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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 322

इन्दलहरण । २१६ ३.
लड़िका ऊदन अब नाहीं हैं जो तहँ रारि मचैहैं जाय १०
बातें सुनिकै ये माहिल की आल्हा बोले बचन बनाय ॥
तुम चलिजावो माहिल मामा तौ हम ऊदन देयँ पठाय ११
इतना सुनिकै माहिल बोले हम तो करब जाय असनान ॥
करो तयारी ऊदनठाकुर आल्हाबचन मानिपरमान १२
आल्हा बोले फिरि देबाते तुमहूं जाउ साथ यहिकाल ॥
पै तुम बच्यो बघऊदन को जहँपर होय रारिको हाल १३
इतना कहिकै आल्हाठाकुर महलन फेरिगयो अलसाय ॥
करै तयारी ऊदन लागे बाँके घोड़ लीन कसवाय १४
कच्छी मच्छी हरियल मुश्की सुर्खा सुरंगा रङ्ग बिरंग ॥
तुर्का गर्रा पँचकल्यानी सब्ज़ा स्याह एकही रंग १५
चुने सिपाही लिये संग में जिनते हारिगई तलवार ॥
संजा रिसाला घोड़नवाला लग भग जानो एक हजार १६
सजे सिपाही पंद्रासौ लग एकते एक लड़ैया ज्वान ॥
बाजे डंका अहर्तंका के घूमन लागे लाल निशान १७
इन्दल आये त्यहि समया में ऊदन पास पहुंचे आय ॥
हमहूं चलिबे श्री गंगा को चाचा लेवो साथ लिवाय १८
इतना सुनिकै ऊदन बोले बेटा मानो कही हमार ॥
दादा भौजी जो रोकैं ना हमरे साथ होउ तय्यार १६
इन्दल चलिभे तब महलन को माता पास पहुंचे जाय ॥
हाथ जोरिकै इन्दल बोले मातैं बार बार शिरनाय २०
हुकुम कराय देउ दडुवा सों आवों चाचा साथ नहाय ॥
इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटै बारबार समुझाय २१
पर्व दशहरा की टरिजावै फिरि तुम आयो गङ्ग नहाय ॥