आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
३६ आल्हाखण्ड । १५२
भाँवरि तीसरि के परतैखन बिजिया मारी गुर्ज उठाय ॥
वार बचाई त्यहि देवाने राजा रंगमहल को जाय ११५
भाँवरि चौथी के परतैखन राजा जादू दीन चलाय ॥
जवाँ बन्द भै सब कुँवरन कै सबकी नजरबन्द है जाय ११६
सुनवाँ सोची अपने मनमाँ बैरी हैगा बाप हमार ॥
बीर महम्मद की पुरिया को सुनवाँछोड़िदीनत्यहिबार ११७
भई लड़ाई तहँ जादुनकी सातों भाँवरि लई कराय ॥
आल्हा वाली फिरि पलकी में तुरतै सुनवाँ लीन विठाय ११८
सवैया ॥
भूप दुवार चली तलवार अपार बही तहँ शोणित धारा।
वीर बली मलखान सुजान तहाँ बहु क्षत्रिनको हनिडारा ॥
पूतजुझार महाहुशियार लड़ै तहँ भीषम केर कुमारा ।
कौनकहै बघऊदनको रिपुसूदनसों ललिते त्यहि बारा ११९
सुन्दरखन को अरिनन्दन जो सोऊ आयगयो त्यहि द्वार ॥
आठकोसलों चलै सिरोही नदिया बही रक्त की धार १२०
आगे डोलाहै सुनवाँ को पीछे होय भड़ाभड़ मार ॥
ऊदनमलखे की मारुन में जूझे बड़े बड़े सरदार १२१
आल्हा बँधुवाभे नैनागढ़ जोगा झगा बँधे मलखान ॥
कूच करायो बघऊदन ने लश्कर मागराज नियरान१२२
ऊदन बोले तब सुनवाँ ते भौजी मानों कही हमार ॥
दादा बांधेगे नैनागढ़ कैसी युक्तिकरी यहिवार १२३
सुनिकै बातें बघऊदन की सुनवाँ युक्ति कही समुझाय ॥
सम्मत करिकै दूनों चलिभे नैनागढ़ै पहूंचे आय १२४
पुहपा मालिनि के घर बैठे सुनवाँ सहित लहुरवा भाय ॥
आल्हाका विवाह । १५३ ३७
सुनवाँ पूछ्यो जों मालिनि ते मालिनिखबरिदीनबतलाय १२५
रूप गुजरियाको सुनवाँ करि पहुंची नाह निकट सो जाय ॥
रूप देखिकै त्यहि गूजरिको मोहित भयो बनाफरराय १२६
जस बतलान्यो ये गूजरिसों गूजरि तैस दीन समुझाय ॥
मुंदरी दीन्ह्यो फिरि गूजरिको मालिनिघेरै पहुंची आय १२७
सब समुझायो फिरि ऊदन को सांचे हाल दीन बतलाय ॥
घोड़ करिलिया औ रसबेंदुल लैकै गयो लहुरवाभाय १२८
खबरि पायकै बयपारी कै द्वारे नृपति पहुंचा आय ॥
बनो कबुलिहा बघऊदन है सांचो आगा परै दिखाय १२६
राजा पूछ्यो बयपारी सों सांची कीमत देव बताय ॥
ऊदन बोल्यो नयपाली सों चढ़िकैदेखिलेयकोउआय १३०
चाल देखिल्यो इन घोड़नकी पाछे कीमत देयँ बताय ॥
सुनिकै बातें ब्योपारी की राजै हुकुमदीन फर्माय १३१
जावैं क्षत्री जो घोड़न ढिग ताको टापन देयँ हटाय ॥
मुखसों काटैं ऊपर उलैरैं कोउरजपूतपास ना जाय १३२
देखि तमाशा यहु महाराजा तुरतै आल्हा लीन बुलाय ॥
घोड़ा फेरो तुम फाटक में इनकीचाल देव दिखराय १३३
किह्यो इशारा बघऊदन ने घोड़ा चढ़े बनाफरराय ॥
बैठ बेंदुलापर बघऊदन आपननामदीन बतलाय १३४
बाग उठायो दउ घोड़न की फाटक पार पहुंचे आय ॥
मालिनि घरते सुनवाँ चलिभै तुरतै पलकी लीन मँगाय १३५
तीनों पहुंचे फिरि लश्कर में डंका बजन लाग घहराय ॥
चलि भैं फौजैं मलखाने की पहुंचीं प्रागराज में आय १३६
जितने क्षत्री रहैं लश्कर में सबियाँ करनगये असनान ॥
३८ आल्हखण्ड । १५४
हनवन करिके तिरवेनीको दीन्ह्यो द्विजन दान सब ज्वान १३७
बृक्ष अक्षयबटको पूजन करि पहुंचे भरद्वाज अस्थान ॥
बेनीमाधो के दर्शन करि दीन्ह्यो द्विजन सुवरण दान १३८
हाथी घोड़ा रथ कपड़ा औ गहना दीन द्विजन बुलवाय ॥
भये अयाचक सब याचकगण जय जयरहे बनाफर राय १३६
बैठिकै गंगा के तट ऊपर क्षत्रिन हवन कीन हरषाय ॥
स्वाहा स्वाहा बहु द्विज बोलैं कहुँ २ स्वधा स्वधा गाळाय १४०
स्वधा औ स्वाहा ते छुट्टी करि विप्रन भोजन दीन कराय ॥
भोजन करिकै सब द्विज तहँते अपने घरनगये सुखपाय १४१
कूच करायो फिरि मलखाने डंका बजत फौज में जाय ॥
देवलि बिरमा द्वारे ठाढ़ीं देखें वाट बनाफरराय १४२
राह निहारैं नित पुत्रन की कबधौं ऐहैं पुत्र हमार ॥
जौन मुसाफिर आवत देखें ताको करें बड़ा सत्कार १४३
हाल न पावैं जब पुत्रन को तब फिरि जावैं घरे निराश ॥
रानी मल्हना महलन ऊपर नितप्रतिकरैमिलनकी आश १४४
तबलों रुपना आगे आयो पाछे फौज पहुंची आय ॥
बड़ी खुशहाली भै मोहबे माँ दौरे सबै नारिनर धाय १४५
मल्हना देवलि बिरमा तीनों पलकी पास पहुँचीं जाय ॥
मियादेवन को पलकी गै पूजनकीन बहुरिया आय १४६
आल्हा मलखे देबा ऊदन अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥
मियादेवन की परिकरमा क्षत्रिन सबन कीन हर्षाय १४७
तहँते आये फिरि द्वारे को तुरतै पण्डितन लीन बुलाय ॥
आरति लैके फिरि सोने की तामें चौमुख दिया बराय १४८
चर परछौनी मल्हना कीन्ह्यो भीतर गये बनाफर राय ॥
आल्हाका बिवाह । १५५ . ३६
उतरिकै पलकी ते सुनवाँफिरि महलन तुरत पहुंचीजाय १४९
मुहँ दिखलाई रानी मल्हना गलको दीन नौलखाहार ॥
पायँ लागेकै सुनवाँ तहँपर करको कंकण दीन उतार १५०
बाजन बाजे चौगिर्दा ते घर घर भये मंगलाचार ॥
फिरि परिमालिक की ड्योढ़ीमाँ पहुंचे सबै शूर सरदार १५१
राजा पूँछें मलखाने ते ओ बिरमा के राजकुमार ॥
अमरढोल रहे नयपाली के कैसे किह्यो तहाँपर मार १५२
इतना सुनिकै मलखे बोले तुम सुनिलेउ रजापरिमाल ॥
दया तुम्हारी जापर होवै ताकीबिजयहोयसबकाल १५३
हृदय लगायो सब कुँवरन को सबको कीन बड़ा सतकार ॥
जीतिके डंका बाजन लागे नौबति झौरै रजा के द्वार १५४
सौ सौ तोपें दर्गी सलामी चकरन पाई खूब इनाम ॥
पिता हमारे किरपाशंकर कीन्हेनिसबैद्विजनकेकाम १५५
माथ नवाबों पितु अपने को जिनबल पूरिकीन यह गाथ ॥
मोर सहायी जग एकै हैं स्वामी अवधनाथ रघुनाथ १५६
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥
सुखसों जीवो तुम दुनियामें दिनदिनहोउधनीअधिकाय १५७
रहे समुन्दर में जबलों जल जबलौं रहें चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर १५८
इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां
निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसाद कृत
आल्हापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥
नैनागढ़आल्हाबिवाहसम्पूर्ण
इति ॥
४० आल्हखण्ड । १५६
राखौ गति अद्भुत दर्शानी २ ॥
निशि दिन पापकर्मरत प्राणी सत्यासत्य भुलानी ॥
हत्यालाख धरत शिर ऊपर मोह बेदना ठानी ॥ १ ॥
नाती पूत शोच बश परकर आतमज्ञान हिरानी ॥
अहं अहं डहकत दरवाजे देखत नारि बिरानी ॥ २ ॥
अभिमानी नित देखत आंखिन मरतजात बहुप्रानी ॥
तवहूं तनक चेत मननाहीं रटै रामगुणखानी ॥ ३ ॥
हटै अकाल सुकाल बढ़ै जग नाशाय रोग निशानी ॥
सो नहिं होनहार हम देखत होयँ बहुतनरज्ञानी ॥४॥
अभिमानी लाखन हम देखत ज्ञानी दशहु न जानी ॥
होत प्रपंच साधु सन्तनमें पंचन नाहिं ठिकानी ॥ ५ ॥
तजि दुर्गा अर्चन नर पामर गति मुर्गाकी आनी ॥
लैहँड़िपुत्र पौत्र उपजावत अनशिक्षित अभिमानी॥६॥
तेइ मर्य्याद धर्मकी नाशत भाषत झूठ गुमानी ॥
मात पिताको मूरख कहिकै देवत कष्ट महानी ॥ ७ ॥
यह कलियुगकी देखि बड़ाई कहत ललित यहबानी ॥
राघौ राम और रघुनन्दन इन बन्दन दुखहानी ॥ ८ ॥
चलो मन जहाँ बसैं रघुराज । चलो मन जहाँ बसैं रघुराज ॥
यहि दुनिया में कौन हमारो हम क्याहिके क्याहिकाज ॥
देखत जो कछु रहत न सो कछु ढहत काल शिरताज ॥ १ ॥
गहत कौनके रहत कौन नर सोइ कहत हम आज ॥
रघुनन्दन जगवन्दन ज्यहि सुत त्यहि शिरपर दुखभ्राज ॥ २ ॥
सेयो यशोदा नन्द कृष्णको सोऊ न आये काज ॥
वैरिनि त्रिपाति सबहिं शिरऊपर देखिलेहु महराज ॥ ३ ॥
जो मन फैसे जगत के अन्दर बन्दरसम बिनलाज ॥
द्वारद्वार नट तिन्है नचावत ललित पेट के काज ॥ ४ ॥
अथ आल्हखण्ड ॥
मलखानका बिवाह अथवा पथरी-
गढ़की लड़ाई ॥
सवैया ॥
ध्यावत तोहिं सदा हनुमान यही बरदान मिलै मोहिं स्वामी ।
हाथ लिये धनुबान कृपान मिलैं भगवान जे अन्तरयामी ॥
टारे टरैं न कबों उरते तिन राम नमामि नमामि नमामि ।
जान यही ललिते बरदान सुनो हनुमान सदा सुखधामी १
सुमिरन ॥
तुलसी हुलसी अब दुनिया में झुलसी सकल नरनकीकावि ॥
घर घर पोथी रामायण की दर दर फिरैं बगल में दाबि १
गिरिगिरि चन्दन नहिं होवैंकहुँ बन बन नहीं रहैं गजराज ॥
नारि पतिव्रत नाहिं घर घर हैं थल थल नहीं होयँ कविराज २
ग्राहक होवैं नहिं दुनिया में तब गुण जावैं सबै हिराय ॥
२ आल्हाखण्ड । १५८
भोजन खावै हरिको ध्यावै साँचो ग्राहक दीन बताय ३
नाहक जग में कोउ पछतावै भावै नहीं दूसरो काज ॥
देही आपनि गलि गलि जावै आवै फेरि जगत में लाज ४
छूटि सुमिरनी गै ह्वाँते अब शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
ब्याह बखानों मलखाने का लड़िहैं बड़े बड़े सरदार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
यहु गजराजा पथरीगढ़ को ज्याहिको भरी लाग दरबार ॥
बैठक बैठे सब छत्री हैं एकते एक शूर सरदार १
सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरन में महलन नाचिरहे कहुँ मोर ॥
बैठि कबूतर कहुँ घुटकत हैं तीतर बोलिरहे कहुँ जोर २
घोड़ अगिनिया त्यहि राजाके साजा सबै विधाता काज ॥
है गजमोतिनि त्यहिकी बेटी विद्या रूप शील शिरताज ३
सो नित खेलै सँग सखियन में मेलै सदा गले में हाथ ॥
सेमा भगतिनि की चेली है गुटवा ख्यलै सखिन के साथ ४
खेलत खेलत कछु सखियों ने कीन्ही तहाँ ब्याह की बात ॥
कोउकोउ सखियाँ तहँ ब्याहीथीं जानैं भलो श्वशुरपुर नात ५
ब्याही बोलैं अनब्याहिन सों सखियो सुनो हमारी बात ॥
सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुख मिलै श्वशुरपुरंरात ६
सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी तहँ अनब्यहीमनै अकुलायँ ॥
फिरिफिरिपूँछैं तिन सखियनसों कासुखश्वशुरपुरैअधिकाय ७
बतियाँ घतियाँ जे बालम की छतियाँ छुवैं और अठिलायँ ॥
रतियाँ केरी सब बतियाँ को सखियाँ कहैं और हरपायँ ८
सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुखश्वशुरपुरै अधिकाय ॥
सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी मनमाँ गई बात ये छाय ६
मलखानका बिवाह । १५६ ३
सब अनब्याही ब्याकुल ह्वैकै घरका चलीं मनै पछिताय ॥
गै गजमोतिनि निज महलनमें सोई समय रातिको पाय १०
जागे रोवन् शय्या लागी माता लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥
काहे रोवत तुम बेटीहौ हमको हालदेउ बतलाय ११
दीख्यो सपना मैं माता है ब्याहे लिये कोऊ घरजाय ॥
मैं सुधि कीन्ह्यों तहँ बप्पाकी माता रोय उठिउँ अकुलाय १२
सुनिकै बातें ये बेटी की चंपा गोद लीन बैठाय ॥
चूम्यो चाट्यो गले लगायो बातनदियो ताहि बहलाय १३
अवसर पायो जब रानी ने राजा पास पहुंची जाय ॥
बेटी लायक है ब्याहन के टीका देउ आप पठवाय १४
समया आयो अब कलियुगका औ युगधर्म रहा दर्शाय ॥
बातें सुनिकै ये रानी की राजा नेगी लीन बुलाय १५
सूरज बेटा को बुलवायो तासों हाल कह्यो समुझाय ॥
दिल्ली कनउज चहु तहँ जायो जायो जहँ न चँदेलौराय १६
तीन लाख को टीका लैके सूरज कूच दीन करवाय ॥
आठ रोज की मैजलि करिकै पहुँच्च्यो जहाँ पिथौराँराय १७
को गति बरणै तहँ दिल्ली कै जहँपर रहै कौरवनराज ॥
जहँपर गर्जत दुर्योधनरहै जहँपर अये कृष्णमहराज १८
भीषम ऐसे जहँ योधा थे द्रोणाचार्य ऐस द्विजराज ॥
तहँपर गरजे शिरीकृष्णजी जयजयनमोनमो ब्रजराज १९
जब सुधि आवत है दिल्ली कै तब मन आय जात ब्रजराज ॥
सदा पियारे हैं विप्रन के अबहूं देत खानको नाज २०
तहँपर पहुँचे सूरज ठाकुर चिट्ठी तुरत दीन पकराय ॥
आँक आँक सब पृथ्वी बांचा जो कुछ लिखा बिसेनेराय २१
४ आल्हखण्ड । १६०
ब्याह बिसेने के करिवे ना टीका तुरत दीन लौटाय ॥
सूरज चलिभे तहँ दिल्ली ते • कनउज फेरि पहुंचे आय २२
हैं कनौजिया जहाँ बाम्हन बहु बड़ बड़ महल परैं दिखराय ॥
वेद पुराणन की चर्चा तहँ घरघरअधिक२ अधिकाय २३
सूरज पहुँचे जब ड्योढ़ी में बोला द्वारपाल शिरनाय ॥
कौने राजाके लड़िकाहौ राजै खबरि देयँ पहुँचाय २४
बातें सुनिकै द्वारपाल की सूरज हाल दीन समुझाय ॥
द्वारपाल सुनि गा राजा ढिग तुरतै खबरि सुनाई जाय २५
सुनिकै बातें दरवानी की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥
द्वारपाल सूरज ढिग आयो लैके सभा पहुँचा जाय २६
चिट्ठी दीन्ह्यो तहँ सूरज ने जयचँद पढ़ा बहुत मनलाय ॥
क्यहिका लड़का घरभारू है पथरीगढ़ै बियाहन जाय २७
घोड़ अगिनिया जिनकेघरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥
तुरतै टीकाको लौटारयो यहु महराज कनौजीराय २८
चलिभे सूरज तहँ कनउजे ते ठरई फेरि पहुंचे आय ॥
पांचकोस मोहबे के आगे मारै हिरन उदयसिंहराय २६
सूरज ऊदन यकमिल हैगे दूनों कीन्ह्यो रामजुहार ॥
ऊदन पूछैं तहँ सूरज ते ठाकुर पथरी के सरदार ३०
टीको ऐसो का लै गमन्यो नेगी संग तुम्हारे चार ॥
सूरज बोलो तब ऊदन ते ठाकुर बेंदुलके असवार ३१
निकरे हनवन हम गङ्गा के साँचे हाल दीन बतलाय ॥
काह शिकारै तुम आयो है अकसर बनै उदयसिंहराय ३२
सुनिकै बातें ये सूरज की बोला तुरत बनाफरराय ॥
कियो बहाना तुम सूरज है नेगी संग लियेहौ भाय ३३
मलखानका विवाह । १६१ ५
हनवन केरी यह सामा ना झूंठी बात रह्यो बतलाय ॥
सूरज बोले फिरि ऊदन ते सांची सुनो बनाफरराय ३४
टीका लाये हम बहिनी का दिल्ली कनउज आये मँझाय ॥
टीका लीन्ह्यो क्यहु क्षत्री ना जावैं लौटि बनाफरराय ३५
इतना सुनिकै ऊदन बोले हमपर शारद भई सहाय ॥
दादा कोर मलखाने हैं टीका लिहे चलो तुम भाय ३६
सुफल तुम्हारी मेहनत होई हमरो काज सिद्ध है जाय ॥
सुनिकै बातें ये ऊदन की सूरज बोला बचन रिसाय ३७
नहीं आज्ञा महराजा की टीका नग्र मोहोबे जाय ॥
जाति बनाफर की हीनी है कीरति रही जगत में छाय ३८
सुनिकै बातें ये सूरज की बोला उदयसिंह सरदार ॥
नीके जैहौ तौ लैजैहौं नहिं यह देखिलेउ तलवार ३६
सुनिकै बातें ये ऊदन की नाई बारी उठे डेराय ॥
ते समुझावैं भल सूरजको मानो कही बिसेनेराय ४०
रारि न करियो तुम ऊदनते नामी देशराज को लाल ॥
पाँच कोस मोहबा है बाकी जहँ पर बसैं रजापरिमाल ४१
सुनि सुनि बातें सबनेगिनकी सूरज मनै गयो तसआय ॥
नेगिन लैके सूरज ऊदन पहुँचे जहाँ चँदेलोराय ४२
सजी कचहरी परिमालिक की भारी लाग राज दरबार ॥
ब्रह्मा आल्हा मलखे देबा सय्यद बनरसका सरदार ४३
देखिकै सूरजको परिमालिक बोले मधुर वचन मुसुकाय ॥
कहाँते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ४४
सुनिकै बातें परिमालिककी सूरज यथातथ्य गे गाय ॥
हाल जानिकै सब चंदेलो बोला सुनो बनाफरराय ४५
११
६ • आल्हाखण्ड । १६२
टीका आयो पथरीगढ़का ताको तुरत देउ लौटाय ॥
ब्याह बिसेने घर करिबे ना मानों कही उदयसिंहराय ४६
घोड़ अगिनियाँ तिनके घरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥
सुनिकै बातें परिमालिक की बोले तुरत बनाफरराय ४७
दतिया मारि उरैछोमारो पहुँचे सेतुबंध लों जाय ॥
पेशावर मुल्तान कमायूं बूंदी थहर थहर थहराय ४८
अटक पारलों झंडा गड़िगो औ मेवात लीन लुटवाय ॥
गर्व न राखा क्यहु क्षत्री का मानो कही चंदेलोराय ४६
गिनती किनमें बिसियानन की ठाढ़े तखत देउँ उलटाय ॥
हीनी मुखसों तुम भाषतहौ मेरो रजपूती धर्म नशाय ५०
मलखे ब्याहनको रैहैं ना यहु दिन कहिबेको रहिजाय ॥
टीका लौटी ना मोहबे ते राजा सत्य दीन बतलाय ५१
बोला चंदेला तब देबा ते अब तुम शकुन विचारो भाय ॥
कैसी गुजरी पथरीगढ़ में सो सब हाल देउ बतलाय ५२
सुनिकै बातें परिमालिककी देबा पोथी लीन उठाय ॥
शकुन सोचिकै देबा बोला साँची कहौं चंदेलोराय ५३
जीति तुम्हारी है पथरीगढ़ काहू बार न बाँको जाय ॥
आजु कि साइति भल नीकीहै टीका अबै देउ चढ़वाय ५४
सुनिकै बातें ये देबाकी महलन खबरिदीन पहुँचाय ॥
गा हरिकारा दशहरिपुरखा द्यावलि बिरमा लवालवाय ५५
आँगन लीपागा गोबर सों मोतिन चौक दीन पुरवाय ॥
चूड़ामणि पण्डित फिरिआये तुरतै सूरज लये बुलाये ५६
चारो नेगी सँग में लैके सूरज महल पहुँचे आय ॥
चरण लागिकै मलखाने के बीरा मुखमें दीन खवाय ५७
मलखानका बिवाह । १६३ ७
सखियाँ गावन मंगल लागीं नेगिन झगर मचावा आय ॥
सोने चाँदी के गहना को सूरज सबै दीन पहिराय ५८
ऊदन पहुँचे निज कमरामें डिब्बा लाये तुरत उठाय ॥
खूब पहिरावा सब नेगिन को चारों खुशीभये अधिकाय ५६
बचा बचावा जो गहना रहे नेगिन स्वऊ दीन पकराय ॥
औरो नेगी जो पथरीगढ़ तिनको यहौ दिह्यो पहिराय ६०
ऊदन बोले फिरि नेगिनसे तुम गजराज दिह्यो समुझाय ॥
माघ शुक्ल तेरसि की साइति होई ब्याह तहांपर आय ६१
हाथ जोरिकै सूरज बोले आज्ञा देउ चंदेलोराय ॥
हम चलिजावें पथरीगढ़ को राजै खबरि सुनावैं जाय ६२
बातें सुनिकै ये सूरज की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥
राम जुहार तुरत फिरिकरिकै सूरज कूच दीन करवाय ६३
सौ सौ तोपैं दगीं सलामी पठवन चले लहुरवाभाय ॥
बिदा माँगिकै फिरि ऊदनसों अपने नेगी संगलिवाय ६४
सूरज चलिभे पथरीगढ़को माहिल कथा कहौं अब गाय ॥
कहुँ सुधिपाई माहिल ठाकुर टीका चढ़ा मोहोबे जाय ६५
लिल्हीघोड़ी को मँगवायो तापर तुरत भयो असवार ॥
सूरजतेनी आगे पहुँचा ठाकुर उरई का सरदार ६६
सजी कचहरी गजराजा की भारी लाग राज दरबार ॥
झारि बिसेने सब बैठे हैं टिहुननधरे नाँगि तलवार ६७
माहिल पहुँचे त्यहि समया में राजै कीन्ह्यो राम जुहार ॥
बड़ी खातिरी राजै कीन्ह्यो बैठा उरई का सरदार ६८
राजा बोले फिरि माहिलते नीके रहे खूब तुम भाय ॥
माहिल बोले फिरि राजाते भइ अनहोनी कहींनाजाय ६६
८ आल्हाखण्ड । १६४
बेटी तुम्हरी गजमोतिनि का टीका चढ़ा मोहोबे जाय ॥
जाति बनाफर की हीनी है जानौं भलीभांति तुमभाय ७०
पानी पीहै को घर तुम्हरे आपन धर्म गँवैहै आय ॥
अबै न बिगरा कछु राजा है साँचे हाल दीन बतलाय ७१
सुनिकै बातें ये माहिल की राजा गयो सनाकाखाय ॥
तबलों सूरज अटा कचहरी राजै शीश नवायो आय ७२
राजा बोल्यो फिरि सूरजते टीका कहाँ चढ़ायो जाय ॥
दोउ कर जोरे सूरज बोले दादा सत्य देउँ बतलाय ७३
दिल्लीकनउज हम फिरि आयन टीका क्यहुन लीन महिपाल ॥
मोहबे उरई के अन्दर में मिलिगे देशराज के लाल ७४
लै बरजोरी गे मोहबे को टीका चढ़ा वीर मलखान ॥
जो कछु रारिकरत मोहबे में दादा जात प्रान पर आन ७५
माघ शुक्ल तेरसिको अइहैं यह सच साइतिका परमान ॥
मारब ब्याहब जो कछु कहिहौं उतनै घनै भई है हान ७६
जितना टीका में दै आये लाये आपन प्राण बचाय ॥
साम दाम अरु दण्ड भेद सों कीन्हे काज तहांपर जाय ७७
सुनिकै बातें ये सूरज की राजै पास लीन बैठाय ॥
फिरि शिरसूंघ्यो गजराजा ने लीन्ह्यो तुरतै गले लगाय ७८
राजा बोल्यो फिरि माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥
ब्याहन अइहैं जब हमरे घर तबहीं चली तुरत तलवार ७६
ब्याह न होई गजमोतिनि का तुमते साँच दीन बतलाय ॥
बिदा मांगिकै फिरि राजासों माहिल चले बड़ा सुखपाय ८०
माघ महीना आवन लाग्यो धावन लगे मोहोबे दूत ॥
लिखिलिखिचिट्ठी परिमालिकने न्यवतन हेत पठावा दूत ८१
मलखानका विवाह। १६५ ६
दिल्ली कनउज औ नैनागढ़ उरई न्यवत दीन पठवाय ॥
सिरउज पनउज औ बौरी में न्यवता भेजा चँदेलोराय ८२
पायके चिट्ठी परिमालिककै इनको मानि बड़ो ब्यवहार ॥
नगर मोहोबे के जानेको राजा होन लागि तय्यार ८३
बाजे डंका अहर्तका के राजन कूचदीन करवाय ॥
तेरस केरो शुभ मुहूर्त पढ़ मोहबे गये सबै नृप आय ८४
तम्बू गड़िगे महराजन के खातिर कीन उदयसिंहराय ॥
पढ़े पढ़ाये सब क्षत्री रहें अपने धर्म कर्म समुदाय ८५
उचित औ अनुचितके ज्ञातारहें जानैं राजनीति सब भाय ॥
देश आरिया यह बाजत है आर्य कहै बसिंदा जायँ ८६
आर्य ऊदन त्यहि समया में सबको खुशी कीन अधिकाय ॥
तुरत नगड़ची को बुलवायो तासों कह्यो हाल समुझाय ८७
बाजे डंका अब मोहवे माँ सबियाँ फौज होय तय्यार ॥
सुनिकै बातें ये ऊदन की डंका भजनलाग त्यहिबार ८८
मलखे आये फिरि महलन में होवन लाग तेल त्योहार ॥
एक कुमारी तेल चढ़ावै गावैं सबै मंगलाचार ८६
माय मन्तरा भे दूसरे दिन नहखुर समयगयो फिरिआय ॥
लैके महाउर नाइनि आई नहखुर करन लागि हर्षाय ६०
जो कछु माँग्यो ज्यहि नेगी ने मल्हना दीन ताहिसमुझाय ॥
मनके भाय जब सब पाये नेगिन खुशी कहीनाजाय ६१
कुँवाँ बियाहन के समया में मलखे चढ़ पालकी धाय ॥
बिटिया मल्हना की चन्द्रावाले राई नोन उनारति जाय ६२
जायकै पहुंचे फिरि कुँवनापर बिरमा पैर दीन लटकाय ॥
भाँवरि घूम्यो मलखाने ने लीन्ह्यो माता पैर उठाय ६३
[Header]
१० आल्हखण्ड । १६६
बहू लय आवौं त्वरि सेवा को | माता बाग दिह्यौ लगवायं ॥
ऐसा कहिकै मलखाने ने | भाँवरि घुमी सातहू धाय ९४
पाँय लागिकै फिरि मल्हनाके | द्यावलि चरणनशीशनवाय ॥
चरणन लाग्यो जब बिरमा के | मातालीन्ह्यो हृदय लगाय ९५
पंजा फेस्यो फिरि मल्हना ने | तुम्हरो बार न बाँका जाय ॥
बैठि पालकी मलखाने गे | मनमें श्रीगणेशकोध्याय ९६
बाजन बाजे फिरि मोहबे माँ | हाहाकारी शब्द सुनाय ॥
हाथी सजिगा पचशब्दा तहँ | आल्हा चढ़े रामकोध्याय ९७
हरनागर की फिरि पीठी माँ | ब्रह्मा फाँदि भये असवार ॥
बीरशाह बौरी का राजा | रूपन सिर्रउज का सरदार ९८
देवकुँवरि रानी के बालक | पनउज केरे मदन गुपाल ॥
ये सब क्षत्री चढ़ि घोड़नपर | औरौ सजे बहुत नरपाल ९६
घोड़ मनोहर देवा बैठे | सय्यद सिर्गापर असवार ॥
सजा बेंदुला का चढ़वैया | जो दिनरात करै तलवार १००
घोड़ी कबूतरी मलखाने की | कोतल तुरत भई तय्यार ॥
लख्खा गर्रा पँचकल्यानी | हरियलमुश्की घोड़अपार १०१
सुर्खा सब्जा सिर्गा मुँरगा | ताजी तुरकी रंग बिरंग ॥
कच्छी मच्छी काबुल वाले | तिनकीकसीगईफिरि तंग १०२
डारि रकाबै गंगा यमुनी | मुखमें दीन लगाम लगाय ॥
परीं हयकलें सब घोड़न के | मेंहदी बूटा रहे बनाय १०३
नवल बछेड़ा सब साजेगे | एकते एक रूप अधिकाय ॥
हथी महावत हाथी लै कै | तिनपर हौदादये धराय १०४
हाथी सजिगे जब मोहबे में | तोपै सबै भई तय्यार ॥
पहिल नगाड़ामें जिनबन्दी | दूसरे फाँदिभये असवार १०५
मलखानका बिवाह । १६७ १३
तिमर नगाड़ाके बाजत खन क्षत्रिन कूच दीन करवाय ॥
बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर समुदाय १०६
मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥
खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बाचले पवनकी चाल १०७
लक्ष पताका यकमिल हैगे नभमाँ गई लालरी छाय ॥
धूरि उड़ानी हय टापन सों बाबा सूरज गये छिपाय १०८
ब्याकुल हैकै पक्षी भागे जंगल जीव गये थर्राय ॥
चलीं बरातें मलखाने की हमरे बूत कहीं ना जाय १०६
सात रोजकी मैजलि करिकै पहुँचे तुरत धुरेपर आय ॥
तम्बू गड़िगे महराजन के झंडा सरग फरहरा खायँ ११०
सजिगा तम्बू तहँ आल्हा का भारी लाग खूब दरबार ॥
चूड़ामणि पण्डित तहँ आयौ साइति लाग्योकरनबिचार १११
साइति नीकी अब आई है ऐपनवारी देउ पठाय ॥
हाथ जोरिकै रूपन बोला नेगी कौन तहाँ को जाय ११२
हम नहिं जैहैं पथरी गढ़को सांची सुनो बनाफरराय ॥
बातें सुनिकै ये रूपन की बोलातुरत ललुरवा भाय ११३
घोड़ी कबूतरी दादावाली रूपन चढ़ो ताहिपर जाय ॥
बानाराखे रजपूती का कैसे बने जनाना भाय ११४
सवैया ॥
प्राण न प्यार करें रणशूर कहैं ललिते हम सत्य विचारी ।
सोनकोधारि झमा झमकारि सो जातसदा पियसेजमें नारी ॥
पाय निशा चमकै तहँ नारि सो रारिकिये चमकै तलवारी ।
शेरिकिये यश शूरने होत सो कूरनकी अपकीरति भारी १६५
१२ आल्हखण्ड । १६८
सुनिकै बातें ये ऊदनकी रूपन बहुतगयो शर्म्याय ॥
घोड़ी कबुतरी पर चढ़ि बैठ्यो ऐपनवारी लीन उठाय ११६
माथ नायकै सब क्षत्रिन को मनियादेव हृदय सों ध्याय ॥
चारिघरी के फिरि अरसा माँ फाटक ऊपर पहूँचा आय ११७
हुकुम दर्ररै हुकुम दर्ररै साहेबजादे बात बनाय ॥
कहाँते आये औ कहँ जैहै आपन काम देय बतलाय ११८
सुनिकै बातें दरबानी की बोला घोड़ी का असवार ॥
नगर मोहोबा जगमें जाहिर नामी मोहबे के सरदार ११९
ब्याहन मलखे को आयन हैं मानो साची कही हमार ॥
ऐपनवारी बारी लायो बोलो ठाढ़ो राज दुवार १२०
नेग आपने को झगरत है भारी नेग चहै कछुदार ॥
नेग आपनो का तुमचाहौ बोलो घोड़ी के असवार १२१
घोड़ी जोड़ी लैके जाई डांड़े परे तासु भर्त्तार ॥
बोलु गवाँरे अब ऐसे ना द्वारे चहौं चलै तलवार १२२
सुनिकै बातें ये रूपन की चक्रुत द्वारपाल भा द्वार ॥
फिरि २ देखै दिशि रूपन के फिरि २ लावै शोच बिचार १२३
ऐसो बारी हम देखा ना जैसो आयो आज दुवार ॥
सोचि समुझिकै फिरिसो बोला बोलो घोड़े के असवार १२४
गरमी तुम्हरी अब कछु उतरी बोलो नेग काह तुम द्वार ॥
चार घरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्त की धार १२५
नेग हमारो यह साँचा है याँचा द्वार तुम्हारे आय ॥
जौन शूरमा हो पथरीगढ़ हमरो नेग देय चुकवाय १२६
ऐसे वैसे हम बारी ना मारी सदा शूर दश पांच ॥
खबरि सुनावै तू राजा का तेरी निकरिपरै कस कांच १२७
मलखानका विवाह । १६९ १३
सुनिकै बातें ये रूपन की पहुँचा द्वारपाल दरबार ॥
झारि बिसेने सब बैठे हैं एकते एक शूर सरदार १२८
हाथ जोरि औ बिनती करिकै बोला द्वारपाल शिरनाय ॥
ऐपनावारी बारी लायो भारी नेग चहै ह्याँ आय १२९
चार पहरभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥
नेग आपनो बारी बोलै लीन्हे हाथ ढाल तलवार १३०
सुनिकै बातें द्वारपाल की तब गजराजा उठा रिसाय ॥
बाँधिकै मुशकें त्यहि बारी की सूरज मोहिं दिखावै आय १३१
इतना सुनिकै मानसिंह तहँ द्वारे तुरत पहुँचा आय ॥
सेल चलायो त्यहि रूपनापर रूपनालीन्ह्यो वारबचाय १३२
मार्यो लटुवा फिरि भालाको शिरते चली खूनकी धार ॥
ऐँड़ा मसक्यो फिरि घोड़ी के फाटकनिकरिगयोवहिपार१३३
बहुतक दौरे फिरि पाछे सों धरु धरु मारु करें लतकार ॥
घोड़ी कबुतरी मलखेवाली नामी मोहबेका सरदार १३४
त्यहिके बलसों रूपन बारी बहुतन मारि मिलायो खार ॥
जायकै पहुँचा फिरि तम्बुन में भारी लाग जहाँ दरबार १३५.
दीख्यो ऊदन तहँ रूपन का मानों फगुई का त्यवहार ॥
कैसी गुजरी रहै द्वारेपर बोले उदयसिंह सरदार १३६
सुनिकै बातें ये ऊदन की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय१३७
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥
परे आलसी खटिया.तकितकि घों घों कण्ठ रहा घर्राय १३८
करौं बन्दना गणनायक की दोनों चरणकमल शिरनाय ॥
शीश नवावों पितु अपने को मनमें सदा रामपदध्याय १३६
१४ आल्हाखण्ड । १७०
करौं तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥
को यशगावै शिवशंकर को जिनको वेद न पावैं अन्त १४०
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबूप्रयागना-
Rayanjiकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपूँदरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध
कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखानविवाहविषय
वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥
सवैया ॥
दीननके मन मीनन को मेघवा है वरषत हौ नितवारी।
होय भिखारि चहौ नरनारि किये प्रभुआश सदा सुखकारी ॥
दीन पुकार विभीषणकी सुनि आप हर्यो विपदासबहारी ॥
कौन सो दीन रहा शरणागत जो न भयो ललिते हितकारी १
सुमिरन ॥
धन्य बखानों मैं नारद को कीन्ह्यो बड़ा जगत उपकार ॥
शिक्षा देते नहिं दुष्टन को तौ कस धरत राम अवतार १
जो रघुनन्दन जग होते ना तौ यहचरित करत को भाय ॥
'काह बखानत तुलसी कलियुग कैसे जात जगत यशछाय २
कृष्ण न होते जो द्वापर में कैसे सूर जात भवपार ॥
कोधों मारत शिशुपालै को कोधों करत कंस सों रार ३
कैसे अर्जुन भारत जीतत कैसे करत युधिष्ठिर राज ॥
कौन सो दुनिया में ऐसो भो जैसे भये कृष्ण महराज ४
छूटि सुमिरनी गै देवनकै - शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
माहिल अइहैं उरई वाले जहँ गजराज केर दरबार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
गा जब रूपन बनि द्वारे पर माहिल आयगयो ततकाल ॥
मलखानका बिवाह । १७१ १५
आदर करिकै बड़ माहिल का बोले मधुर बचन नरपाल १
ऐपनवारी बारी लायो कीन्ह्यो कठिन द्वार तलवार ॥
कैसे मरिहैं मोहबे वाले बोलो उरई के सरदार २
सुनिकै बातें ये राजा की माहिल बोले बचन उदार ॥
ज्यहि की नीकी बेटी ब्याखैं ऊदन गाँसैं तासु दुवार ३
मिर्चवान ब्याहे की पठवो तामें जहर देव मिलवाय ॥
बिना बयारी जूना टूटै औ बिन औषध हटै बलाय ४
बातें सुनिकै ये माहिल की राजा मनै फूलिगा भाय ॥
जहर घुरायो त्यहिं शर्बत माँ सूरज पुत्र दीन पठवाय ५
दिय जनवासा फिरि पथरीगढ़ पाछे शर्बत दीन पठाय ॥
आदर करिकै सूरज ठाकुर चाँदी आबखोर मँगवाय ६
लै अबखोरा भरि त्यहि शर्बत आल्हा पास पहुंचा जाय ॥
जब अबखोरा आल्हा लीन्ह्यों सम्मुख भई छींक तब आय ७
ऊदन बोले तब देवा ते अब तुम शकुन बताओ भाय ॥
देवा बोला तब ऊदन ते साँची सुनो लहुरवा भाय =
कालरूप यहु शर्बत आयो सबकी मृत्यु गई नगच्याय ॥
धारि जनेऊ तब काने में सूरज उठा तड़ाका भाय ६
ऊदन बोले तब आल्हा ते कुत्ते देवो आप पियाय ॥
जो मरिजावै पी कुत्ता यह तौ सब जहर देव फिकवाय १०
इतना सुनिकै नेगी चलिभे मारन लागि लहुरवा भाय ॥
बड़े दयालू आल्हा बोले ऊदन छाँड़ि देव यहि ठायाँ ११
प्रजा हमारी सम परजा हैं ठाकुर भागि गयो भयखाय ॥
नामी ठाकुर तुम मोहबे के इनपर दयाकरो यहि ठार्य १२
माधै राजा के नौकर हो तुम्हरो करै काह उपकार ॥