आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंमलखानका बिवाह । १६७ १३
तिमर नगाड़ाके बाजत खन क्षत्रिन कूच दीन करवाय ॥
बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर समुदाय १०६
मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥
खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बाचले पवनकी चाल १०७
लक्ष पताका यकमिल हैगे नभमाँ गई लालरी छाय ॥
धूरि उड़ानी हय टापन सों बाबा सूरज गये छिपाय १०८
ब्याकुल हैकै पक्षी भागे जंगल जीव गये थर्राय ॥
चलीं बरातें मलखाने की हमरे बूत कहीं ना जाय १०६
सात रोजकी मैजलि करिकै पहुँचे तुरत धुरेपर आय ॥
तम्बू गड़िगे महराजन के झंडा सरग फरहरा खायँ ११०
सजिगा तम्बू तहँ आल्हा का भारी लाग खूब दरबार ॥
चूड़ामणि पण्डित तहँ आयौ साइति लाग्योकरनबिचार १११
साइति नीकी अब आई है ऐपनवारी देउ पठाय ॥
हाथ जोरिकै रूपन बोला नेगी कौन तहाँ को जाय ११२
हम नहिं जैहैं पथरी गढ़को सांची सुनो बनाफरराय ॥
बातें सुनिकै ये रूपन की बोलातुरत ललुरवा भाय ११३
घोड़ी कबूतरी दादावाली रूपन चढ़ो ताहिपर जाय ॥
बानाराखे रजपूती का कैसे बने जनाना भाय ११४
सवैया ॥
प्राण न प्यार करें रणशूर कहैं ललिते हम सत्य विचारी ।
सोनकोधारि झमा झमकारि सो जातसदा पियसेजमें नारी ॥
पाय निशा चमकै तहँ नारि सो रारिकिये चमकै तलवारी ।
शेरिकिये यश शूरने होत सो कूरनकी अपकीरति भारी १६५