आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ आल्हखण्ड । २९८
घोड़ी कबूतरी की पीठि पर बैठ्यो सिरसा का सरदार २
चढ़ा मनोहर की पीठि पर देवा मैनपुरी चौहान ॥
ब्रह्मा ठाकुर हरनागर पर बैठे सुमिरि राम भगवान ३
गर्भ गिराविनि कुँवाँ सुखाविनि लक्षिमिनि तोप भई तय्यार ॥
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ४
रणकी मौहरि बाजन लागी घूमन लागे लाल निशान ॥
छाय लालरी गै अकाश में लोपे अन्धकार सों भान ५
पहिल नगारा में जिन बन्दी दुसरे बांधिलीन हथियार ॥
तिसर नगाराके बाजत खन हाथी घोड़न भये सवार ६
चौथ नगारा बाजन लाग्यो मलखे कूच दीन करवाय ॥
हाथी चलिभे दल बादल सों घण्टा गरे रहे हहराय ७
कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउ कोउ मोरचालपरजाय ॥
सरपट जावै कोउ कोउ घोड़ा केहू टाप न परै सुनाय ८
खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं पवनकी चाल ॥
मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजैं हाव हाव करनाल ६
बाजै डङ्का अहतङ्का के बङ्का सबै शूर सरदार ॥
शङ्का नाहीं क्यहु जियरे में चहुदिन शक्तिचलै तलवार १०
लश्कर पहुँचा सब दिल्ली में क्षत्रिन कीन तहाँ विश्राम ॥
इकलो मलखे त्यहि समया में पहुँचा पृथीराज के धाम ११
बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो तहँ पर बैठ बीर मलखान ॥
सबियाँ गाथा बौरीगढ़ की मलखे कीन तहाँपर गान १२
सुनी हकीकति जब मलखे की चौंड़ा सूरज लीन बुलाय ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो पृथीराज नें चौंड़ै फेरि कह्यो समुझाय १३
कह्यो जबानी बीरशाह ते जल्दी विदा देयँ करवाय ॥