आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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१० आल्हखण्ड । १६६
बहू लय आवौं त्वरि सेवा को | माता बाग दिह्यौ लगवायं ॥
ऐसा कहिकै मलखाने ने | भाँवरि घुमी सातहू धाय ९४
पाँय लागिकै फिरि मल्हनाके | द्यावलि चरणनशीशनवाय ॥
चरणन लाग्यो जब बिरमा के | मातालीन्ह्यो हृदय लगाय ९५
पंजा फेस्यो फिरि मल्हना ने | तुम्हरो बार न बाँका जाय ॥
बैठि पालकी मलखाने गे | मनमें श्रीगणेशकोध्याय ९६
बाजन बाजे फिरि मोहबे माँ | हाहाकारी शब्द सुनाय ॥
हाथी सजिगा पचशब्दा तहँ | आल्हा चढ़े रामकोध्याय ९७
हरनागर की फिरि पीठी माँ | ब्रह्मा फाँदि भये असवार ॥
बीरशाह बौरी का राजा | रूपन सिर्रउज का सरदार ९८
देवकुँवरि रानी के बालक | पनउज केरे मदन गुपाल ॥
ये सब क्षत्री चढ़ि घोड़नपर | औरौ सजे बहुत नरपाल ९६
घोड़ मनोहर देवा बैठे | सय्यद सिर्गापर असवार ॥
सजा बेंदुला का चढ़वैया | जो दिनरात करै तलवार १००
घोड़ी कबूतरी मलखाने की | कोतल तुरत भई तय्यार ॥
लख्खा गर्रा पँचकल्यानी | हरियलमुश्की घोड़अपार १०१
सुर्खा सब्जा सिर्गा मुँरगा | ताजी तुरकी रंग बिरंग ॥
कच्छी मच्छी काबुल वाले | तिनकीकसीगईफिरि तंग १०२
डारि रकाबै गंगा यमुनी | मुखमें दीन लगाम लगाय ॥
परीं हयकलें सब घोड़न के | मेंहदी बूटा रहे बनाय १०३
नवल बछेड़ा सब साजेगे | एकते एक रूप अधिकाय ॥
हथी महावत हाथी लै कै | तिनपर हौदादये धराय १०४
हाथी सजिगे जब मोहबे में | तोपै सबै भई तय्यार ॥
पहिल नगाड़ामें जिनबन्दी | दूसरे फाँदिभये असवार १०५