आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रावलि की चौथ । २९९ १७
कलहा लरिका बच्छराज का नामी सबै बनाफरराय १४
लड़िकै जितिहौ तुम इनते ना मरिकै सात धरौ अवतार ॥
लैके फौजैं सूरज बेटा मलखे साथ होउ तय्यार १५
विदा माँगिकै महराजा ते सूरज सिरसा का सरदार ॥
आये फौजन में मलखाने सब दल बेगि भयो तय्यार १६
गज इकदन्ता चौंड़ा बैठ्यो सूरज सब्जा पर असवार ॥
कूच को डङ्का बाजन लाग्यो हाथिन घोर कीन चिग्घार १७
चलिभइँ फौजैं दल बादल सों बौरीगढ़ै गई नगच्याय ॥
आठकोस जब बौरी रहिगै आल्हा डेरा दीन गड़ाय १८
तम्बू गड़िगा तहँ आल्हाका बैठे सबै शूरमा आय ॥
आल्हा बोले तहँ देवा ते कहिये करिये कौन उपाय १६
इतना सुनिकै देवा बोला साँची तुम्हें देयँ बतलाय ॥
योगी बनिकै बौरी चलिये तौसबहालठीकमिलिजाय २०
यह मन भाई मलखाने के गुदरी पहिरि लीनतत्काल ॥
आल्हा देवा ब्रह्मा ठाकुर इनहुनतिलक लगायोभाल २१
लीन बाँसुरी ब्रह्मा ठाकुर खँझरी मैनपुरी चौहान ॥
कर इकतारा आल्हा लीन्ह्यो डमरू लीन वीर मलखान २२
चारो चलिभे फिरि तम्बुन ते बौरीगढ़ै पहुँचे आय ॥
बजी बाँसुरी तहँ ब्रह्माकी देवा खँझरी रहा बजाय २३
टप्पा ठुमरी भजन रेखता मलखे गावैं मेघ मलार ॥
को गति बरवै इकतारा कै बाजैं खूब लोह के तार २४
रूप देखिकै तिन योगिन का मोहे सबै नारिनर बाल ॥
बात फैलिगै बौरीगढ़ में योगी आये खूब विशाल २५
भा खलभल्ला औ हल्लाअति पहुँचे वीर शाहके द्वार ॥