आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ आल्हाखण्ड । १५२
भाँवरि तीसरि के परतैखन बिजिया मारी गुर्ज उठाय ॥
वार बचाई त्यहि देवाने राजा रंगमहल को जाय ११५
भाँवरि चौथी के परतैखन राजा जादू दीन चलाय ॥
जवाँ बन्द भै सब कुँवरन कै सबकी नजरबन्द है जाय ११६
सुनवाँ सोची अपने मनमाँ बैरी हैगा बाप हमार ॥
बीर महम्मद की पुरिया को सुनवाँछोड़िदीनत्यहिबार ११७
भई लड़ाई तहँ जादुनकी सातों भाँवरि लई कराय ॥
आल्हा वाली फिरि पलकी में तुरतै सुनवाँ लीन विठाय ११८
सवैया ॥
भूप दुवार चली तलवार अपार बही तहँ शोणित धारा।
वीर बली मलखान सुजान तहाँ बहु क्षत्रिनको हनिडारा ॥
पूतजुझार महाहुशियार लड़ै तहँ भीषम केर कुमारा ।
कौनकहै बघऊदनको रिपुसूदनसों ललिते त्यहि बारा ११९
सुन्दरखन को अरिनन्दन जो सोऊ आयगयो त्यहि द्वार ॥
आठकोसलों चलै सिरोही नदिया बही रक्त की धार १२०
आगे डोलाहै सुनवाँ को पीछे होय भड़ाभड़ मार ॥
ऊदनमलखे की मारुन में जूझे बड़े बड़े सरदार १२१
आल्हा बँधुवाभे नैनागढ़ जोगा झगा बँधे मलखान ॥
कूच करायो बघऊदन ने लश्कर मागराज नियरान१२२
ऊदन बोले तब सुनवाँ ते भौजी मानों कही हमार ॥
दादा बांधेगे नैनागढ़ कैसी युक्तिकरी यहिवार १२३
सुनिकै बातें बघऊदन की सुनवाँ युक्ति कही समुझाय ॥
सम्मत करिकै दूनों चलिभे नैनागढ़ै पहूंचे आय १२४
पुहपा मालिनि के घर बैठे सुनवाँ सहित लहुरवा भाय ॥