आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३२३ ७
लय अलबेली संग सहेली आई देखन गङ्ग बहार ५६
ऊदन इन्दल देवा ठाकुर तीनों गये तहाँपर आय ॥
नाव मँगायो मल्लाहिन ते बैठयोसुमिरि शारदामाय ५७
बैठी नावन में चितरेखा बेखा नटिनिन केरि बनाय ॥
काह बतावैं हम लेखा त्यहि देखा रूप नहीं है भाय ५८
मै अवरेखा चितरेखा को लेखा कामदेव की नारि ॥
उठैं तरङ्गैं तहँ गंगा की जंगा करें वारिसों बारि ५६
लैकेँ पुरिया भैरोंवाली ऊदन उपर दीन सो डारि ॥
बीर महम्मद की पुरिया को देवा उपर चलावा नारि ६०
नजर बन्दभै जब दूनों के तुरतै इन्दल लीन उतारि ॥
सुवा बनायो सो इन्दल को पिंजरा लीन तड़ाका डारि ६१
उतरिकै नावनसों जल्दी सो तम्बुन गई तड़ाका आय ॥
उतरी जादू जब ऊदन की तबनहिं इन्दल परे दिखाय ६२
जब नहिं दीख्यो तहँ इन्दलको ऊदन तुरत गये घबड़ाय ॥
जार मँगाये तहँ लोहे के सो गंगा माँ दये डराय ६३
मच्छ कच्छ बहुतक फँसिआये पै नहिं इन्दल परे दिखाय ॥
तिल तिल ढूंढ़ा भुइँ मेला में ऊदन देवा संग लिवाय ६४
पता न पायो जब इन्दल को तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥
कही हकीकति तहँ माहिल ते नाहर उदयसिंह तहँ गाय ६५
सुनिकै बातें उदयसिंह की माहिल बोले वचन बनाय ॥
करो अँदेशा कछु जियरेना आल्है द्याव वहाँ समुझाय ६६
जादू कै कै कोउ इन्दल का साँचो लियो बनाफरराय ॥
घरने द्वैकै फिरि तुम ढूंढ़यो ह्वाँते कूच देउ करवाय ६७
इतना सुनिकै उदयसिंह ने डंका कूच दीन बजवाय ॥