आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
चन्द्रावलि की चौथि । २६५ १३
मैं अब देखों जस ऊदन को मालिनितसतुमकरोउपाय १३१
बातें सुनिकै चन्द्रावलिकी मालिनि कहाबचनसमुझाय ॥
निशा अँधेरी है सावन की तुमको ऊदनलवैं दिखाय १३२
इतना सुनिकै मालिनि सँग में ऊदन पास पहुँची जाय ॥
बहिनी प्यारी चन्द्रावलि तहँ बोली सुनो बनाफरराय १३३
बाहर आवो तुम खन्दक के अपने घोड़ होउ असवार ॥
निर्भय जावो तुम मोहबे को भाई उदयसिंह सरदार १३४
इतना सुनिकै ऊदन बोले बहिनी साँच देयँ बतलाय ॥
चोरी चोरा जो घर जावैं तौ रजपूती धर्म नशाय १३५
खबरि जो पइहैं सिरसावाले अइहैं तुरत बीर मलखान ॥
सुखसों सोवो तुम महलन में करिहैंकुशलमोरिभगवान १३६
इतना सुनिकै बहिनी चलिभै महलन फेरि पहुँची आय ॥
लिखी हकीकति सब मलखेको खन्दक परे लहुरवाभाय १३७
लिखिकै पाती सुवना गरमें बांधिकै दीन्ह्यो तुरत उड़ाय ॥
जावो सुवना तुम मोहबे को मल्हना महल पहुँचोजाय १३८
उड़िकै सुवना तहँ ते चलिभा नरवरगढ़ै पहुँचा आय ॥
मकरँद घूमै ज्यहि बगियामें सुवना बैठ तहाँपर जाय १३६
चकित घूमै मकरन्दा तहँ परिगै दृष्टि सुवापर आय ॥
पाती दीख्यो गल सुवना के तुरतै लीन तहाँ पकराय १४०
पढ़िकै पाती लै सुवना को सो नरपतिको दीन दिखाय ॥
पाछे पहुँचा फिरि महलन में रानी खबरि जनाई जाय १४१
सुनी हकीकति जब रानी ने पाती गले दीन बँधवाय ॥
सुवना चलिभा नरवरगढ़ ते पहुँचा नगर महोबेआय १४२
मल्हना ठाढ़ी रह अण्टापर सुवना बैठ तहाँपर जाय ॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
१४ आल्हाखण्ड । २६६
पाती दीन्ही गल सुवना के मल्हना नाम दीन बतलाय १४३
सुन्यो जबानी जब मल्हना की सुवना बैठ हाथ पर आये ॥
छोरिकै पाती मल्हना रानी आँखि अँकुन जरिकै जाय १४४
पढ़िकै पाती रानी मल्हना रूपना बारी लीन बुलाय ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो महारानी ने औ सब हाल कह्यो समुझाय १४५
लै कै चिट्ठी रूपना चलिभा मलखे पास पहुँचा जाय ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो मलखाने को औरो हाल गयो सब गाय १४६
पढ़िकै चिट्ठी मलखाने ने तुरतै फौजन कीन तयार ॥
जितने क्षत्री रहें सिरसा में सबियाँ बाँधि लीन हथियार १४७
लै कै फौजैं मलखाने फिरि पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥
खबरि पठाई फिरि आल्हा को राजा पास पहुँचे जाय १४८
हाथ जोरिकै मलखे बोले दोऊ चरणन शीश नवाय ॥
कीन तयारी हम बौरी को ब्रह्मै साथ देउ पठवाय १४६
सुनिकै बातें मलखाने की बोले तुरत चँदेलेराय ॥
शकुन उठावो देवा ठाकुर देषो हार जीत बतलाय १५०
पाय निकै बातें महाराजा की ज्योतिष पुस्तक लीन उठाय ॥
जायक शकुन उठायो देवा ठाकुर बोल्यो हाथ जोरि शिर नाय १५१
देखि ह तुम्हारी बौरी द्वैहै राजन सत्य दीन बतलाय ॥
मन में फौजैं आल्हा ठाकुर तबल गगये तहाँ पर झाय १५२
तवलों मालिन दिननायक सों झण्डा गड़ा निशा को आय ॥
ऐसो पाहुन नत्र चमकन लागे पक्षी गये बसेरन धाय १५३
को समुझावै टिया तकि तकि घों घों कण्ठ रहा घर्षाय ॥
सुनिकै बातें ये रघुनन्दन के सन्त न धुनी दीन परचाय १५४
अपने को ह्याँ ते करौं तरँग को अन्त ॥
वन्दावलि की चौथि। २६७ १५
राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १५५
इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुन्शी नवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपेंड़रीकलांनिवासि
मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत
ऊदनबन्धनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥
सवैया ॥
ध्यावत तोहिं सरस्वति मातु करो निज सेवकपै अब दाया ।
शारद नारदके पद ध्याय मनावत तोहिं सदा रघुराया ॥
गावतहौं गुण गोबिंद के अरु पावतहौं नितही मनभाया ।
नावतहौं शिर बारहिं बार करो ललिते कर मातु सहाया १
सुमिरन ॥
दोउ पद ध्यावों जो बर पावों सो सुनिलेउ शारदा माय ॥
जस जस गावों मैं आल्हा को तसतस सुखी होउँ अधिकाय १
माता भ्राता त्राता ताता नाता तुममा दीन लगाय ॥
तारो बोरो जो अब चाहो हमतो शरण तुम्हारी माय २
बेद पुराण श्रुति असमृति में जाँचा साँचा हमअधिकाय ॥
तुम्ही भवानी शारद मइया सेबका सार परी दिखराय ३
तव पद बिछुरे उर हमरे ते मूरखचन्द कहैं सब गाय ॥
ताते बिछुरैं पद उरते ना यह बर मिलै शारदामाय ४
छूटि सुमिरनी गै शारद कै अब आगे के सुनो हवाल ॥
मलखे आल्हा बौरी जैहैं हैहैं तहां युद्ध विकराल ५
अथ कथाप्रसंग ॥
उदय दिवाकर भे पूरबमें किरणनकीनजगत उजियार ॥
हुकुम पायकै मलखाने को सवियाँ फौज भई तय्यार १
सजि पचशब्दा गा आल्हाका तापर होत भयो असवार ॥
१६ आल्हखण्ड । २९८
घोड़ी कबूतरी की पीठि पर बैठ्यो सिरसा का सरदार २
चढ़ा मनोहर की पीठि पर देवा मैनपुरी चौहान ॥
ब्रह्मा ठाकुर हरनागर पर बैठे सुमिरि राम भगवान ३
गर्भ गिराविनि कुँवाँ सुखाविनि लक्षिमिनि तोप भई तय्यार ॥
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ४
रणकी मौहरि बाजन लागी घूमन लागे लाल निशान ॥
छाय लालरी गै अकाश में लोपे अन्धकार सों भान ५
पहिल नगारा में जिन बन्दी दुसरे बांधिलीन हथियार ॥
तिसर नगाराके बाजत खन हाथी घोड़न भये सवार ६
चौथ नगारा बाजन लाग्यो मलखे कूच दीन करवाय ॥
हाथी चलिभे दल बादल सों घण्टा गरे रहे हहराय ७
कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउ कोउ मोरचालपरजाय ॥
सरपट जावै कोउ कोउ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८
खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं पवनकी चाल ॥
मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजैं हाव हाव करनाल ६
बाजै डङ्का अहतङ्का के बङ्का सबै शूर सरदार ॥
शङ्का नाहीं क्यहु जियरे में चहुदिन शक्तिचलै तलवार १०
लश्कर पहुँचा सब दिल्ली में क्षत्रिन कीन तहाँ विश्राम ॥
इकलो मलखे त्यहि समया में पहुँचा पृथीराज के धाम ११
बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो तहँ पर बैठ बीर मलखान ॥
सबियाँ गाथा बौरीगढ़ की मलखे कीन तहाँपर गान १२
सुनी हकीकति जब मलखे की चौंड़ा सूरज लीन बुलाय ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो पृथीराज नें चौंड़ै फेरि कह्यो समुझाय १३
कह्यो जबानी बीरशाह ते जल्दी विदा देयँ करवाय ॥
चन्द्रावलि की चौथ । २९९ १७
कलहा लरिका बच्छराज का नामी सबै बनाफरराय १४
लड़िकै जितिहौ तुम इनते ना मरिकै सात धरौ अवतार ॥
लैके फौजैं सूरज बेटा मलखे साथ होउ तय्यार १५
विदा माँगिकै महराजा ते सूरज सिरसा का सरदार ॥
आये फौजन में मलखाने सब दल बेगि भयो तय्यार १६
गज इकदन्ता चौंड़ा बैठ्यो सूरज सब्जा पर असवार ॥
कूच को डङ्का बाजन लाग्यो हाथिन घोर कीन चिग्घार १७
चलिभइँ फौजैं दल बादल सों बौरीगढ़ै गई नगच्याय ॥
आठकोस जब बौरी रहिगै आल्हा डेरा दीन गड़ाय १८
तम्बू गड़िगा तहँ आल्हाका बैठे सबै शूरमा आय ॥
आल्हा बोले तहँ देवा ते कहिये करिये कौन उपाय १६
इतना सुनिकै देवा बोला साँची तुम्हें देयँ बतलाय ॥
योगी बनिकै बौरी चलिये तौसबहालठीकमिलिजाय २०
यह मन भाई मलखाने के गुदरी पहिरि लीनतत्काल ॥
आल्हा देवा ब्रह्मा ठाकुर इनहुनतिलक लगायोभाल २१
लीन बाँसुरी ब्रह्मा ठाकुर खँझरी मैनपुरी चौहान ॥
कर इकतारा आल्हा लीन्ह्यो डमरू लीन वीर मलखान २२
चारो चलिभे फिरि तम्बुन ते बौरीगढ़ै पहुँचे आय ॥
बजी बाँसुरी तहँ ब्रह्माकी देवा खँझरी रहा बजाय २३
टप्पा ठुमरी भजन रेखता मलखे गावैं मेघ मलार ॥
को गति बरवै इकतारा कै बाजैं खूब लोह के तार २४
रूप देखिकै तिन योगिन का मोहे सबै नारिनर बाल ॥
बात फैलिगै बौरीगढ़ में योगी आये खूब विशाल २५
भा खलभल्ला औ हल्लाअति पहुँचे वीर शाहके द्वार ॥
१८ आल्हखण्ड । ३००
तजिकै लज्जा चलीं इकल्ला बल्लन क्यार मनों त्यौहार २६
अटाके ऊपर कढा करनको नारिन पैन नैन हथियार ॥
कड़ाके ऊपर छड़ा विराजैं तिनपर पायजेब झनकार २७
कर इकत्तारा आल्हा लीन्हे नीचे करें तारसों रार ॥
बजै बाँसुरी भल ब्रह्माकै मानो लीन कृष्ण अवतार २८
उपमा नाहीं शिरीकृष्ण कै तीनों लोकन के कर्त्तार ॥
काह हकीकति है ब्रह्मा कै पै यह बँसुरी केरि बहार २६
बाजै खँझरी भल देवा कै मलखे करें तहाँ पर गान ॥
देखि तमाशा तहँ योगिनका लागे कहन परस्पर ज्वान ३०
ऐसे योगी हम देखे ना दाढ़ी गई सपेदीछाय ॥
गङ्गासागर के संगमलौं देखा देश देश अधिकाय ३१
बीरशाह तब बोलन लाग्यो चारों योगिन ते मुसुकाय ॥
कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ३२
सुनिकै बातें महराजा की मलखे बोले वचन बनाय ॥
हम तो आये प्रागराज ते जावैं हरद्वार को भाय ३३
भोजन पावैं हम क्षत्रिन घर बृत्ती यहै लीन ठहराय ॥
होय जनेऊ ज्यहि घर नाहीं छत्री कौन भांति सो आय ३४
जनमत ब्राह्मण क्षत्री बनियाँ तीनों शूद्र सरिस हैं भाय ॥
होय जनेऊ जब तीनों घर तब यह वर्ण ठीक ठहराय ३५
जो मर्यादा तुम छोड़ा ना तौ घर भोजन देउ कराय ॥
कलियुग आवा महराजा है ताते साफ दीन बतलाय ३६
हम नहिं भोजन करें शूद्र घर चहु मरि जायें पेटके घाय ॥
यकडस लंघन चहु दैजावें पैनहिं सिंहघासको खाय ३७
सुनिकै बातें ये योगी की भामन खुशी यादवाराम ॥
चन्द्रावलि की चौथि। ३०१ १६
ओ यह बोला फिरि योगिनते हमहूँ साँच देयँ बतलाय ३८
तुम्हरो हमरो मत एकै है शंका आप देउ बिसराय ॥
पतित न क्षत्री कोउ बौरीगढ़ यादव बंश यहां अधिकाय ३६
पापी आयो इक मोहबे ते ताको खन्दक दीन डराय ॥
औरन पापी कोउ बौरी में तुमको सांच दीन बतलाय ४०
इतना सुनिकै मलखे बोले ओ महराज यादवराय ॥
कैसो खन्दक कैसो पापी दर्शन हमें देउ करवाय ४१
कबहुँ खन्दक हम देखाना तुमते साँच दीन बतलाय ॥
बड़ी लालसा भै जियरे माँ खन्दक आप देउ दिखलाय ४२
इतना सुनिकै महराजा तब योगिन लीन्ह्यो साथ लिवाय ॥
जौने खन्दक में ऊदन थे सो महराज दिखावा जाय ४३
ऊदन दीख्यो जब योगिन को नीचे लीन्ह्यो शीश नवाय ॥
चारो योगी तहँते चलिभे पहुँचे राजभवन में आय ४४
भयो बुलौवा फिरि भोजन को मलखे बोले वचन बनाय ॥
आजु यकादशि निर्जल बर्ते राजन साँच दीन बतलाय ४५
करैं बसेरो नहिं बस्ती में जंगल बास करैं सब काल ॥
बिदा मांगिकै महराजा ते चारो चलत भये ततकाल ४६
आयकै पहुँचे फिरि फौजनमें अंगड़ खंगड़ धरे उतार ॥
सुरंग खुदायो मलखाने ने क्षत्रिन तुरत कीन तय्यार ४७
जौने खन्दक में ऊदन थे फूटो सुरंग तहाँपर जाय ॥
सुरंग के भीतर सों बघऊदन पहुँचे फौज अपनी आय ४८
जैसे पियासा पानी पावै तैसे खुशी भये सब भाय ॥
बाजे डंका अहलंका के शंका सबन दीन बिसराय ४६
मलखे बोले तहँ आल्हा ते लश्कर कूच देउ करवाय ॥
२० आल्हखण्ड । ३०२
बिदा करावैं चन्द्रावलि को तव यश जाय जगतमैछाय ५०
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर बोले करौ यहै अब भाय ॥
हुकुम पायकै यहु आल्हा को मलखे कूच दीन करवाय ५१
चलिभैं फौजें दलबदल सों बौरीगढ़ै गई नगन्य्याय ॥
प्रलय मेघ सम बजैं नगारा हाहाकार शब्द गा छाय ५२
गा हरिकारा तब बौरी में राजनै खबरि जनाई जाय ॥
फौजै आई क्यहु राजा की बौरी डांड़ दबायनि आय ५३
सुनिकै बातें हरिकाराकी राजा गयो सनाकाखाय ॥
मलखे बोले ह्यां रूपन ते कहियो बीरशाह ते जाय ५४
सुरुँग खोदिकै बघऊदन को आल्हा ठाकुर लीन निकारि ॥
बिदा कराये बिन जैहैं ना ताते करो नहीं तुमरारि ५५
बहिनी व्याही तुम्हरे घरमाँ ताते क्षमाकीन यहिवार ॥
नहिं अस ठाकुर को जन्माजग जाते मानि लीन हमहार ५६
इतना सुनिकै रूपन चलिभा बौरीगढ़ै पहुॅँचा जाय ॥
खबरि सुनाई महराजा को, जो कछु कह्यो बनाफरराय ५७
सो नहिं भाई बीरशाह मन बोल्यो तुरत बचन ललकार ॥
काह हकीकति है आल्हा कै आवैं विदा करावन द्वार ५८
हठ नहिं छोड़्यो दुर्योधन ने औ मरिगयो सहित परिवार ॥
खबरि जनावो तुम आल्हा को हमरे साथ करैं तलवार ५६
इतना सुनिकै रूपन चलिभे फौजन फेरि पहुँचे आय ॥
कही हकीकति बीरशाह की सुनि जरि उठे बनाफरराय ६०
हुकुम लगायो निज फौजनमें सबियां शूर होयँ तय्यार ॥
हुकुम पायकै मलखाने को क्षत्रिन बांधिलीन हथियार ६१
गजैं चढ़ैया गजपर चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ॥
चन्द्रावलि की चौथि। ३०३ २१
झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथम लीन ढाल तलवार ६२
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कोताखानी लीन कटार ॥
रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार ६३
सजा बेंदुला का चढ़वैया लाला-देशराज का लाल ॥
को गति बरणै मलखाने कै जाको डरै देखि नरपाल ६४
बड़ा लड़ैया भीषमवाला देवा मैनपुरी चौहान ॥
ब्रह्मा ठाकुर सजि ठाढ़ो भो करिकै रामचन्द्रको ध्यान ६५
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बन्दी कीन समरपद गान ॥
बाजे डंका अहलंका के घूमनलागे लाल निशान ६६
हिंया कि गाथा ऐसी गुजरी सुनिये बीरशाहको हाल ॥
सुरज जुरावर दोउ पुत्रन को तुरतै बोलि लीन नरपाल ६७
करो तयारी समरभूमिकै अपनी फौज लेउ सजवाय ॥
जान न पावैं मोहबेवाले सबकी कटा देउ करवाय ६८
हुकुम पायकै महराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥
सजे सिपाही बौरी वाले मनमाँ श्रीगणेशपदध्याय ६९
अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥
सजि इकदन्ता दुइदन्ता गे तिनपर हौदा रहे बिराज ७०
कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥
ताजी तुरकी पँचकल्यानी सुरखा सुरँगा भये तयार ७१
चढ़ि अलबेला तिन घोड़नपर अपने बांधि लये हथियार ॥
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे हाथम लिये ढाल तलवार ७२
वार्जी तुरही मुरही ऐसी पुप्पूं पुप्पूं परा सुनाय ॥
बाजे डफला अलबेला सब शूरन मेला दीन लगाय ७३
मारु मारु करि मौहरि वार्जी वार्जी हाय हाय करनाल ॥
२२ आल्हाखण्ड । ३०४
खर खर खर डर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल ७४
सुर्खा घोड़ा चढ़ जुरावर सूरज सब्जापर असवार ॥
सुमिरि भवानी सुत गणेश को दोऊ चलन भये सरदार ७५
घोड़न वरणों की असवारन पैदर सेना तीस हजार ॥
तीन सहस हाथिन पर सोहैं बाँके यादव परम जुझार ७६
बाम्हन थोरे क्षत्री ज्यादा लीन्हे कठिन धार तलवार ॥
गर्ज्जति आवैं समरभूमि को एकते एक शूर सरदार ७७
कायर हल्ला खलभल्ला में तल्ला छोड़ि प्राण के दीन ॥
खुशी छायगै मन शूरन के मानों जीति इन्द्रपुर लीन ७८
बजे नगारा ठनकारा के दारा गर्भपात सुनिकीन ॥
गये दरारा उर कायर के सायर सत्यसत्य कहिदीन ७६
उइ धिरकारैं अपने तनका मनमाँ बार बार पछितायँ ॥
भैंसि वियानी घर हमरे मा माठा दूध केर अधिकाय ८०
हाय रुपैया मोरे डारैं लीन्हे समरभूमि को जायँ ॥
दैया मैया भैया कहिकै ज्वैया हेतु बहुत पछितायँ ८१
शूर यशोमति मैया वाले भैया गैयन के चरवाह ॥
नाव खिवैया भवसागर के नागर कृष्णचन्द्र नरनाह ८२
तिनका सुमिरण मन अन्तर करि तत्पर भये स्वामि के काज ॥
करि अभिलाषा समरभूमि कै राखे मनै धर्म की लाज ८३
पढ़ि अशलोक न तजि शोकन को लोकन केर मिले जनुराज ॥
तैसे गाने मनअन्तर में बाजे तहाँ शूर शिरताज ८४
बाजे बाजे बाजे सुनिकै लाजे मनै आपने बीच ॥
तिनको कहियत हम अपनी दिशि जानो सकल नरन में नीच ८५
इम अनुमाना मन अपने है जाना नारि वित्तको कीच ॥
चन्द्रावलि की चौथ । ३०५ २१
पै हम त्यागी अनुरागीना लागी आश नारिधनबीच ८६
आपै त्यागी अनुरागीना तौ कस कहै नारिधन कीच ॥
साँच बखानैं हम अपनीदिशि सोई सकल नरनमें नीच ८७
पै यहु कलियुग बाबा आयो छायो रहै मनै संताप ॥
मन नहिं इस्थिर क्षणहू होवै कैसे होय मुनिन में थाप ८८
जपतै माला गायत्री के आला परब्रह्म के ध्यान ॥
यहु मन काला भाला मारै जो सब इन्द्रिनमें बलवान ८६
नीच न कहिये यहि कालामें जो कोउ साँच बिप्रको बाल ॥
युग यहु पाजी बदिकै बाजी राजानको किह्योबिहाल ६०
ऐसे पाजी की राजी में सूरज बीरशाह का लाल ॥
जायकै पहुँच्यो समरभूमि में अब मलखेका सुनो हवाल ६१
सो जब दीख्यो आसमानको छाई खूब गर्द गुब्बार ॥
हँसिकै बोला रणशूरन ते सँभरो सबै शूर सरदार ९२
इतना कहतै फौजैं आईं तोपन होनलागि तहँ मार ॥
अररर अररर तोपैं छूटीं हाथिन घोर कीन चिग्घार ६३
को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी भयो भयङ्कर मार ॥
नावैं गोला जौनी दिशिको तौनी दिशिकोकरैं चिथार ९४
सवैया ॥
भभकार उठैं तहँ गोलन की फुफकार करैं रण में गजराजा ।
धुधकार नगारनकी गमकी चमकी तलवारि जुरे सबराजा ॥
अपार जुझार करैं तहँ मार न डरैं मन नेकहु एकहुसाजा ।
समाजऔसाजदोऊदिशिमें अबलैरैललितेसबहीजयकाजा६५
बड़ी लड़ाई भै तोपन कै लोपे अन्धकार सों भान ॥
२०
२४ आल्हखण्ड । ३०६
छाय अँधेरिया गै दशहूंदिशि कतहूँ न सूझै अपन विरान ६६
धावा ह्वैगा दोऊ दल का दोऊ भये बरोबरि आय ॥
सूरजठाकुर बौरी वाला सिरसा क्यार बनाफरराय ९७
दोऊ सोहैं भल घोड़नपर लीन्हे हाथ ढाल तलवार ॥
द्वउ ललकारन मारन लागे सम्मुख होत होत सरदार ९८
सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़ा महौतनक्यार ॥
हौदा हौदा यकमिल ह्वैगा औ असवार साथ असवार ९९
कल्ला भिड़िगे असवारन के लागी होन भड़ाभड़ मार ॥
छूटे ऊना लण्डन वाले कोताखानी चलीं कटार १००
बिजुली दमकै कउँधा चमकै तैसे धमकिरही तलवार ॥
मलखे ठाकुर शूर जुरावर दोऊ लड़नलागि सरदार १०१
सूरज ऊदन की भेंटन में लेंटनलागि सिपाही ज्वान ॥
परे लपेटे भट भेटे जे लेटे समर भूमि मैदान १०२
मनो ससंटे यम भेटे में लेटे क्षत्री परम जुझार ॥
वहैं पनारा तहँ रक्तन के औ हिलकारा उठै अपार १०३
को गति बरौँ तहँ पैदल की बाजै घूमि घूमि तलवार ॥
अपन परावा कछु सूझैना जूझै जूझ जूझ त्यहिबार १०४
बड़ी लड़ाई भै बौरीगढ़ मलखे सूरज के मैदान ॥
फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान १०५
बड़ा लड़ैया सिरसा वाला ज्यहिते हारि गई तलवार ॥
घोड़ी कबूतरी रणमें नाचे साँचे शूरवीर सरदार १०६
सूरज बोले तिन मलखे ते ठाकुर मानो कही हमार ॥
लौटि महोबे जल्दी जावो तबहीं कुशलरखाकरतार १०७
इतना सुनिके मलखे बोले तुमते साँच देयँ बतलाय ॥
चन्द्रावलि की चौथ । ३०७ २५
बिदा कराये बिन जैबैना बहुतनधजीधजीउड़िजाय १०८
सूरज बोले मलखाने ते यह नहिं होनहार यहिबार ॥
इतना कहिकै सूरज ठाकुर अपनी खैंचिलीनतलवार १०६
ऐंचिकै मारा मलखाने के मलखे लीन ढालपर वार ॥
आल्हा बोले मलखाने ते ठाकुर सिरसा के सरदार ११०
पकरिकै बाँधो तुम सूरज को इनपर करो नहीं अब वार ॥
गरुहर नाते के लड़िकाहैं मानों सिरसाके सरदार १११
सुनिकै बातें ये आल्हा की तुरतै उतरिपरा मलखान ॥
पकरिकै बाँध्यो रणमण्डल में देखें खड़े अनेकन ज्वान ११२
सूरज बन्धन दीख जुरावर पहुँचा तुरत तहाँ पर आय ॥
औ ललकारा मलखाने को ठाढ़े होउ बनाफरराय ११३
इतना सुनिकै बघऊदन ने तुरतै पकरि जुरावर लीन ॥
उतरि कबुतरी ते मलखाने बन्धनतुरत तहाँपर कीन ११४
दूनों लरिका बीरशाह के आल्हाठाकुर लीन बँधाय ॥
भागीं फौजैं बौरीगढ़ की काहू धरा धीर ना जाय ११५
खबरि सुनाई बीरशाह को क्षत्रिन नीचे शीश नवाय ॥
बन्धन सुनिकै दउ पुत्रन को दुखिया भयो यादवाराय ११६
इन्द्रसेन औ मोहन बेटा इनको तुरत लीन बुलवाय ॥
हाल बतायो समरभूमि को आशिर्वाद दीन हर्षाय ११७
करो तयारी सब भाइन सह आल्है पकरि दिखावो आय ॥
इतना सुनिकै सबियाँ बेटा चलिभे राजै शीश नवाय ११८
आयकै पहुँचे निज सेनन में डंका तुरत दीन बजवाय ॥
बाजे डंका अहर्तंका के हाहाकार शब्द गा छाय ११९
पहिल नगारा में जिन बन्दी डंके शूर भये हुशियार ॥
२६ आल्हाखण्ड । ३०८
तिसर नगारा के बाजत खन क्षत्री समर हेतु तैयार १२०
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ॥
रण की मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार १२१
चालिमै सेना बौरीगढ़ सों हाहाकारी परै सुनाय ॥
घरी मुहूरत के अन्तर में पहुँचे समरभूमिमें आय १२२
आल्हा ऊदन मलखे सुलखे देवा मैनपुरी चौहान ॥
सब रणशूरन त्यहि समया में भारी भीर दीख मैदान १२३
उड़ी कबुतरी मलखाने की हौदन उपर पहुँची जाय ॥
मलखे मारै तलवारिन सों घोड़ी देय टापके घाय १२४
मोहन ठाकुर उदयसिंह को परिगा समर बरोबरि आय ॥
भई कसामसि समरभूमि में औ तिलडरा भुईं ना जाय १२५
को गति वरणै रजपूतन कै दूनों हाथ करैं तलवार ॥
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार १२६
जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिलारै गाय ॥
तैसे मारै मलखे ठाकुर कायर भागैं पीठ दिखाय १२७
है मर्दाना जिनको बाना ते नर करें तहाँ पर मार ॥
को गति वरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करैं तलवार १२८
बड़े लड़ैया बौरी वाले मानैं नहीं समर में हार ॥
ना मुँह फेरैं मोहबे वाले दोऊ कठिन मचाई रार १२६
गिरैं कगारा जस नदिया माँ तैसे गिरैं ऊंट गज धाय ॥
परीं लहासें रणशूरन की तिनपर रहे गीध मड़राय १३०
गोली ओली कतहूँ बरसें कतहूँ कठिन चलै तलवार ॥
छुरी कटारी कोऊ मारैं कोऊ कड़ावीन की मार १३१
गदा के ऊपर गदा चलावैं ढालन मारैं ढाल घुमाय ॥
चन्द्रावलि की चौथ। ३०६ .२७
झर सर मारैं तलवारिन सों तीरन मन्न मन्न गा छाय १३२
धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय !
भम्भम् भम्भम् झीलम झलकें नीलम रंग परै दिखराय १३३
चम् चम् चम् चम् भाला चमकैं दमकैं उडुगण मनों अका़श ॥
बम् बम् बम् बम् क्षंत्री बँचकें भभकैं शूरनकेर प्रकाश १३४
सवैया ॥
आश करें नहिं प्राणन की ललिते रणशूरन रीति सदाहै।
प्राण कि नाश कि कीर्त्ति प्रकाश कि आश नहीं सुख या बिपदाहै ॥
बीर कि शान कि आन कि मान कि ठानठने मलखान यदाहै।
शान कि आन करे रणज्वान सो प्राणपयान कियेयीतदाहै १३५
को गति बरणै मलखाने कै रणमाँ कठिन करै तलवार ॥
घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १३६
गनि गनि मारै राजपूतन का बेटा देशराज का लाल ॥
मोहनठाकुर बौरी वाला आला बीरशाहका बाल १३७
बिकट लड़ाई की संयुग में कायर भागे लिहे परान ॥
बड़ा लड़ैया भीषमवाला आला मैनपुरी चौहान १३८
लड़ै चौंड़िया दिल्लीवाला बेटा लड़ै पिथौराकयार ॥
को गति बरणै इन्द्रसेन कै दूनों हाथ करै तलवार १३६
मलखे बोले इन्द्रसेन से , जीजा मानों कही हमार ॥
बहिनी बेही तुम्हरे घरमाँ तुमते सदा हमारीहार १४०
अबै मसाला कछु बिगराना अनभल नहीं कीन कर्त्तार ॥
बिदा कराये बिन जैबे ना मानो सत्यवचन सरदार १४१
फौजैं प्यारो समरभूमि ते बौरी जाउ आप ततकाल ॥
३८ आल्हखण्ड । ३१०
तुम समुझावो महराजा को काहे रारि करें नरपाल १४२
इतना सुनिकै इन्द्रसेन ने गरुई हाँक कीन ललकार ॥
काह हकीकति तुम राखतिहौ जावो विदाकरावत द्वार १४३
इतना कहिकै इन्द्रसेन ने अपनी खैंचि लई तलवार ॥
दौरिकै पकरयो उदयसिंह ने मलखे बाँध लीन त्यहिबार १४४
देखिकै बन्धन इन्द्रसेन को मोहन आयगयो त्यहिकाल ॥
मारन लाग्यो रजपूतन को मोहन वीरशाहका लाल १४५
औरो भाई जे मोहन के तेऊ करनलागि तलवार ॥
झुके सिपाही बौरीवाले लागे करन भड़ाभड़मार १४६
पैदल पैदल कै बरणी भै औ असवार साथ असवार ॥
बड़ी लड़ाई हाथिन कीन्ह्यो घोड़न कीन टापकीमार १४७
लीन्हे साँकरि दल बादलसों हाथी करत फिरैं चिग्घार ॥
भाला छूटैं असवारन के पैदल खूब चलै तलवार १४८
झुके सिपाही मोहबेवाले इनहुन कीन घोर घमसान ॥
चौंड़ा बाम्हन के मोर्चा में कोऊ शूर नहीं समुहान १४६
सोहै चौंड़िया इकदान्ता पर हाथम लिये ढाल तलवार ॥
मोहन ठाकुर बौरी वाला सब्ज़ा घोड़ापर असवार १५०
हनि हनि मारै रजपूतन का गरुई हाँक देय ललकार ॥
अभिरे क्षत्री अरुझ्वारा सों आमाझ्वारचलै तलवार १५१
जौनै हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥
ऊदन मारैं तलवारिन सों बेंबुल टापन देइँ गिराय १५२
भाला चमकै तहँ देवा का मोहन केरि चलै तलवार ॥
घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया मलखे सिरसाका सरदार १५३
मारि गिराये रजपूतन का कायर भागे लिहे परान ॥
चन्द्रावलि की चौथ । ३११ २६
को गति बरर्णै रणशूरन कै सम्मुख करें समर मैदान १५४
मान न रहिगे क्यहु क्षत्रिनके सब के छूटि गये अरमान ॥
बहुतक करहैं समरभूमि में अधजलपरे अनेकन जवान १५५
बहुतक सुमिरैं घर अपने को औ मन परे परे पछितायँ ॥
बहुतक क्षत्री गिरैं समर में काटे वृक्ष सरिस भहराय १५६
नदी भयङ्कर बही रकत की त्यहिमाँ गिरे ऊंट गज धाय ॥
छुरी कटारी मछली ऐसी ढालैं कछुवा परैं दिखाय १५७
परीं लहासैं तहँ मनइन की छोटी डोंगिया सम उतरायँ ॥
बहैं सिवारा जस नदिया माँ तैसे बहे बाल तहँ जायँ १५८
भूत पिशाच योगिनी नाचैं गावैं गीत बीर बैताल ॥
श्वान शृगालन की बनिआई गीधन गरे परे जयमाल १५६
चिघरैं हाथी रणमण्डल में डगरैं बड़े बड़े सरदार ॥
भगरैं मत्तखे रणशूरन ते डगरैं डारि डारि हथियार १६०
रहि अभिलाषा नहिं केहू के जो फिरि करै वहाँपर मार ॥
जितने लड़का वीरशाह के बाँधे सिरसा के सरदार १६१
रहें सिपाही जे बौरी के भागे डारि ढाल तलवार ॥
भागे क्षत्रिन का मारैं ना नाहर मोहबे के सरदार १६२
रीति पुरानी इन छोड़ी ना कतहूँ समर भूमि में ज्वान ॥
पूरो क्षत्रीपन करतीं ना मरतीं नहीं समर मैदान १६३
तौ यह गावत को गाथा फिरि तजिकै सकल आपनो काम ॥
यह सब जानत है अपने मन रहिहै एक रामको नाम १६४
तबहूँ मानत है जीवन बहु तजिकै कर्म्म धर्म्म इतमाम ॥
यह नहिं जानत है अपने मन साँचो धर्मकर्म सुखधाम १६५
गये सिपाही नृप द्वारे पर औ सब हाल बताये जाय ॥
२* आल्हखण्ड । ३१२
बन्धनसुनिकै सब लड़िकनको राजा गये सनाकाखाय १६६
खबरि पहुँचिगै रनिवासे में राजा रानी लीन बुलाय ॥
बौहर आई चन्द्रावलि तहँ सोऊगई कथा सब गाय १६७
'हमरे घरके माहिल बैरी उनके चुगुलिनका वयपार ॥
कहा मानिकै तुम माहिल का दादा किह्योयहांलग रार १६८
ना सुनिपावा मैं पहिले ते माहिलदीन्ह्यो रारि लगाय ॥
तौ अस हालत कसहोतै अब तबहीं देति सबै समुझाय १६६
योगी बनिकै ब्रह्मा आये सूरति दीख दूरि ते माय ॥
होति खटपटी जो ऊदन ते ब्रह्माभाय न अउतोधाय १७०
टेक कठिन है बघऊदन कै हम खूब जानैं ठीक स्वभाव ॥
मिलिये दादा अब आल्हा ते याही जानो नीक उपाव १७१
सुनि सुनि बातें सब बौहर की रानी नृपति दीन समुझाय ॥
सुनिकै बातें महरानी की राजा ठीक लीन ठहराय १७२
आगि लगाई माहिल ठाकुर नातेदारी दीन तुराय ॥
राजा सोचत यह अपने मन पहुँचातुरतसिंहासनआय १७३
कलम दवाइति कागज लैकै । चिट्ठी लिखनलाग ततकाल ॥
जितनी बातें माहिल कहिगा लिखिगेयथातथ्यनरपाल १७४
फिरि कछु बातें चन्द्रावलिकी लम्बो पत्तो लिखा बनाय ॥
बन्धन छोरो सब पुत्रन को तुरतै विदा लेउ करवाय १७५
कीनि घटिहई माहिल ठाकुर नाहक रैसा दीन लगाय ॥
कहा मानिकै हम माहिल का साँचोसाँच गयन बौराय १७६
लिखी विधाता कै मेटै को साँचो कहैं गीत सब गाय ॥
लिखिकै चिट्ठी दै धावन को राजा बैठिगये शिरनाय १७७
लैकै चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा जहाँ बनाफरराय ॥
चन्द्रावलि की चौथ । ३१३ ११
चिट्ठी दीन्ह्यो सो आल्हा को ठाढ़ो भयो शीशकोनाय १७८
लागि कचहरी तहँ आल्हा कै रुमि झुमि रहीं पतुरियानाच ॥
आल्हा बाँचन चिट्ठी लागे हैगा रंग भंग तहँ साँच १७६
पढ़िकै चिट्ठी आल्हा ठाकुर सबको दीन्ह्यो हाल बताय ॥
माहिल ठाकुर की किरपा ते इतना परा परिश्रमआय १८०
फिकिरिम माहिल हैं ऊदनकी निश्चय समुझि परै यहिबार ॥
जाको रक्षक रघुनन्दन है ताको जाय न बाँकोबार १८१
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर बन्धन तुरत दीन छुड़वाय ॥
कहि समुझायो सबलरिकन ते राजै खबरि जनावो जाय १८२
ब्रह्मा आवत इन्द्रसेन सँग इनका बिदा देयँ करवाय ॥
माहिल मामा हमरे लागैं तातेकिहिनिदिल्लगीआय १८३
त्यहिमा सज्जन तुम महराजा सोऊ दया दीन बिसराय ॥
क्षम्यो ढिठाई अब हमरी तुम तुम्हरीशरणगये हमआय १८४
नातेदारी में उत्तमहौ आहिउ कृष्णबंश महराज ॥
गुरू श्वशुर सों संगर ठानैं क्षत्री जन्म युद्धके काज १८५
इतना कहिकै आल्हा ठाकुर सबको बिदा कीन ततकाल ॥
ब्रह्मा पहुँचे बीरशाह घर औसबकह्यो बनाफरहाल १८६
सुनिकै बातें सब आल्हा की राजा बिदा दीन करवाय ॥
बैठि पालकी में चन्द्रावलि गौरा पारवती को ध्याय १८७
बहुधन दीन्हो ब्रह्मा ठाकुर महरन पलकी लीन उठाय ॥
दशहूँ लरिकिन सों महराजा आये जहाँ बनाफरराय १८८
आवत दीख्यो बीरशाह को आल्हा मिले अगारी आय ॥
मिला भेंटकरि सबसों राजा अपने धाम गये हर्षाय १८६
बाजे डंका भहतंका के आल्हा कूच दीन करवाय ॥
३१ आल्हखण्ड । ३१४
चौंड़ा सूरज दिल्ली पहुँचे आल्हा गये मोहोबे आय १६०
बेटी पहुँची जब महलन में मल्हना मिली अगाड़ी धाय ॥
बारह रानी परिमालिक की बेटी देखि गई हरषाय १६१
सावन भावन गावन लागीं आवन लागि विदेशी ज्वान ॥
मल्लन कल्लन फरकन लागे थिरकनलागिमेघअसमान १६२
दादुर बोलन जलमें लागे विरहिन उठी करेजे पीर ॥
बिना पियारे घर पीतम के कैसे धरै नारि मनधीर १६३
सवैया ॥
कैसे धरै मनधीर तिया परदेश पिया ज्यहि सावन छाये ।
राग औरङ्ग अनंग कि जंग उमंग भरै पियकी सुधिआये ॥
गात सबै तियके सकुचात बिदेश परे पिय पेट खलाये ।
कहाकहूँ ललिते विधिप्रीति अनीति किरीति सदादरशाये १६४
गवैं सुहागिल सब सावन में बारामासी मेघ मलार ॥
गड़े हिंडोला हैं घर घर में दर दर सावन केरि बहार १६५
काग उड़ावन उनघर लागीं जिन घर परे पिया परदेश ॥
सावन रावन उनके लागै जिनके चिट्ठीके अन्देश १६६
नहीं तो सावन अतिपावन है गावन गीत क्यार त्यवहार ॥
हमें सुहावन मनभावन है सावनक्यारसकलव्यवहार १६७
चौथि पूरिभै चन्द्रावलि कै ह्योति होय तरंग को अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १६८
सेन छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशा को आय ॥
तारागण सब चमकन लागे सावन मेघ रहे घहराय १६६
कहुँ कहुँ तारा कहुँ कहुँ वादल नभहू भयो कलियुगी आय ॥