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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 305

२० आल्हखण्ड । ३०२
बिदा करावैं चन्द्रावलि को तव यश जाय जगतमैछाय ५०
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर बोले करौ यहै अब भाय ॥
हुकुम पायकै यहु आल्हा को मलखे कूच दीन करवाय ५१
चलिभैं फौजें दलबदल सों बौरीगढ़ै गई नगन्य्याय ॥
प्रलय मेघ सम बजैं नगारा हाहाकार शब्द गा छाय ५२
गा हरिकारा तब बौरी में राजनै खबरि जनाई जाय ॥
फौजै आई क्यहु राजा की बौरी डांड़ दबायनि आय ५३
सुनिकै बातें हरिकाराकी राजा गयो सनाकाखाय ॥
मलखे बोले ह्यां रूपन ते कहियो बीरशाह ते जाय ५४
सुरुँग खोदिकै बघऊदन को आल्हा ठाकुर लीन निकारि ॥
बिदा कराये बिन जैहैं ना ताते करो नहीं तुमरारि ५५
बहिनी व्याही तुम्हरे घरमाँ ताते क्षमाकीन यहिवार ॥
नहिं अस ठाकुर को जन्माजग जाते मानि लीन हमहार ५६
इतना सुनिकै रूपन चलिभा बौरीगढ़ै पहुॅँचा जाय ॥
खबरि सुनाई महराजा को, जो कछु कह्यो बनाफरराय ५७
सो नहिं भाई बीरशाह मन बोल्यो तुरत बचन ललकार ॥
काह हकीकति है आल्हा कै आवैं विदा करावन द्वार ५८
हठ नहिं छोड़्यो दुर्योधन ने औ मरिगयो सहित परिवार ॥
खबरि जनावो तुम आल्हा को हमरे साथ करैं तलवार ५६
इतना सुनिकै रूपन चलिभे फौजन फेरि पहुँचे आय ॥
कही हकीकति बीरशाह की सुनि जरि उठे बनाफरराय ६०
हुकुम लगायो निज फौजनमें सबियां शूर होयँ तय्यार ॥
हुकुम पायकै मलखाने को क्षत्रिन बांधिलीन हथियार ६१
गजैं चढ़ैया गजपर चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ॥