आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रावलि की चौथि। ३०१ १६
ओ यह बोला फिरि योगिनते हमहूँ साँच देयँ बतलाय ३८
तुम्हरो हमरो मत एकै है शंका आप देउ बिसराय ॥
पतित न क्षत्री कोउ बौरीगढ़ यादव बंश यहां अधिकाय ३६
पापी आयो इक मोहबे ते ताको खन्दक दीन डराय ॥
औरन पापी कोउ बौरी में तुमको सांच दीन बतलाय ४०
इतना सुनिकै मलखे बोले ओ महराज यादवराय ॥
कैसो खन्दक कैसो पापी दर्शन हमें देउ करवाय ४१
कबहुँ खन्दक हम देखाना तुमते साँच दीन बतलाय ॥
बड़ी लालसा भै जियरे माँ खन्दक आप देउ दिखलाय ४२
इतना सुनिकै महराजा तब योगिन लीन्ह्यो साथ लिवाय ॥
जौने खन्दक में ऊदन थे सो महराज दिखावा जाय ४३
ऊदन दीख्यो जब योगिन को नीचे लीन्ह्यो शीश नवाय ॥
चारो योगी तहँते चलिभे पहुँचे राजभवन में आय ४४
भयो बुलौवा फिरि भोजन को मलखे बोले वचन बनाय ॥
आजु यकादशि निर्जल बर्ते राजन साँच दीन बतलाय ४५
करैं बसेरो नहिं बस्ती में जंगल बास करैं सब काल ॥
बिदा मांगिकै महराजा ते चारो चलत भये ततकाल ४६
आयकै पहुँचे फिरि फौजनमें अंगड़ खंगड़ धरे उतार ॥
सुरंग खुदायो मलखाने ने क्षत्रिन तुरत कीन तय्यार ४७
जौने खन्दक में ऊदन थे फूटो सुरंग तहाँपर जाय ॥
सुरंग के भीतर सों बघऊदन पहुँचे फौज अपनी आय ४८
जैसे पियासा पानी पावै तैसे खुशी भये सब भाय ॥
बाजे डंका अहलंका के शंका सबन दीन बिसराय ४६
मलखे बोले तहँ आल्हा ते लश्कर कूच देउ करवाय ॥