आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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राखौ गति अद्भुत दर्शानी २ ॥
निशि दिन पापकर्मरत प्राणी सत्यासत्य भुलानी ॥
हत्यालाख धरत शिर ऊपर मोह बेदना ठानी ॥ १ ॥
नाती पूत शोच बश परकर आतमज्ञान हिरानी ॥
अहं अहं डहकत दरवाजे देखत नारि बिरानी ॥ २ ॥
अभिमानी नित देखत आंखिन मरतजात बहुप्रानी ॥
तवहूं तनक चेत मननाहीं रटै रामगुणखानी ॥ ३ ॥
हटै अकाल सुकाल बढ़ै जग नाशाय रोग निशानी ॥
सो नहिं होनहार हम देखत होयँ बहुतनरज्ञानी ॥४॥
अभिमानी लाखन हम देखत ज्ञानी दशहु न जानी ॥
होत प्रपंच साधु सन्तनमें पंचन नाहिं ठिकानी ॥ ५ ॥
तजि दुर्गा अर्चन नर पामर गति मुर्गाकी आनी ॥
लैहँड़िपुत्र पौत्र उपजावत अनशिक्षित अभिमानी॥६॥
तेइ मर्य्याद धर्मकी नाशत भाषत झूठ गुमानी ॥
मात पिताको मूरख कहिकै देवत कष्ट महानी ॥ ७ ॥
यह कलियुगकी देखि बड़ाई कहत ललित यहबानी ॥
राघौ राम और रघुनन्दन इन बन्दन दुखहानी ॥ ८ ॥
चलो मन जहाँ बसैं रघुराज । चलो मन जहाँ बसैं रघुराज ॥
यहि दुनिया में कौन हमारो हम क्याहिके क्याहिकाज ॥
देखत जो कछु रहत न सो कछु ढहत काल शिरताज ॥ १ ॥
गहत कौनके रहत कौन नर सोइ कहत हम आज ॥
रघुनन्दन जगवन्दन ज्यहि सुत त्यहि शिरपर दुखभ्राज ॥ २ ॥
सेयो यशोदा नन्द कृष्णको सोऊ न आये काज ॥
वैरिनि त्रिपाति सबहिं शिरऊपर देखिलेहु महराज ॥ ३ ॥
जो मन फैसे जगत के अन्दर बन्दरसम बिनलाज ॥
द्वारद्वार नट तिन्है नचावत ललित पेट के काज ॥ ४ ॥