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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

२२ आल्हाखण्ड । ३०४
खर खर खर डर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल ७४
सुर्खा घोड़ा चढ़ जुरावर सूरज सब्जापर असवार ॥
सुमिरि भवानी सुत गणेश को दोऊ चलन भये सरदार ७५
घोड़न वरणों की असवारन पैदर सेना तीस हजार ॥
तीन सहस हाथिन पर सोहैं बाँके यादव परम जुझार ७६
बाम्हन थोरे क्षत्री ज्यादा लीन्हे कठिन धार तलवार ॥
गर्ज्जति आवैं समरभूमि को एकते एक शूर सरदार ७७
कायर हल्ला खलभल्ला में तल्ला छोड़ि प्राण के दीन ॥
खुशी छायगै मन शूरन के मानों जीति इन्द्रपुर लीन ७८
बजे नगारा ठनकारा के दारा गर्भपात सुनिकीन ॥
गये दरारा उर कायर के सायर सत्यसत्य कहिदीन ७६
उइ धिरकारैं अपने तनका मनमाँ बार बार पछितायँ ॥
भैंसि वियानी घर हमरे मा माठा दूध केर अधिकाय ८०
हाय रुपैया मोरे डारैं लीन्हे समरभूमि को जायँ ॥
दैया मैया भैया कहिकै ज्वैया हेतु बहुत पछितायँ ८१
शूर यशोमति मैया वाले भैया गैयन के चरवाह ॥
नाव खिवैया भवसागर के नागर कृष्णचन्द्र नरनाह ८२
तिनका सुमिरण मन अन्तर करि तत्पर भये स्वामि के काज ॥
करि अभिलाषा समरभूमि कै राखे मनै धर्म की लाज ८३
पढ़ि अशलोक न तजि शोकन को लोकन केर मिले जनुराज ॥
तैसे गाने मनअन्तर में बाजे तहाँ शूर शिरताज ८४
बाजे बाजे बाजे सुनिकै लाजे मनै आपने बीच ॥
तिनको कहियत हम अपनी दिशि जानो सकल नरन में नीच ८५
इम अनुमाना मन अपने है जाना नारि वित्तको कीच ॥