आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१ आल्हखण्ड । ३१४
चौंड़ा सूरज दिल्ली पहुँचे आल्हा गये मोहोबे आय १६०
बेटी पहुँची जब महलन में मल्हना मिली अगाड़ी धाय ॥
बारह रानी परिमालिक की बेटी देखि गई हरषाय १६१
सावन भावन गावन लागीं आवन लागि विदेशी ज्वान ॥
मल्लन कल्लन फरकन लागे थिरकनलागिमेघअसमान १६२
दादुर बोलन जलमें लागे विरहिन उठी करेजे पीर ॥
बिना पियारे घर पीतम के कैसे धरै नारि मनधीर १६३
सवैया ॥
कैसे धरै मनधीर तिया परदेश पिया ज्यहि सावन छाये ।
राग औरङ्ग अनंग कि जंग उमंग भरै पियकी सुधिआये ॥
गात सबै तियके सकुचात बिदेश परे पिय पेट खलाये ।
कहाकहूँ ललिते विधिप्रीति अनीति किरीति सदादरशाये १६४
गवैं सुहागिल सब सावन में बारामासी मेघ मलार ॥
गड़े हिंडोला हैं घर घर में दर दर सावन केरि बहार १६५
काग उड़ावन उनघर लागीं जिन घर परे पिया परदेश ॥
सावन रावन उनके लागै जिनके चिट्ठीके अन्देश १६६
नहीं तो सावन अतिपावन है गावन गीत क्यार त्यवहार ॥
हमें सुहावन मनभावन है सावनक्यारसकलव्यवहार १६७
चौथि पूरिभै चन्द्रावलि कै ह्योति होय तरंग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १६८
सेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥
तारागण सब चमकन लागे सावन मेघ रहे घहराय १६६
कहुँ कहुँ तारा कहुँ कहुँ वादल नभहू भयो कलियुगी आय ॥