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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

२* आल्हखण्ड । ३१२
बन्धनसुनिकै सब लड़िकनको राजा गये सनाकाखाय १६६
खबरि पहुँचिगै रनिवासे में राजा रानी लीन बुलाय ॥
बौहर आई चन्द्रावलि तहँ सोऊगई कथा सब गाय १६७
'हमरे घरके माहिल बैरी उनके चुगुलिनका वयपार ॥
कहा मानिकै तुम माहिल का दादा किह्योयहांलग रार १६८
ना सुनिपावा मैं पहिले ते माहिलदीन्ह्यो रारि लगाय ॥
तौ अस हालत कसहोतै अब तबहीं देति सबै समुझाय १६६
योगी बनिकै ब्रह्मा आये सूरति दीख दूरि ते माय ॥
होति खटपटी जो ऊदन ते ब्रह्माभाय न अउतोधाय १७०
टेक कठिन है बघऊदन कै हम खूब जानैं ठीक स्वभाव ॥
मिलिये दादा अब आल्हा ते याही जानो नीक उपाव १७१
सुनि सुनि बातें सब बौहर की रानी नृपति दीन समुझाय ॥
सुनिकै बातें महरानी की राजा ठीक लीन ठहराय १७२
आगि लगाई माहिल ठाकुर नातेदारी दीन तुराय ॥
राजा सोचत यह अपने मन पहुँचातुरतसिंहासनआय १७३
कलम दवाइति कागज लैकै । चिट्ठी लिखनलाग ततकाल ॥
जितनी बातें माहिल कहिगा लिखिगेयथातथ्यनरपाल १७४
फिरि कछु बातें चन्द्रावलिकी लम्बो पत्तो लिखा बनाय ॥
बन्धन छोरो सब पुत्रन को तुरतै विदा लेउ करवाय १७५
कीनि घटिहई माहिल ठाकुर नाहक रैसा दीन लगाय ॥
कहा मानिकै हम माहिल का साँचोसाँच गयन बौराय १७६
लिखी विधाता कै मेटै को साँचो कहैं गीत सब गाय ॥
लिखिकै चिट्ठी दै धावन को राजा बैठिगये शिरनाय १७७
लैकै चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा जहाँ बनाफरराय ॥