आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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करौं तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥
को यशगावै शिवशंकर को जिनको वेद न पावैं अन्त १४०
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबूप्रयागना-
Rayanjiकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपूँदरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध
कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखानविवाहविषय
वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥
सवैया ॥
दीननके मन मीनन को मेघवा है वरषत हौ नितवारी।
होय भिखारि चहौ नरनारि किये प्रभुआश सदा सुखकारी ॥
दीन पुकार विभीषणकी सुनि आप हर्यो विपदासबहारी ॥
कौन सो दीन रहा शरणागत जो न भयो ललिते हितकारी १
सुमिरन ॥
धन्य बखानों मैं नारद को कीन्ह्यो बड़ा जगत उपकार ॥
शिक्षा देते नहिं दुष्टन को तौ कस धरत राम अवतार १
जो रघुनन्दन जग होते ना तौ यहचरित करत को भाय ॥
'काह बखानत तुलसी कलियुग कैसे जात जगत यशछाय २
कृष्ण न होते जो द्वापर में कैसे सूर जात भवपार ॥
कोधों मारत शिशुपालै को कोधों करत कंस सों रार ३
कैसे अर्जुन भारत जीतत कैसे करत युधिष्ठिर राज ॥
कौन सो दुनिया में ऐसो भो जैसे भये कृष्ण महराज ४
छूटि सुमिरनी गै देवनकै - शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
माहिल अइहैं उरई वाले जहँ गजराज केर दरबार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
गा जब रूपन बनि द्वारे पर माहिल आयगयो ततकाल ॥