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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 303

१८ आल्हखण्ड । ३००
तजिकै लज्जा चलीं इकल्ला बल्लन क्यार मनों त्यौहार २६
अटाके ऊपर कढा करनको नारिन पैन नैन हथियार ॥
कड़ाके ऊपर छड़ा विराजैं तिनपर पायजेब झनकार २७
कर इकत्तारा आल्हा लीन्हे नीचे करें तारसों रार ॥
बजै बाँसुरी भल ब्रह्माकै मानो लीन कृष्ण अवतार २८
उपमा नाहीं शिरीकृष्ण कै तीनों लोकन के कर्त्तार ॥
काह हकीकति है ब्रह्मा कै पै यह बँसुरी केरि बहार २६
बाजै खँझरी भल देवा कै मलखे करें तहाँ पर गान ॥
देखि तमाशा तहँ योगिनका लागे कहन परस्पर ज्वान ३०
ऐसे योगी हम देखे ना दाढ़ी गई सपेदीछाय ॥
गङ्गासागर के संगमलौं देखा देश देश अधिकाय ३१
बीरशाह तब बोलन लाग्यो चारों योगिन ते मुसुकाय ॥
कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ३२
सुनिकै बातें महराजा की मलखे बोले वचन बनाय ॥
हम तो आये प्रागराज ते जावैं हरद्वार को भाय ३३
भोजन पावैं हम क्षत्रिन घर बृत्ती यहै लीन ठहराय ॥
होय जनेऊ ज्यहि घर नाहीं छत्री कौन भांति सो आय ३४
जनमत ब्राह्मण क्षत्री बनियाँ तीनों शूद्र सरिस हैं भाय ॥
होय जनेऊ जब तीनों घर तब यह वर्ण ठीक ठहराय ३५
जो मर्यादा तुम छोड़ा ना तौ घर भोजन देउ कराय ॥
कलियुग आवा महराजा है ताते साफ दीन बतलाय ३६
हम नहिं भोजन करें शूद्र घर चहु मरि जायें पेटके घाय ॥
यकडस लंघन चहु दैजावें पैनहिं सिंहघासको खाय ३७
सुनिकै बातें ये योगी की भामन खुशी यादवाराम ॥