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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

इन्दलहरण । ३२५ ९
आल्हा मैने साँची जानो ऊदनकीन्ह साँचयहकाज ८०
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर गरुई हाँक दीन ललकार ॥
टरिजा टरिजा उरई वाले तोरे चुगुलिन का बयपार ८१
साँची साँची आल्हा ठाकुर तुम्हरे। इन्दल गयो हिराय ॥
कहौं असाँचा आल्हा ठाकुर साँचा सहों पुत्रका घाय ८२
करों दिल्लगी अस कबहुँ ना साँची सुनो बनाफरराय ॥
ऊदन बोले ह्याँ देवा ते हमरो चित्त बहुत घबड़ाय ८३
दशहरिपुरवा माहिल पहुँचे कैसी खबरि सुनावै जाय ॥
पुत्र शोक सम दुख दूसर ना जानतगाथ भली तुम भाय ८४
पुत्र शोक सों दशरथ मरिगे कीरति रही जगत में आज ॥
कीरतिसागर भट नागर जे आगर सबैग़ुणन रघुराज ८५
तेई खिवैया अब नैया के भैया काह करें धौं आज ॥
यहु दिन आये लग ध्यावै जो कलयुगसत्रुझकशिरताज ८६
सोई कलयुग के ऊदन हम साँचे कर्म्म कीन रघुराज ॥
दया न छोड़ा द्विज गाइन ते पीठि न दीन प्राणकेकाज ८७
नहिं अभिमानी बातें ठानी बालक विप्र साथ महराज ॥
परम पियारे द्विज तुम का हौ निर्मलएकक्षत्रराज्यहिभ्राज ८८
ऐसी स्तुति ऊदन कीन्ह्यो देवा चलत भयो ततकाल ॥
आयकै पहुँच्यो त्यहि मंदिर में ज्यहिमें देशराजको लाल ८६
ठाढ़े दीख्यो जब देवा को चलिभा उरई का सरदार ॥
भल भल रोंका आल्हा ठाकुर करिकै बहुतभांति सतकार ६०
पै नहिं मान्यो जब माहिल ने आयसु दियो बनाफरराय ॥
देखिकै सूरति फिरि देवा की आल्हागये बहुत घबड़ाय ६१
कैसी गुजरी है तीरथ में देवा साँच देय बतलाय ॥