आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हखण्ड । ३१८
तुम्ही गुसैयाँ दीनबन्धु हौ ओ ब्रह्मण्यदेव ब्रजराज ॥
लाज रखैया बाम्हन तनकी साँचे एक कृष्ण महराज ४
शरणहि ताकत विप्र सुदामा पायो सकल सम्पदा राज ॥
छूटि सुमिरनी गई कृष्ण की इन्दल ब्याह बखानों आज ५
अथ कथाप्रसंग ॥
परब दशहरा की जग जाहिर बुड़की हेतु जाय संसार ॥
भारी मेला श्रीगंगा को हिंडनक्यार पूर त्यवहार १
बहुतक छैला अलबेला तहँ घोड़न उपर भये असवार ॥
करी तयारी श्रीगंगा की चक्कस लिये बुलबुलनक्यार २
जेठदुपहरी भारी ह्वैकै ब्यारी करैं वृक्षतर आय ॥
देखि गँवाँरी तहँ नारी नर बोला तुरत बनाफरराय ३
कहाँ तयारी नर नारी करि ब्यारी किह्यो यहाँपर आय ॥
देखि बनाफर को नर नारी बोले साँच देयँ बतलाय ४
कीन तयारी हम विठूर की भारी पर्ब दशहरा केरि ॥
चकित ह्वैकै ऊदन दीख्य चारिउ दिशातर्फ फिरिहेरि ५
भारी मेला अलबेला तहँ रेला चला जाय सबराह ॥
घोड़ बेंदुला का चढ़वैया आयो जहाँ बैठ नरनाह ६
हाथ जोरिकै तहँ आल्हा के ऊदन बोले शीश नवाय ॥
करें तयारी हम गंगा की दादा हुकुमदेउ फरमाय ७
इतना सुनिकै आल्हा बोले साँची सुनो लहुरवा भाय ॥
देश देशके राजा अइहैं होई भीर भार अधिकाय ८
रारि मचैहौ तुम मेला में हमपर ऐरी आपदा आय ॥
ताते जावो नहिं मेला को मानो कही लहुरवा भाय ९
इतना सुनिकै माहिल बोले तुम सुनिलेउ बनाफरराय ॥