आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रावलि की चौथ । ३०५ २१
पै हम त्यागी अनुरागीना लागी आश नारिधनबीच ८६
आपै त्यागी अनुरागीना तौ कस कहै नारिधन कीच ॥
साँच बखानैं हम अपनीदिशि सोई सकल नरनमें नीच ८७
पै यहु कलियुग बाबा आयो छायो रहै मनै संताप ॥
मन नहिं इस्थिर क्षणहू होवै कैसे होय मुनिन में थाप ८८
जपतै माला गायत्री के आला परब्रह्म के ध्यान ॥
यहु मन काला भाला मारै जो सब इन्द्रिनमें बलवान ८६
नीच न कहिये यहि कालामें जो कोउ साँच बिप्रको बाल ॥
युग यहु पाजी बदिकै बाजी राजानको किह्योबिहाल ६०
ऐसे पाजी की राजी में सूरज बीरशाह का लाल ॥
जायकै पहुँच्यो समरभूमि में अब मलखेका सुनो हवाल ६१
सो जब दीख्यो आसमानको छाई खूब गर्द गुब्बार ॥
हँसिकै बोला रणशूरन ते सँभरो सबै शूर सरदार ९२
इतना कहतै फौजैं आईं तोपन होनलागि तहँ मार ॥
अररर अररर तोपैं छूटीं हाथिन घोर कीन चिग्घार ६३
को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी भयो भयङ्कर मार ॥
नावैं गोला जौनी दिशिको तौनी दिशिकोकरैं चिथार ९४
सवैया ॥
भभकार उठैं तहँ गोलन की फुफकार करैं रण में गजराजा ।
धुधकार नगारनकी गमकी चमकी तलवारि जुरे सबराजा ॥
अपार जुझार करैं तहँ मार न डरैं मन नेकहु एकहुसाजा ।
समाजऔसाजदोऊदिशिमें अबलैरैललितेसबहीजयकाजा६५
बड़ी लड़ाई भै तोपन कै लोपे अन्धकार सों भान ॥
२०