ॥
त्यहिकी बेटी चित्तरेखा मेला हेतु भई तय्यार ४२
नटिनी सँगमें त्यहि बेटी के जादू क्यार जिन्हें व्यपार ॥
बलखबुखारे को राजा जो त्यहिअभिनन्दननामउदार ४३
त्यहि का बेटा हंसाठाकुर चलिभा बहिनी साथलिवाय ॥
सवालाख लश्कर को लैके ब्रह्मावर्त्त पहुँचा आय ४४
तम्बू गड़िगे त्यहि रेती माँ भारी ध्वजारही फहराय ॥
संग सहेली त्यहि बहिनी की बोली बेटी बचन सुनाय ४५
चलिये हनवन जल्दी करिये अब दिनगयो यामभरआय ॥
२१

६ आल्हखण्ड । ३२२
सुनिकै बातें ये सखियन की बेटी चली तड़ाकाधाय ४६
भा भटभेरा तहँ इन्दल का देखत रूपगई ललचाय ॥
मन अरु नैना यकमिल ह्वैंगे सखियनदेखिगई सकुचाय ४७
फिरिफिरिचितवैदिशिइन्दलके हनवन करै गंगको वारि ॥
बिधिउ न जानै गति नारी की दशरथ मरे नारिसों हारि ४८
सोई नारी फिरि फिरि चितवै कैसी करै आजु त्रिपुरारि ॥
इन्दल निकले जलके बाहर सोऊनिकलिपरीसुकुमारि ४६
दिह्यो दक्षिणा द्विज देवन को दोऊ मोहबे के सरदार ॥
तहँते चलिभे फिरि तम्बू को देखत मेला केरि बहार ५०
चचा भतीजे दोऊ ठाकुर तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥
बेटी प्यारी अभिनन्दन की सोऊ चली तहाँ ते धाय ५१
आयकै पहुँची सो तम्बुन में औ सखियनसों लगीबतान ॥
ऐस रँगीला और सजीला मेला नहीं दूसरो ज्यान ५२
करिकै जादू याको हरिये करिये सखी सबई अबसाज ॥
मन नहिं हटको हमरो मानै ना अब करै तुम्हारी लाज ५३
सवैया ॥
होत अकाज न लाजरहै यह राज समाज लखे दुख छावै ।
जो कुलकानि न आनिकरौं कुलटा उलटा म्वहिंलोगबतावै॥
भावै यहै हमको सजनी रजनी बिन पीतम आनि मिलावै ।
पावै जबै ज्यहि नेहलग्गो ललिते मनमें तबहीं सुखआवै ५४
सुनिकै बातें चितरेखा की सखियनकहा बहुतसमुझाय ॥
धीरज राखो अपने मन माँ पीतम मिली तुम्हारो आय ५५
इतना कहिकै संग सहेली हेली तुरंत भई तय्यार ॥

इन्दलहरण । ३२३ ७
लय अलबेली संग सहेली आई देखन गङ्ग बहार ५६
ऊदन इन्दल देवा ठाकुर तीनों गये तहाँपर आय ॥
नाव मँगायो मल्लाहिन ते बैठयोसुमिरि शारदामाय ५७
बैठी नावन में चितरेखा बेखा नटिनिन केरि बनाय ॥
काह बतावैं हम लेखा त्यहि देखा रूप नहीं है भाय ५८
मै अवरेखा चितरेखा को लेखा कामदेव की नारि ॥
उठैं तरङ्गैं तहँ गंगा की जंगा करें वारिसों बारि ५६
लैकेँ पुरिया भैरोंवाली ऊदन उपर दीन सो डारि ॥
बीर महम्मद की पुरिया को देवा उपर चलावा नारि ६०
नजर बन्दभै जब दूनों के तुरतै इन्दल लीन उतारि ॥
सुवा बनायो सो इन्दल को पिंजरा लीन तड़ाका डारि ६१
उतरिकै नावनसों जल्दी सो तम्बुन गई तड़ाका आय ॥
उतरी जादू जब ऊदन की तबनहिं इन्दल परे दिखाय ६२
जब नहिं दीख्यो तहँ इन्दलको ऊदन तुरत गये घबड़ाय ॥
जार मँगाये तहँ लोहे के सो गंगा माँ दये डराय ६३
मच्छ कच्छ बहुतक फँसिआये पै नहिं इन्दल परे दिखाय ॥
तिल तिल ढूंढ़ा भुइँ मेला में ऊदन देवा संग लिवाय ६४
पता न पायो जब इन्दल को तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥
कही हकीकति तहँ माहिल ते नाहर उदयसिंह तहँ गाय ६५
सुनिकै बातें उदयसिंह की माहिल बोले वचन बनाय ॥
करो अँदेशा कछु जियरेना आल्है द्याव वहाँ समुझाय ६६
जादू कै कै कोउ इन्दल का साँचो लियो बनाफरराय ॥
घरने द्वैकै फिरि तुम ढूंढ़यो ह्वाँते कूच देउ करवाय ६७
इतना सुनिकै उदयसिंह ने डंका कूच दीन बजवाय ॥

.८ आल्हखण्ड । ३२४
पांच रोज को धावा करिकै दशहरिपुरै पहुँचे आय ६८
ऊदन रहिगे एक कोस में माहिल गये अगाड़ी धाय ॥
बड़ी खातिरी आल्हा करिकै अपने पास लीन बैठाय ६६
आल्हा बोले तहँ माहिल ते मामा हाल देउ बतलाय ॥
ऊदन देवा इन्दल बेटा तीनों रहे कहांपर भाय ७०
दृग नहिं देखन इन तीनों को ताते चित्त बहुत घबड़ाय ॥
इतना सुनि कै माहिल बोले साँची सुनो बनाफरराय ७१
ख्यलै नेवारा गे नदिया में ऊदन इन्दल साथ लिवाय ॥
ऊदन देवा इकमिल हैकै औ इन्दलको दीन बहाय ७२
टरिजा टरिजा माहिल मामा धरती खोदि लेउँ गड़वाय ॥
ऐसी बातें फिरि बोले ना ठाकुर साँच दीन बतलाय ७३
है मर्दाना ऊदन बाना मामा काह गये बौराय ॥
किहे दिल्लगी की साँची है हमरोचित्त बहुत घबड़ाय ७४
इतना सुनिकै माहिल बोले साँची कहा बनाफरराय ॥
पोथा पढ़िकै धरिदीन्ह्यो सब अकिल तुम्हरी गई हिराय ७५
कौनिअदावति नलपुष्कलकी भारत पढ़े बनाफरराय ॥
कैसि दुर्दशा नलकी कीन्ह्यो पुष्कल नलको जुआँ खिलाय ७६
बिना वस्त्र के महराजा भे साजा सबै साज कर्तार ॥
तिनकी प्यारी दमयन्ती जो सोऊ छूटिगई त्यहि बार ७७
त्यहि दमयन्ती के ब्याहे में आये पवन अंग्नि सुरराज ॥
उद्यम कीन्ह्यो नल ब्याहे को चाहे दूत भये नलराज ७८
ब्याह न कीन्ह्यो दमयन्ती ने विन्ती बहुत कीन नलराज ॥
गन्ती कीन्ह्यो दमयन्ती ना लज्जितभये तहाँ सुरराज ७६
बारह बरसै वनवाजी मा राजी भये इन्द्र महराज ॥

इन्दलहरण । ३२५ ९
आल्हा मैने साँची जानो ऊदनकीन्ह साँचयहकाज ८०
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर गरुई हाँक दीन ललकार ॥
टरिजा टरिजा उरई वाले तोरे चुगुलिन का बयपार ८१
साँची साँची आल्हा ठाकुर तुम्हरे। इन्दल गयो हिराय ॥
कहौं असाँचा आल्हा ठाकुर साँचा सहों पुत्रका घाय ८२
करों दिल्लगी अस कबहुँ ना साँची सुनो बनाफरराय ॥
ऊदन बोले ह्याँ देवा ते हमरो चित्त बहुत घबड़ाय ८३
दशहरिपुरवा माहिल पहुँचे कैसी खबरि सुनावै जाय ॥
पुत्र शोक सम दुख दूसर ना जानतगाथ भली तुम भाय ८४
पुत्र शोक सों दशरथ मरिगे कीरति रही जगत में आज ॥
कीरतिसागर भट नागर जे आगर सबैग़ुणन रघुराज ८५
तेई खिवैया अब नैया के भैया काह करें धौं आज ॥
यहु दिन आये लग ध्यावै जो कलयुगसत्रुझकशिरताज ८६
सोई कलयुग के ऊदन हम साँचे कर्म्म कीन रघुराज ॥
दया न छोड़ा द्विज गाइन ते पीठि न दीन प्राणकेकाज ८७
नहिं अभिमानी बातें ठानी बालक विप्र साथ महराज ॥
परम पियारे द्विज तुम का हौ निर्मलएकक्षत्रराज्यहिभ्राज ८८
ऐसी स्तुति ऊदन कीन्ह्यो देवा चलत भयो ततकाल ॥
आयकै पहुँच्यो त्यहि मंदिर में ज्यहिमें देशराजको लाल ८६
ठाढ़े दीख्यो जब देवा को चलिभा उरई का सरदार ॥
भल भल रोंका आल्हा ठाकुर करिकै बहुतभांति सतकार ६०
पै नहिं मान्यो जब माहिल ने आयसु दियो बनाफरराय ॥
देखिकै सूरति फिरि देवा की आल्हागये बहुत घबड़ाय ६१
कैसी गुजरी है तीरथ में देवा साँच देय बतलाय ॥

१० आल्हखण्ड । ३२६
परम पियारो पुत्र हमारो इन्दल राख्यो कहाँ छिपाय ६२
पूत न होवैं बहु कलयुग में यामें भूतन को अधिकार ॥
सेव करावैं बालापन में ज्वाने भये बसैं ससुराल ६३
पूत सपूतों इन्दल प्यारो कहँ पर मैनपुरी चौहान ॥
इतना सुनिकै देवा बोला साँची कहौं शपथभगवान ६४
बंश पिथौरा के नजदीकी आहिन सत्य बनाफरराय ॥
आल्हा ऊदन मलखे सुलखे भाई सरिस चारिहू भाय ६५
कमती जानैं जो काहू को तो म्वहिं सजादेयँ भगवान ॥
कोऊ लैगा छलि जादू सों इन्दल तुम्हरौ पूत परान ६६
ऊदन बिगड़े तहँ मेला में जैबे पता लगावन काज ॥
तिल तिल पृथ्वी मेला ढूँढ़ा भारी भीर तहाँ महराज ६७
पता न लाग्यो जब इन्दल को माहिल कहा तवै समुझाय ॥
आल्हा ठाकुर को समुझावव ऊदन कूच देउ करवाय ६८
कहा मानिकै तब माहिल का डाँड़े परा लहुरवा भाय ॥
जौन देश में इन्दल बैठैं ऊदन लैहैं खोज लगाय ६६
बातैं सुनिकै ये देवा की आल्हा बहुत गये घबड़ाय ॥
जो कछु भाषा माहिल ठाकुर साँची जना बनाफरराय १००
पुत्र शोच सों उर धड़कत भो जियेर धीर धरा ना जाय ॥
आल्हा बोले तब देवा ते तुमऊदनको लवो बुलाय १०१
उनहीं पाँयन देवा चलिभा ऊदन खबरि दीन बतलाय ॥
बड़े शोच में बड़ भैया हैं तुमकोतुरतबुलानिभाय १०२
इतना सुनिकै ऊदन चलिभे सम्मुख गये तड़ाका आय ॥
आवत जान्यो जब ऊदन को आल्हाशीशलीननिहुराय १०३
औ दिशि दीख्यो ना ऊदनके मानों शत्रु ठाढ़ भो आय ॥

इन्दलहरण । ३२७ ११
हाथ जोरिके ऊदन बोले चरणन वार बार शिरनाय १०४
मोहलति पावों छा महिना कै इन्दल खोजिदिखाओं आय ॥
इतना सुनिकै आल्हा जरिगे अपनो कोड़ा लीन उठाय १०५
पीटन लाग्यो जब ऊदन को सुनवाँ सुनत गेई तहँ आय ॥
कहि समुझायो सो आल्हाको आल्हा तुरत दीन डरियाय १०६
टरिजा टरिजा री सम्मुख ते नहिं शिरकाटि देउँ भुइँ डारि ॥
ऊदन मारा है इन्दल को साँची खबरि मिली म्वहिं नारि १०७
सुनवाँ बोली फिरि आल्हाते साँची सुनो बनाफरराय ॥
हम तुम जी हैं जो दुनिया में हैहैं पुत्र नाथ अधिकाय १०८
मिली सहोदर फिरि भाई ना आई कौन साँकरे काज ॥
सुन्दरगढ़ को चाचा हमरो तुमको कैद कीन महराज १०६
बनि सौदागर उदयसिंह ने तुम्हरी कैद दीन छुड़वाय ॥
बराबरस के ऊदन ठाकुर माड़ोली न वापका दायँ ११०
लड़ि गजराजा सों ऊदन ने मलखे ब्याह दीन करवाय ॥
नरपति राजासों लड़िकै फिरि फुलवालये लहुरवा भाय १११
हथी पछारा इन दिल्ली में द्वारे पृथीराज के जाय ॥
ऐसे नामी इन ऊदन का मारब नहीं मुनासिब आय ११२
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर जूरा पकड़ि तड़ाका लीन ॥
खैंचि तमाचा शिर माँ मारा सुनवाँ गमनमहल को कीन ११३
मारन लाग्यो फिरि ऊदन को द्यावलि सुनत पहुँची आय ॥
औ ललकारा फिरि आल्हाको मारो नहीं बनाफरराय ११४
इतना सुनिकै आल्हा बोले माता बैठु धाम में जाय ॥
जैसे ऊदन तुम को प्यारे तैसे पूत हमारो आय ११५
हम समुझावा भल ऊदन को तुम ना जाउ लहुरवा भाय ॥

१२ \qquad आल्हाखण्ड । ३२८
पूत हमारे के मारन को \qquad ऊदन मेला गये लिवाय ११६
बातें सुनिकै ये आल्हा की \qquad द्यावलि ठाढ़ि रही शिरनाय ॥
ऊदन ठाकुर को आल्हा ने \qquad कोड़न चर्सा दीनउड़ाय ११७
औ ललकारा फिरि ऊदन को \qquad आल्हा दाँतन ओठ चबाय ॥
धिक धिक तेरी रजपूती का \qquad इन्दल बिना पहुँचे आय ११८
दशहरिपुरवा अब आये ना \qquad नहिंहानिदरौं खङ्ग के घाय ॥
जहँ मनभावै तहँ चलिजावै \qquad साँची शपथ शारदामाय ११९
सुनिकै बातें ये आल्हा की \qquad ऊदन चला बहुत घबड़ाय ॥
सुनवाँ फुलवा द्यावलि तीनों \qquad पृथ्वी गिरीं पछारा खाय १२०
देवा ऊदन दोऊ ठाकुर \qquad सिरसागढ़ै पहुँचे जाय ॥
खबरि पायकै मलखाने ने \qquad फाटकबन्दलीन करवाय १२१
यह गति देख्यो उदयसिंहने \qquad ठाढ़ो लाग तहाँ पछिताय ॥
कोऊ साथी नहिं विपदा में \qquad यह देवाते कह्यो सुनाय १२२
\qquad\qquad सवैया ॥
जाकि सुता हरिके गृह शोभित चन्द्रललाट महेश प्रवीनो ।
इन्द्र गयन्द दयो हय रबिको देवन धेनु द्रुमादिक दीनो ॥
शिरी मुनिरायजू कोपकियो तब गण्डकधारि सबै जलपीनो ।
एते बड़ेको विपत्तिपरी तब सिंधुकि काहु सहाय न कीनो १२३
इतना सुनिकै देवा बोला \qquad साँची सुनो लहुरवा भाय ॥
साथ तुम्हारो हम छाँड़व ना \qquad चहुतनधजीधजीउड़िजाय १२४
पै हम बांचे बहु पुराण हैं \qquad देखी कथा अनेकन भाय ॥
विपतिमें साथी कोउ विरलाहै \qquad साँची सुनो बनाफरराय १२५

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इन्दलहरण । ३२६ १३

सवैया ॥
रागवही ज्यहि रामबसै अरुध्यान वही जो धनी के घेरेका ।
प्रीति वही जो सदा निबहै अरु दाग वही कटु बचनकहेका ॥
सुखसम्पत्ति अनेक भरी पर आवै नहीं कोउ काम परेका ।
काहेकोआदम शोचतहै कोउ मित्रनहीं है विपत्ति परेका १२६
ठाकुर वही जो दुख सुख बूझै सेवक वो मनलाग रहेका ।
भाई वही जो भारहि खैंचत पुत्र वही परिवार बढ़ेका ॥
नारी वही जो जरै पियके सँग शूर वही सनमुखखलड़ेका ।
सम्पत्तिमेंतो अनेकमिलैं पर मित्रवही जो विपत्ति परेका १२७

इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कही समय की बात ॥
अब मन भाई यह हमरे है नरवर चलैं आजहीतात १२८
यह मन भाय गई देवाके दोऊ भये बेगि तय्यार ॥
सात रोजकी मैजलि करिकै नरवर पहुँचिगये सरदार १२६
यह सुधि पहुँची जब मोहबे में आल्हा तजा लहुरवाभाय ॥
बारहु रानिन सों परिमालिक महलन गिरे मूर्च्छाखाय १३०
तुरत पालकी को मँगवायो दशहरिपुरै पहुँचे जाय ॥
औधिरकात्यो भल आल्हा को रहिगा चुप बनाफरराय १३१
कायल हैगे आल्हाठाकुर राजा लौटि परा पछिताय ॥
ऊदन बैठे ह्याँ कुँवना पर हिरिया गई तहाँ परआय १३२
देखिकै सूरति बघऊदन कै हिरिया गई तुरत पहिंचान ॥
हँसिकै हिरिया बोलन लागी साँचीसुनोबनाफरज्वान १३३
कौनि मुसीबत तुमपर परिगै जो तजि दियो ढालतलवार ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले मालिनिठीककहैयहिवार १३४

१४ आल्हखण्ड । ३३०
परी मुसीबत हमरे ऊपर पृथ्वी मोहबा लीन लुटाय ॥
छोड़ बेंदुला फुलवा सुनवाँ लीन्ह्यो जीति पिथौराराय १३५
करब नौकरी हम मकरँद कै महलन खबरि जनावै जाय ॥
इतना सुनिकै हिरियामालिनि महलन अटी तुरतही आय १३६
जहँ पर माता मकरन्दाकी ऊदन कथा गई तहँ गाय ॥
आवन सुनिकै बघऊदन का माता मकरँद लीन बुलाय १३७
जो कछु गाथा मालिनि भाषी माता मकरँद गई सुनाय ॥
इतना सुनिकै मकरँद चलिभा कुँवना ऊपर पहुँचा आय १३८
कुशल प्रश्न करि सब आपस में मकरँद बोला अतिघबड़ाय ॥
हाल बताओ ऊदनठाकुर हमरे धीर धरा ना जाय १३६
हिरियामालिनि की बातें सुनि माता बैठि महलं पछिताय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले मालिनि बात दिल्लगी भाय १४०
सुनिकै बातें बघऊदन की मकरँद घरका चला लिवाय ॥
ऊदन पहुँचे रनिवासे में देवा टिका द्वार पर आय १४१
हाल बतायो सब महलन में जैसे इन्दल गये हिराय ॥
मारा पीटा जस आल्हा ने सोऊ कथा गये सबगाय १४२
बनी रसोई फिरि महलन में संध्याकाल पहुँचा आय ॥
मकरँद ऊदन भोजन करिकै सोये विकट नींदको पाय १४३
चले दिवाकर घर अपने को पक्षिन लियो बसेरा धाय ॥
लिहे अञ्जली दोउ हाथन में सुरजन अर्ध देयँ द्विजराय १४४
खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय १४५
परे आलसी निजनिज शय्या घों घों करठ रहे घर्राय ॥
गुरू पिता दोऊ पद जिनके तिनके चरणन शीशनवाय १४६