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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 298

चन्द्रावलि की चौथि । २६५ १३
मैं अब देखों जस ऊदन को मालिनितसतुमकरोउपाय १३१
बातें सुनिकै चन्द्रावलिकी मालिनि कहाबचनसमुझाय ॥
निशा अँधेरी है सावन की तुमको ऊदनलवैं दिखाय १३२
इतना सुनिकै मालिनि सँग में ऊदन पास पहुँची जाय ॥
बहिनी प्यारी चन्द्रावलि तहँ बोली सुनो बनाफरराय १३३
बाहर आवो तुम खन्दक के अपने घोड़ होउ असवार ॥
निर्भय जावो तुम मोहबे को भाई उदयसिंह सरदार १३४
इतना सुनिकै ऊदन बोले बहिनी साँच देयँ बतलाय ॥
चोरी चोरा जो घर जावैं तौ रजपूती धर्म नशाय १३५
खबरि जो पइहैं सिरसावाले अइहैं तुरत बीर मलखान ॥
सुखसों सोवो तुम महलन में करिहैंकुशलमोरिभगवान १३६
इतना सुनिकै बहिनी चलिभै महलन फेरि पहुँची आय ॥
लिखी हकीकति सब मलखेको खन्दक परे लहुरवाभाय १३७
लिखिकै पाती सुवना गरमें बांधिकै दीन्ह्यो तुरत उड़ाय ॥
जावो सुवना तुम मोहबे को मल्हना महल पहुँचोजाय १३८
उड़िकै सुवना तहँ ते चलिभा नरवरगढ़ै पहुँचा आय ॥
मकरँद घूमै ज्यहि बगियामें सुवना बैठ तहाँपर जाय १३६
चकित घूमै मकरन्दा तहँ परिगै दृष्टि सुवापर आय ॥
पाती दीख्यो गल सुवना के तुरतै लीन तहाँ पकराय १४०
पढ़िकै पाती लै सुवना को सो नरपतिको दीन दिखाय ॥
पाछे पहुँचा फिरि महलन में रानी खबरि जनाई जाय १४१
सुनी हकीकति जब रानी ने पाती गले दीन बँधवाय ॥
सुवना चलिभा नरवरगढ़ ते पहुँचा नगर महोबेआय १४२
मल्हना ठाढ़ी रह अण्टापर सुवना बैठ तहाँपर जाय ॥