आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका बिवाह । १५५ . ३६
उतरिकै पलकी ते सुनवाँफिरि महलन तुरत पहुंचीजाय १४९
मुहँ दिखलाई रानी मल्हना गलको दीन नौलखाहार ॥
पायँ लागेकै सुनवाँ तहँपर करको कंकण दीन उतार १५०
बाजन बाजे चौगिर्दा ते घर घर भये मंगलाचार ॥
फिरि परिमालिक की ड्योढ़ीमाँ पहुंचे सबै शूर सरदार १५१
राजा पूँछें मलखाने ते ओ बिरमा के राजकुमार ॥
अमरढोल रहे नयपाली के कैसे किह्यो तहाँपर मार १५२
इतना सुनिकै मलखे बोले तुम सुनिलेउ रजापरिमाल ॥
दया तुम्हारी जापर होवै ताकीबिजयहोयसबकाल १५३
हृदय लगायो सब कुँवरन को सबको कीन बड़ा सतकार ॥
जीतिके डंका बाजन लागे नौबति झौरै रजा के द्वार १५४
सौ सौ तोपें दर्गी सलामी चकरन पाई खूब इनाम ॥
पिता हमारे किरपाशंकर कीन्हेनिसबैद्विजनकेकाम १५५
माथ नवाबों पितु अपने को जिनबल पूरिकीन यह गाथ ॥
मोर सहायी जग एकै हैं स्वामी अवधनाथ रघुनाथ १५६
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥
सुखसों जीवो तुम दुनियामें दिनदिनहोउधनीअधिकाय १५७
रहे समुन्दर में जबलों जल जबलौं रहें चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर १५८
इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां
निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसाद कृत
आल्हापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥
नैनागढ़आल्हाबिवाहसम्पूर्ण
इति ॥