आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ आल्हखण्ड । ५२०
भारी मेला है बिठूर का जो तुम जेहो पूत हिराय २२
हौ इकलौता म्वरी कोखि में ताते मोर प्राण घबड़ाय ॥
इतना सुनिकै इन्दल बोले माता साँच देयँ बतलाय २३
जान न पावैं जो गंगा को तौ मरिजयँ जहरको खाय ॥
हुकुम देवावै की दइवाते की अब घेरै बैठि पछिताय २४
सुनिकै बातें ये इन्दल की सुनवाँ गई सनाका खाय ॥
गई तड़ाका ढिग आल्हा के इन्दल हाल बतावा जाय २५
बातें सुनिकै सब सुनवाँ की आल्हा बोले वचन सुनाय ॥
लिखी विधाता की मेटै को अब तुम देवो पूत पठाय २६
जहर खायकै जो मरिजाई तौहू शोच होय अधिकाय ॥
पार लगैहैं श्रीगंगाजी यहमत ठीक लीन ठहराय २७
इतना सुनिकै सुनवाँ चलिभै इन्दल पास पहुँची आय ॥
औ बुलवायो बघऊदन को सबियाँ हाल कह्यो समुझाय २८
इन्दल बिगरे हैं महलन में गंगा इन्हें देउ अन्हवाय ॥
पै हम सौंपति त्वहिं इन्दलको देवर बार बार शिरनाय २९
किह्यो बखेड़ा नहिं मेला मैं रेला होय तहाँ अधिकाय ॥
वहाँ न जायो इन्दल लैकेँ मान्यो कही वनाफरराय ३०
इतना सुनिकै ऊदन इन्दल दोऊ चलिभे शीश नवाय ॥
जायकै पहुँचे फिरि फौजन में लश्कर कूच दीन करवाय ३१
बायें घोड़ा है देवा का दहिने बेंदुल का असवार ॥
बीच म जावै इन्दल ठाकुर कम्मर परी एक तलवार ३२
पांच दिनौना मारग लागे छठयें दिवस पहुंचे जाय ॥
भारी मेला भा बिठूर मौ आवा तहां कनौजीराय ३३
बाजै डंका तहँ ऊदन का लाखनि धावन लीन बुलाय ॥