आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 316, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रावलि की चौथ । ३१३ ११
चिट्ठी दीन्ह्यो सो आल्हा को ठाढ़ो भयो शीशकोनाय १७८
लागि कचहरी तहँ आल्हा कै रुमि झुमि रहीं पतुरियानाच ॥
आल्हा बाँचन चिट्ठी लागे हैगा रंग भंग तहँ साँच १७६
पढ़िकै चिट्ठी आल्हा ठाकुर सबको दीन्ह्यो हाल बताय ॥
माहिल ठाकुर की किरपा ते इतना परा परिश्रमआय १८०
फिकिरिम माहिल हैं ऊदनकी निश्चय समुझि परै यहिबार ॥
जाको रक्षक रघुनन्दन है ताको जाय न बाँकोबार १८१
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर बन्धन तुरत दीन छुड़वाय ॥
कहि समुझायो सबलरिकन ते राजै खबरि जनावो जाय १८२
ब्रह्मा आवत इन्द्रसेन सँग इनका बिदा देयँ करवाय ॥
माहिल मामा हमरे लागैं तातेकिहिनिदिल्लगीआय १८३
त्यहिमा सज्जन तुम महराजा सोऊ दया दीन बिसराय ॥
क्षम्यो ढिठाई अब हमरी तुम तुम्हरीशरणगये हमआय १८४
नातेदारी में उत्तमहौ आहिउ कृष्णबंश महराज ॥
गुरू श्वशुर सों संगर ठानैं क्षत्री जन्म युद्धके काज १८५
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर सबको बिदा कीन ततकाल ॥
ब्रह्मा पहुँचे बीरशाह घर औसबकह्यो बनाफरहाल १८६
सुनिकै बातें सब आल्हा की राजा बिदा दीन करवाय ॥
बैठि पालकी में चन्द्रावलि गौरा पारवती को ध्याय १८७
बहुधन दीन्हो ब्रह्मा ठाकुर महरन पलकी लीन उठाय ॥
दशहूँ लरिकिन सों महराजा आये जहाँ बनाफरराय १८८
आवत दीख्यो बीरशाह को आल्हा मिले अगारी आय ॥
मिला भेंटकरि सबसों राजा अपने धाम गये हर्षाय १८६
बाजे डंका भहतंका के आल्हा कूच दीन करवाय ॥