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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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[Page Header] इन्दलहरण । ३२१ ५

कहि समुझावा त्यहि धावनको डंका बन्द देउ करवाय ३४
हुकुम कनौजी का नाहीं है डंका कोऊ बजावै आय ॥
इतना सुनिकै धावन चलिकै डंका बजत दीन रुकवाय ३५
कहा न मान्यो जब बघऊदन देवा ठाकुर उठा रिसाय ॥
तुम्हें मुनासिव यह चहिये ना सबसों बैर बढ़ावो भाय ३६
चलिकै मिलिये अब लाखनिसों उनसों हुकुम लेउ करवाय ॥
हीनी तुम्हरी कछु हैहै ना मानो कही बनाफरराय ३७
सुनिकै बातें ये देवा की ऊदन मानिगयो त्यहिकाल ॥
पाँच दुमाला दुइ हीरा लै चलिभा देशराजका लाल ३८
नचै पतुरिया त्यहि तम्बूमें ज्यहिमें रहें कनौजीराय ॥
ऊदन ठाकुर तहँ पहुँचतभा राखी भेंट अगाड़ी जाय ३६
हाथ पकरिकै लाखनिराना अपने पास लीन बैठाय ॥
कही हकीकति बघऊदन ने लाखनिहुकुमदीनफरमाय ४०
बाजै डंका इक ऊदन का औरन बन्द देउ करवाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय ४१
सुनो हकीकति अभिनन्दनकी हंसा ताको राजकुमार ॥
त्यहिकी बेटी चित्तरेखा मेला हेतु भई तय्यार ४२
नटिनी सँगमें त्यहि बेटी के जादू क्यार जिन्हें व्यपार ॥
बलखबुखारे को राजा जो त्यहिअभिनन्दननामउदार ४३
त्यहि का बेटा हंसाठाकुर चलिभा बहिनी साथलिवाय ॥
सवालाख लश्कर को लैके ब्रह्मावर्त्त पहुँचा आय ४४
तम्बू गड़िगे त्यहि रेती माँ भारी ध्वजारही फहराय ॥
संग सहेली त्यहि बहिनी की बोली बेटी बचन सुनाय ४५
चलिये हनवन जल्दी करिये अब दिनगयो यामभरआय ॥
२१