आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ \qquad आल्हाखण्ड । ३२८
पूत हमारे के मारन को \qquad ऊदन मेला गये लिवाय ११६
बातें सुनिकै ये आल्हा की \qquad द्यावलि ठाढ़ि रही शिरनाय ॥
ऊदन ठाकुर को आल्हा ने \qquad कोड़न चर्सा दीनउड़ाय ११७
औ ललकारा फिरि ऊदन को \qquad आल्हा दाँतन ओठ चबाय ॥
धिक धिक तेरी रजपूती का \qquad इन्दल बिना पहुँचे आय ११८
दशहरिपुरवा अब आये ना \qquad नहिंहानिदरौं खङ्ग के घाय ॥
जहँ मनभावै तहँ चलिजावै \qquad साँची शपथ शारदामाय ११९
सुनिकै बातें ये आल्हा की \qquad ऊदन चला बहुत घबड़ाय ॥
सुनवाँ फुलवा द्यावलि तीनों \qquad पृथ्वी गिरीं पछारा खाय १२०
देवा ऊदन दोऊ ठाकुर \qquad सिरसागढ़ै पहुँचे जाय ॥
खबरि पायकै मलखाने ने \qquad फाटकबन्दलीन करवाय १२१
यह गति देख्यो उदयसिंहने \qquad ठाढ़ो लाग तहाँ पछिताय ॥
कोऊ साथी नहिं विपदा में \qquad यह देवाते कह्यो सुनाय १२२
\qquad\qquad सवैया ॥
जाकि सुता हरिके गृह शोभित चन्द्रललाट महेश प्रवीनो ।
इन्द्र गयन्द दयो हय रबिको देवन धेनु द्रुमादिक दीनो ॥
शिरी मुनिरायजू कोपकियो तब गण्डकधारि सबै जलपीनो ।
एते बड़ेको विपत्तिपरी तब सिंधुकि काहु सहाय न कीनो १२३
इतना सुनिकै देवा बोला \qquad साँची सुनो लहुरवा भाय ॥
साथ तुम्हारो हम छाँड़व ना \qquad चहुतनधजीधजीउड़िजाय १२४
पै हम बांचे बहु पुराण हैं \qquad देखी कथा अनेकन भाय ॥
विपतिमें साथी कोउ विरलाहै \qquad साँची सुनो बनाफरराय १२५