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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

मलखानका बिवाह । १६३ ७

सखियाँ गावन मंगल लागीं नेगिन झगर मचावा आय ॥
सोने चाँदी के गहना को सूरज सबै दीन पहिराय ५८
ऊदन पहुँचे निज कमरामें डिब्बा लाये तुरत उठाय ॥
खूब पहिरावा सब नेगिन को चारों खुशीभये अधिकाय ५६
बचा बचावा जो गहना रहे नेगिन स्वऊ दीन पकराय ॥
औरो नेगी जो पथरीगढ़ तिनको यहौ दिह्यो पहिराय ६०
ऊदन बोले फिरि नेगिनसे तुम गजराज दिह्यो समुझाय ॥
माघ शुक्ल तेरसि की साइति होई ब्याह तहांपर आय ६१
हाथ जोरिकै सूरज बोले आज्ञा देउ चंदेलोराय ॥
हम चलिजावें पथरीगढ़ को राजै खबरि सुनावैं जाय ६२
बातें सुनिकै ये सूरज की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥
राम जुहार तुरत फिरिकरिकै सूरज कूच दीन करवाय ६३
सौ सौ तोपैं दगीं सलामी पठवन चले लहुरवाभाय ॥
बिदा माँगिकै फिरि ऊदनसों अपने नेगी संगलिवाय ६४
सूरज चलिभे पथरीगढ़को माहिल कथा कहौं अब गाय ॥
कहुँ सुधिपाई माहिल ठाकुर टीका चढ़ा मोहोबे जाय ६५
लिल्हीघोड़ी को मँगवायो तापर तुरत भयो असवार ॥
सूरजतेनी आगे पहुँचा ठाकुर उरई का सरदार ६६
सजी कचहरी गजराजा की भारी लाग राज दरबार ॥
झारि बिसेने सब बैठे हैं टिहुननधरे नाँगि तलवार ६७
माहिल पहुँचे त्यहि समया में राजै कीन्ह्यो राम जुहार ॥
बड़ी खातिरी राजै कीन्ह्यो बैठा उरई का सरदार ६८
राजा बोले फिरि माहिलते नीके रहे खूब तुम भाय ॥
माहिल बोले फिरि राजाते भइ अनहोनी कहींनाजाय ६६