आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ आल्हखण्ड । ३१०
तुम समुझावो महराजा को काहे रारि करें नरपाल १४२
इतना सुनिकै इन्द्रसेन ने गरुई हाँक कीन ललकार ॥
काह हकीकति तुम राखतिहौ जावो विदाकरावत द्वार १४३
इतना कहिकै इन्द्रसेन ने अपनी खैंचि लई तलवार ॥
दौरिकै पकरयो उदयसिंह ने मलखे बाँध लीन त्यहिबार १४४
देखिकै बन्धन इन्द्रसेन को मोहन आयगयो त्यहिकाल ॥
मारन लाग्यो रजपूतन को मोहन वीरशाहका लाल १४५
औरो भाई जे मोहन के तेऊ करनलागि तलवार ॥
झुके सिपाही बौरीवाले लागे करन भड़ाभड़मार १४६
पैदल पैदल कै बरणी भै औ असवार साथ असवार ॥
बड़ी लड़ाई हाथिन कीन्ह्यो घोड़न कीन टापकीमार १४७
लीन्हे साँकरि दल बादलसों हाथी करत फिरैं चिग्घार ॥
भाला छूटैं असवारन के पैदल खूब चलै तलवार १४८
झुके सिपाही मोहबेवाले इनहुन कीन घोर घमसान ॥
चौंड़ा बाम्हन के मोर्चा में कोऊ शूर नहीं समुहान १४६
सोहै चौंड़िया इकदान्ता पर हाथम लिये ढाल तलवार ॥
मोहन ठाकुर बौरी वाला सब्ज़ा घोड़ापर असवार १५०
हनि हनि मारै रजपूतन का गरुई हाँक देय ललकार ॥
अभिरे क्षत्री अरुझ्वारा सों आमाझ्वारचलै तलवार १५१
जौनै हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥
ऊदन मारैं तलवारिन सों बेंबुल टापन देइँ गिराय १५२
भाला चमकै तहँ देवा का मोहन केरि चलै तलवार ॥
घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया मलखे सिरसाका सरदार १५३
मारि गिराये रजपूतन का कायर भागे लिहे परान ॥