आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमलखानका बिवाह । १५६ ३
सब अनब्याही ब्याकुल ह्वैकै घरका चलीं मनै पछिताय ॥
गै गजमोतिनि निज महलनमें सोई समय रातिको पाय १०
जागे रोवन् शय्या लागी माता लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥
काहे रोवत तुम बेटीहौ हमको हालदेउ बतलाय ११
दीख्यो सपना मैं माता है ब्याहे लिये कोऊ घरजाय ॥
मैं सुधि कीन्ह्यों तहँ बप्पाकी माता रोय उठिउँ अकुलाय १२
सुनिकै बातें ये बेटी की चंपा गोद लीन बैठाय ॥
चूम्यो चाट्यो गले लगायो बातनदियो ताहि बहलाय १३
अवसर पायो जब रानी ने राजा पास पहुंची जाय ॥
बेटी लायक है ब्याहन के टीका देउ आप पठवाय १४
समया आयो अब कलियुगका औ युगधर्म रहा दर्शाय ॥
बातें सुनिकै ये रानी की राजा नेगी लीन बुलाय १५
सूरज बेटा को बुलवायो तासों हाल कह्यो समुझाय ॥
दिल्ली कनउज चहु तहँ जायो जायो जहँ न चँदेलौराय १६
तीन लाख को टीका लैके सूरज कूच दीन करवाय ॥
आठ रोज की मैजलि करिकै पहुँच्च्यो जहाँ पिथौराँराय १७
को गति बरणै तहँ दिल्ली कै जहँपर रहै कौरवनराज ॥
जहँपर गर्जत दुर्योधनरहै जहँपर अये कृष्णमहराज १८
भीषम ऐसे जहँ योधा थे द्रोणाचार्य ऐस द्विजराज ॥
तहँपर गरजे शिरीकृष्णजी जयजयनमोनमो ब्रजराज १९
जब सुधि आवत है दिल्ली कै तब मन आय जात ब्रजराज ॥
सदा पियारे हैं विप्रन के अबहूं देत खानको नाज २०
तहँपर पहुँचे सूरज ठाकुर चिट्ठी तुरत दीन पकराय ॥
आँक आँक सब पृथ्वी बांचा जो कुछ लिखा बिसेनेराय २१