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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

१४ आल्हखण्ड । ३३०
परी मुसीबत हमरे ऊपर पृथ्वी मोहबा लीन लुटाय ॥
छोड़ बेंदुला फुलवा सुनवाँ लीन्ह्यो जीति पिथौराराय १३५
करब नौकरी हम मकरँद कै महलन खबरि जनावै जाय ॥
इतना सुनिकै हिरियामालिनि महलन अटी तुरतही आय १३६
जहँ पर माता मकरन्दाकी ऊदन कथा गई तहँ गाय ॥
आवन सुनिकै बघऊदन का माता मकरँद लीन बुलाय १३७
जो कछु गाथा मालिनि भाषी माता मकरँद गई सुनाय ॥
इतना सुनिकै मकरँद चलिभा कुँवना ऊपर पहुँचा आय १३८
कुशल प्रश्न करि सब आपस में मकरँद बोला अतिघबड़ाय ॥
हाल बताओ ऊदनठाकुर हमरे धीर धरा ना जाय १३६
हिरियामालिनि की बातें सुनि माता बैठि महलं पछिताय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले मालिनि बात दिल्लगी भाय १४०
सुनिकै बातें बघऊदन की मकरँद घरका चला लिवाय ॥
ऊदन पहुँचे रनिवासे में देवा टिका द्वार पर आय १४१
हाल बतायो सब महलन में जैसे इन्दल गये हिराय ॥
मारा पीटा जस आल्हा ने सोऊ कथा गये सबगाय १४२
बनी रसोई फिरि महलन में संध्याकाल पहुँचा आय ॥
मकरँद ऊदन भोजन करिकै सोये विकट नींदको पाय १४३
चले दिवाकर घर अपने को पक्षिन लियो बसेरा धाय ॥
लिहे अञ्जली दोउ हाथन में सुरजन अर्ध देयँ द्विजराय १४४
खेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय १४५
परे आलसी निजनिज शय्या घों घों करठ रहे घर्राय ॥
गुरू पिता दोऊ पद जिनके तिनके चरणन शीशनवाय १४६