सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

२८ आल्हाखण्ड । १४४
तुम चढ़िआवो अब नावन में देखो नाच यहाँ पर आय ॥
कहैं सगाई हम साँची फिरि तुम सों हाल देयें बतलाय १६
सुनिकै बातैं आल्हाठाकुर नावन उपर पहुंचे जाय ॥
किह्यो इशारा अरिनन्दन ने खेवट दीन्ह्यो नाव चलाय २०
डाटिकै बोल्यो आल्हाठाकुर खेई नाव अबै ना जाय ॥
सुनिकैबोल्यो अरिनन्दन फिरि आल्है बार बार समुझाय २१
सोला मिनटन के अर्सा में आवो फेरि यहां पर भाय ॥
लहरा नदिया के तानन में बानन सरिस पहुँचैं जायँ २२
सो मन भावै महराजन के जे शिरताजन के समुदाय ॥
लहरा नदिया के तानन सों बानन सरिस पैरैं दिखराय २३
इतना कहतै अरिनन्दन के पहुंची नाव किनारे आय ॥
उतरी उतरा भा नावनते आल्हा उतरि परे हर्षाय २४
तम्बूलैंगे अरिनन्दन तब बन्दन कैकै शीश नवाय ॥
द्यावलि नन्दन तहँ बैठतभे चन्दन सरिस पैरैं दिखराय २५
कही हकीकति अरिनन्दनतब तुमको कैद कीन हम आय ॥
देखें हम सों बुद्धिमान कोउ मोहवे और पैरै दिखराय २६
इतना कहिकै अरिनन्दन ने तुरतै कूच दीन करवाय ॥
चढ़िकै हाथी आल्हाठाकुर सुन्दरबनै पहुंचे जाय २७
गा हरिकारा नैनागढ़ का राजै खबरि सुनाई जाय ॥
ऊदन ढूँढ़ैं ह्याँ आल्हा को दादा नहीं पैरै दिखराय २८
आज्ञा लैके मलखाने की सोनवाँ पास पहुंचे जाय ॥
भेद बनायो सब सोनवाँ ने फौजन फेरि पहुंचे आय २९
घोड़ा लैके बयपारी बनि सुन्दरबनै पहुंचे जाय ॥
द्वार पहुंचे अरिनन्दन के ऊदन बेंदुल दीन नचाय ३०

आल्हाका विवाह । १४५ २६'
देखि तमाशा द्वारपाल तहँ ऊदन निकट पहुंचे आय ॥
साथ तुम्हारे द्वै घोड़ा हैं औ असवार एक तुम भाय ३१
रूप तुम्हारो बयपारी को आयो कौन देश ते भाय ॥
घोड़ा लायेते काबुलते बेचे सबै कन्नौजै जाय ३२'
एक इकेलो यह बाकी है राजै खबरि सुनावै जाय ॥
इतना सुनिकै द्वारपाल फिरि राजै दीन्ह्यो खबरि बताय ३३
खबरि पायकै अरिनन्दन फिरि द्वारे पौरि पहुंचे आय ॥
घोड़ पपीहा मोहबेवाला राजा देखिगये हरषाय ३४
राजा बोले बघऊदन ते याकी कीमति देवबताय ॥
ऊदन बोले अरिनन्दनते साँचे बचन देयँ बतलाय ३५
पहिले चढ़िकै यहि घोड़ेपर कोऊ ज्वान नचावै आय ॥
हाल देखिल्यो यहि घोड़ेका तब मैं कीमति देउँ बताय ३६'
सुनिकै बातें सौदागरकी राजै हुकुम दीन फर्माय ॥
बैठै क्षत्री जो कोउ जावै घोड़ा टापन देय हटाय ३७
होय मोहबिया कोउ मोहबेका घोड़ा देखि सीध है जाय ॥
टेढ़े घोड़ेके चढ़वैया मोहबे बसैं बनाफरराय ३८
सुनिकै बातें सौदागरकी तुरतै आल्है लीन बुलाय ॥
हुकुम लगायो अरिनन्दनने घोड़ा बैठि नचावोभाय ३६'
हुकुम पायकै अरिनन्दनको घोड़ा चढ़े बनाफरराय ॥
घोड़ नचायो भल आल्हाने ऊदन बोल्यो बचन सुनाय ४०'
जल्दी चलिये अब लश्करको दादा काह रह्यो पछिताय ॥
नाम हमारो उदयसिंहहै ओ अरिनन्दन बात बनाय ४१
इतना कहिकै बघऊदनने आपन घोड़ दीन दौड़ाय ॥
आल्हौ चलिभे फिरिजल्दीसों लश्कर दोऊ पहुंचेभाय ४२'
१०

२. द्वितीय भाग: आल्हा-ऊदल बाल्यकाल, इन्द्रजीत-मलखान पराक्रम व बावन युद्ध आरम्भ

३० आल्हखण्ड । १४६
मलखे बोले फिरि आल्हाते लश्कर कूच देव करवाय ॥
यह मन भाई तब आल्हा के डङ्का तुरत दीन बजवाय ४३
हाथी सजिगा पचशब्दा तब आल्हा तुरत भयो असवार ॥
हरनागर घोड़े के ऊपर भैने चढ़ा चँदेले क्यार ४४
घोड़ मनोहर देवा बैठा सिरगा बनरसका सरदार ॥
सोहैं कबूतरी पर मलखे भल ऊदन बेंदुलपर असवार ४५
मन्नागूजर रूपन बारी दोऊ बेगि भये तय्यार ॥
झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ४६
कूचके डङ्का बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥
घोड़ी कबूतरी के ऊपरमाँ आगे फिरैं बीर मलखान ४७
खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं पवनकी चाल ॥
मारु मारु कै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ४८
इतते लश्कर गा आल्हाका जोगा उतै पहूँचा आय ॥
बम्बके गोला छूटन लागे हाहाकारी शब्द सुनाय ४६
जौनै हाथी के गोला लागै मानों गिरा महल अरराय ॥
जौनै क्षत्री के गोला लागै साथै उड़ा चीलहअमजाय ५०
जौनै बछेड़ा के गोला लागै धुनकन रुईसरिस उड़िजाय ॥
गोला लागै ज्यहि सँड़िया के सो मुहभरा गिरै अललाय ५१
जौनै बैलके गोला लागै तरवर पात ऐस गिरि जाय ॥
दुनो गोल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द है जाय ५२
मारु बँदूकै औ मालाकी बलकी कड़ाबीन की मार ॥
चलैं कटारी बूंदीवाली ऊना चलै विलाइत क्यार ५३
कटि कटि क्षत्री गिरैं खेतमें उठि उठि रुण्ड करैं तलवार ॥
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ५४

आल्हाका बिवाह । १४७ ३१
सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे ऊपर करैं महावत मार ॥
पैदर पैदर कै बरनी मै औ असवार साथ असवार ५५
जौने हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥
हनिकै मारैं असवारे को औ हौदा ते देयँ गिराय ५६
अकसर ऊदन के मारुन में काहू धरा धीर ना जाय ॥
पूरन राजा औ जगनाका परिगासमर बरोबरि आय ५७
मलखे जोगा का संगरहै भोगा बेंबुल का असवार ॥
बिजिया ठाकुर देवा ठाकुर दूनों खूब करैं तलवार ५८
अपने अपने सब मुर्चन में क्षत्री नेक न मानैं हार ॥
मलखे जोगा के मुर्चा में होवै कड़ाबीन की मार ५६
ऊदन भोगा के मुर्चा में कोताखानी चलै कटार ॥
बिजिया देवा के मुर्चा में दोऊ हाथ चलै तलवार ६०
को गति बरणै जगनायक की पूरन पटना को सरदार ॥
मारु बरोबरि दोऊ करिकै गरुई हाँक देयँ ललकार ६१
बड़ी लड़ाई भै नैनागढ़ नदिया बही रक्त की धार ॥
बहीं लहासैं तहँ क्षत्रिनकी पक्षी मानों ख्यलें नेवार ६२
जाँघ औ बाहू रजपूतन की तामें गोह सरिस उतरायँ ॥
छुरी कटारी मछली मानों ढालैं कछुवा सम दिखरायँ ६३
घोड़ा हींसैं हाथी चिघरैं ठाढ़े ऊंट तहाँ अललायँ ॥
बड़ बड़ राजा उमरायन को रणमास्यारकागमिलिखायँ ६४
जोगा ठाकुर के मुर्चापर गरुई हांक दीन मलखान ॥
सँभरिकै बैठो अब घोड़ापर की अब लौटि जाव घरज्वान ६५
सुनिकै बातें मलखाने की तुरतै खैंचि लीन तलवार ॥
ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ६६

३२ आल्हाखण्ड । १४८
ढाल फाटिगै गैंड़ावाली रणमाँ टूटि गिरी तलवार ॥
उतरि कबूतरी ते मलखाने तुरतै बाँधि लीन सरदार ६७
बंधन हैगा जब जोगाका भोगा लीन्ह्यो सांग उठाय ॥
ताकि कै मारा बघऊदन का ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय ६८
ऊदन बोले फिरि भोगाते ओ बिसिआने बात बनाय ॥
वार दूसरी अब तुम मारै ठाकुर तोरि आहिराहिजाय ६९
बातें सुनिकै बघऊदन की भोगा भालालीन उठाय ॥
दूनों अँगुरिन भाला तौलै कालीनाग ऐस मन्नाय ७०
तारा टूटै आसमानते तौ हिरगास भुईं ना जाय ॥
छूटिग भाला जो अँगुरिनते कम्मर मचा ठनाका आय ७१
बचा दुलरुआ द्यावलिवाला आला देशराज को लाल ॥
ढालकि औझड़ ऊदनमारा भोगा गिरा तहाँ ततकाल ७२
भोगा बँधिगा रणखेतन में विजिया बड़ा लड़ैया ज्वान ॥
अपने मोर्चा में सो हार्यो बांध्यो मैनपुरी चवहान ७३
पूरनराजा जगनायक का मोर्चापरा बरोबरि आय ॥
गुर्ज चलायो पूरन राजा जगना लीन्ह्यो वार बचाय ७४
ऐंड़ा मसक्यो हरनागरके हाथी उपर पहुंचा जाय ॥
खैंचिकै मारा तलवारी को हाथी सूँढ़गिरी अरराय ७५
गिरामहावत तब मस्तकते हाथी बैठिगयो त्यहि ठायँ ॥
बंधन कीन्ह्यो फिरि पूरन को जीतिक डंका दिह्यो बजाय ७६
भगे सिपाही नैनागढ़ के काहू धराधीर ना जाय ॥
बंधन हैगे चारिउ योधा एकते एक बली अधिकाय ७७
जहँना तम्बू रहे आल्हाका तहँना गये सकल सरदार ॥
माहिल बन्धन सबको दीख्यो घोड़ी तुरत भये असवार ७८

[Header] आल्हाका विवाह । १४६ ३३

जहाँ कचहरी नयपाली की माहिल पहुंचिगये त्यहिबार ॥
दीख्यो माहिलको नयपाली राजै बड़ाकीन सतकार ७९
माहिल बोले तब राजाते तुम सुनिलेउ बिसेनेराय ॥
तीनों लड़िका तुम्हरे बँधिगे चौथो पूरन लये बँधाय ८०
सुनवाँ ब्याहीगय आल्हा को तौ रजपूती जाय नशाय ॥
पानी पीहै कोउ क्षत्री ना तुमको सत्य दीन बतलाय ८१
राजा बोले तब माहिलते ठाकुर उरई के सरदार ॥
काह कलङ्की देशराज भे सो तुम कथा कहौ यहिबार ८२
माहिल बोले नयपाली ते सुनिल्यो बचन मोर महराज ॥
चले शिकारै देशराज बन दूसर बच्छराज शिरताज ८३
देवलि बिरमा दूनों बहिनी बेंचिनदही जायँ त्यहिराह ॥
मार्ग सँकोचो त्यहि बनजानो अरनालड़ैं तहाँ नरनाह ८४
पकरिकै सींगैं इक भैंसाकी देवलि दीन्ह्यो दूरि हटाय ॥
दूसर बिरमाने पकरा तहँ पाछे सोऊ पछिलाति जाय ८५
दूनों अरना मारग हटिगे दूनों जोड़ भये इकठोर ॥
देशराज कह बच्छराज सों दूनों बड़ी बली इकजोर ८६
इनको लैकै घरको चलिये होवैं पूत सुपूते भाय ॥
तिनहिन अहिरिन के पेटेते चारो भये बनाफरराय ८७
बाप छत्तरी माता अहिरिनि बेटा कैसे होयँ कुलीन ॥
ब्याह न कीन्ह्यो तुमसुनवाँ का जानोंजातिपांति अकुलीन ८८
पूजन कीन्ह्यो तब माहिल का राजै फेरि कीन सतकार ॥
बड़े पियारे तुम माहिल हौ ठाकुर उरई के सरदार ८९
बहिनि बियाही चंदेले घर जिनको कही रजा परिमाल ॥
किह्योमुलहिजानहिंतिनकोतुम हमसों सत्य कह्यो सबहाल ९०

३४ आल्हाखण्ड। १५०
युक्ति बनावो अब तुमहीं म्वहिं जासों धर्म रहै यहिकाल ॥
सुनवाँ ब्याही फिरि जावैना औ मरिजाएँ दुष्ट ततकाल ६१
सुनिकै बातें नयपाली की माहिल बोले वचन उदार ॥
बाना तजिकै रजपूती का अब धरि देव ढाल तलवार ६२
नाई वारी सँगमें लैके पाँयन परोजाय ततकाल ॥
जो कछु बोलैं सो कछु मान्यो मड़ये तरे लैआवौ हाल ६३
घरमें लैके चारो भाई मारो नृपति आय ततकाल ॥
इतना कहिकै माहिल चलिभे आदरकीन बहुत नरपाल ६४
भुजा उखारी गईं अभई की माहिल हृदय परी सो शाल ॥
लड़ै सिड़ैकी सखरि नाहीं निन्दाकरत फिरैं सबकाल ९५
जैसे राजै भानुप्रतापी मार्यो रहै तपस्वी ज्वान ॥
यह है गाथा बालकाण्ड में तुलसी राम समर मैदान ६६
तैसे ऊदनके मरिबेमें माहिल चुगुल बने सबद्वार ॥
धर्मसे निन्दा नहिं माहिलकी यामें दिहे शास्त्र अधिकार ६७
औरो गाथा कहु पुराणकी यामें आनि घटावों ज्वान ॥
पै नहिं समया यहि समया में ऐसी परी व्यवस्था आन ६८
माहिल पहुंचे फिरि तम्बूनमें राजै नेगी लीन बुलाय ॥
जहँना तम्बू रहै आल्हा का राजा तहाँ पहुँचे जाय ६६
बड़े प्यार सों राजै लीन्ह्यो आल्हा बैठिगये हर्षाय ॥
मलखे बोले तब राजाते आपन हालदेउ बतलाय १००
कौने मतलब को आयो है सो हम करैं चारिहू भाय ॥
सुनिकै बातें मलखाने की राजा बोले वचन बनाय १०१
हँसी खुशी सों सुनवाँ व्याहैं हमारे मनै गई यह आय ॥
सिंहन घर में कन्या ब्याही स्यारन हँसीकिये का भाय १०२

आल्हाका बिवाह । १५१ ३५
धन्य बखानों दुउ रानिनको जिनके पूत सुपूते चार ॥
धन्य बखानों मलखाने को माड़ो भलीकीन तलवार १०३
भुजा उखारयो ज्यहि अभईके आल्हाकेर लहुरवा भाय ॥
तीनों चलिये अब मड़ये को भौंरी तुरत देयँ करवाय १०४
इतना सुनिकै मलखे बोले फौजन डंका देउ बजाय ॥
कह नयपाली सुन मलखाने इकलो दूलह देउ पठाय १०५
कह मलखाने सुन नैपाली तुमसों सत्य देयँ बतलाय ॥
किरिया करलो श्रीगंगाकी ब्याहन तबै तुम्हारे जायँ १०६
यह मनभाई नयपाली के किरिया तुरत कीन सरदार ॥
तीनों लड़का मलखे छोड़े आपौ फाँदिभये असवार १०७
देवा ऊदन मन्नागूजर सय्यद बनरस का सरदार ॥
सजि जगनायक मोहबेवाला रूपन बारी भयो तयार १०८
आल्हा बैठे फिरि पलकी में मनमें श्रीगणेशंपद ध्याय ॥
सबियाँ चलिभे नैनागढ़ को महलन तुरत पहूँचे जाय १०६
खम्भा गड़िगा तहँ चन्दन का मालिन माड़ो कीन तयार ॥
सखियाँ आईं नयपाली घर गावन लगीं मंगलाचार ११०
चढ़ो चढ़उवा जब सुनवाँ का फाटक बन्द लीन करवाय ॥
क्षत्री आये जे लड़ने को ते कोठेपर रखे छिपाय १११
भो गठिबन्धन जब आल्हा को थाल्हा गड़ा शूरमन क्यार ॥
प्रथमै पूज्यो श्रीगणेश को गौरीनन्दन शम्भु कुमार ११२
भाँवरि पहिली के परतैखन पण्डित कीन बेद उच्चार ॥
जोगा मारयो तलवारी को ऊदन लीन ढालपर वार ११३
भाँवरि दूसरिके परतैखन भोगा हनी तुरत तलवार ॥
मलखे ठाढ़े रहैं दहिने पर सो लै लई ढालपर वार ११४

३६ आल्हाखण्ड । १५२
भाँवरि तीसरि के परतैखन बिजिया मारी गुर्ज उठाय ॥
वार बचाई त्यहि देवाने राजा रंगमहल को जाय ११५
भाँवरि चौथी के परतैखन राजा जादू दीन चलाय ॥
जवाँ बन्द भै सब कुँवरन कै सबकी नजरबन्द है जाय ११६
सुनवाँ सोची अपने मनमाँ बैरी हैगा बाप हमार ॥
बीर महम्मद की पुरिया को सुनवाँछोड़िदीनत्यहिबार ११७
भई लड़ाई तहँ जादुनकी सातों भाँवरि लई कराय ॥
आल्हा वाली फिरि पलकी में तुरतै सुनवाँ लीन विठाय ११८
सवैया ॥
भूप दुवार चली तलवार अपार बही तहँ शोणित धारा।
वीर बली मलखान सुजान तहाँ बहु क्षत्रिनको हनिडारा ॥
पूतजुझार महाहुशियार लड़ै तहँ भीषम केर कुमारा ।
कौनकहै बघऊदनको रिपुसूदनसों ललिते त्यहि बारा ११९
सुन्दरखन को अरिनन्दन जो सोऊ आयगयो त्यहि द्वार ॥
आठकोसलों चलै सिरोही नदिया बही रक्त की धार १२०
आगे डोलाहै सुनवाँ को पीछे होय भड़ाभड़ मार ॥
ऊदनमलखे की मारुन में जूझे बड़े बड़े सरदार १२१
आल्हा बँधुवाभे नैनागढ़ जोगा झगा बँधे मलखान ॥
कूच करायो बघऊदन ने लश्कर मागराज नियरान१२२
ऊदन बोले तब सुनवाँ ते भौजी मानों कही हमार ॥
दादा बांधेगे नैनागढ़ कैसी युक्तिकरी यहिवार १२३
सुनिकै बातें बघऊदन की सुनवाँ युक्ति कही समुझाय ॥
सम्मत करिकै दूनों चलिभे नैनागढ़ै पहूंचे आय १२४
पुहपा मालिनि के घर बैठे सुनवाँ सहित लहुरवा भाय ॥

आल्हाका विवाह । १५३ ३७
सुनवाँ पूछ्यो जों मालिनि ते मालिनिखबरिदीनबतलाय १२५
रूप गुजरियाको सुनवाँ करि पहुंची नाह निकट सो जाय ॥
रूप देखिकै त्यहि गूजरिको मोहित भयो बनाफरराय १२६
जस बतलान्यो ये गूजरिसों गूजरि तैस दीन समुझाय ॥
मुंदरी दीन्ह्यो फिरि गूजरिको मालिनिघेरै पहुंची आय १२७
सब समुझायो फिरि ऊदन को सांचे हाल दीन बतलाय ॥
घोड़ करिलिया औ रसबेंदुल लैकै गयो लहुरवाभाय १२८
खबरि पायकै बयपारी कै द्वारे नृपति पहुंचा आय ॥
बनो कबुलिहा बघऊदन है सांचो आगा परै दिखाय १२६
राजा पूछ्यो बयपारी सों सांची कीमत देव बताय ॥
ऊदन बोल्यो नयपाली सों चढ़िकैदेखिलेयकोउआय १३०
चाल देखिल्यो इन घोड़नकी पाछे कीमत देयँ बताय ॥
सुनिकै बातें ब्योपारी की राजै हुकुमदीन फर्माय १३१
जावैं क्षत्री जो घोड़न ढिग ताको टापन देयँ हटाय ॥
मुखसों काटैं ऊपर उलैरैं कोउरजपूतपास ना जाय १३२
देखि तमाशा यहु महाराजा तुरतै आल्हा लीन बुलाय ॥
घोड़ा फेरो तुम फाटक में इनकीचाल देव दिखराय १३३
किह्यो इशारा बघऊदन ने घोड़ा चढ़े बनाफरराय ॥
बैठ बेंदुलापर बघऊदन आपननामदीन बतलाय १३४
बाग उठायो दउ घोड़न की फाटक पार पहुंचे आय ॥
मालिनि घरते सुनवाँ चलिभै तुरतै पलकी लीन मँगाय १३५
तीनों पहुंचे फिरि लश्कर में डंका बजन लाग घहराय ॥
चलि भैं फौजैं मलखाने की पहुंचीं प्रागराज में आय १३६
जितने क्षत्री रहैं लश्कर में सबियाँ करनगये असनान ॥

३८ आल्हखण्ड । १५४
हनवन करिके तिरवेनीको दीन्ह्यो द्विजन दान सब ज्वान १३७
बृक्ष अक्षयबटको पूजन करि पहुंचे भरद्वाज अस्थान ॥
बेनीमाधो के दर्शन करि दीन्ह्यो द्विजन सुवरण दान १३८
हाथी घोड़ा रथ कपड़ा औ गहना दीन द्विजन बुलवाय ॥
भये अयाचक सब याचकगण जय जयरहे बनाफर राय १३६
बैठिकै गंगा के तट ऊपर क्षत्रिन हवन कीन हरषाय ॥
स्वाहा स्वाहा बहु द्विज बोलैं कहुँ २ स्वधा स्वधा गाळाय १४०
स्वधा औ स्वाहा ते छुट्टी करि विप्रन भोजन दीन कराय ॥
भोजन करिकै सब द्विज तहँते अपने घरनगये सुखपाय १४१
कूच करायो फिरि मलखाने डंका बजत फौज में जाय ॥
देवलि बिरमा द्वारे ठाढ़ीं देखें वाट बनाफरराय १४२
राह निहारैं नित पुत्रन की कबधौं ऐहैं पुत्र हमार ॥
जौन मुसाफिर आवत देखें ताको करें बड़ा सत्कार १४३
हाल न पावैं जब पुत्रन को तब फिरि जावैं घरे निराश ॥
रानी मल्हना महलन ऊपर नितप्रतिकरैमिलनकी आश १४४
तबलों रुपना आगे आयो पाछे फौज पहुंची आय ॥
बड़ी खुशहाली भै मोहबे माँ दौरे सबै नारिनर धाय १४५
मल्हना देवलि बिरमा तीनों पलकी पास पहुँचीं जाय ॥
मियादेवन को पलकी गै पूजनकीन बहुरिया आय १४६
आल्हा मलखे देबा ऊदन अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥
मियादेवन की परिकरमा क्षत्रिन सबन कीन हर्षाय १४७
तहँते आये फिरि द्वारे को तुरतै पण्डितन लीन बुलाय ॥
आरति लैके फिरि सोने की तामें चौमुख दिया बराय १४८
चर परछौनी मल्हना कीन्ह्यो भीतर गये बनाफर राय ॥

आल्हाका बिवाह । १५५ . ३६
उतरिकै पलकी ते सुनवाँफिरि महलन तुरत पहुंचीजाय १४९
मुहँ दिखलाई रानी मल्हना गलको दीन नौलखाहार ॥
पायँ लागेकै सुनवाँ तहँपर करको कंकण दीन उतार १५०
बाजन बाजे चौगिर्दा ते घर घर भये मंगलाचार ॥
फिरि परिमालिक की ड्योढ़ीमाँ पहुंचे सबै शूर सरदार १५१
राजा पूँछें मलखाने ते ओ बिरमा के राजकुमार ॥
अमरढोल रहे नयपाली के कैसे किह्यो तहाँपर मार १५२
इतना सुनिकै मलखे बोले तुम सुनिलेउ रजापरिमाल ॥
दया तुम्हारी जापर होवै ताकीबिजयहोयसबकाल १५३
हृदय लगायो सब कुँवरन को सबको कीन बड़ा सतकार ॥
जीतिके डंका बाजन लागे नौबति झौरै रजा के द्वार १५४
सौ सौ तोपें दर्गी सलामी चकरन पाई खूब इनाम ॥
पिता हमारे किरपाशंकर कीन्हेनिसबैद्विजनकेकाम १५५
माथ नवाबों पितु अपने को जिनबल पूरिकीन यह गाथ ॥
मोर सहायी जग एकै हैं स्वामी अवधनाथ रघुनाथ १५६
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥
सुखसों जीवो तुम दुनियामें दिनदिनहोउधनीअधिकाय १५७
रहे समुन्दर में जबलों जल जबलौं रहें चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर १५८
इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां
निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसाद कृत
आल्हापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥
नैनागढ़आल्हाबिवाहसम्पूर्ण
इति ॥

४० आल्हखण्ड । १५६

राखौ गति अद्भुत दर्शानी २ ॥
निशि दिन पापकर्मरत प्राणी सत्यासत्य भुलानी ॥
हत्यालाख धरत शिर ऊपर मोह बेदना ठानी ॥ १ ॥
नाती पूत शोच बश परकर आतमज्ञान हिरानी ॥
अहं अहं डहकत दरवाजे देखत नारि बिरानी ॥ २ ॥
अभिमानी नित देखत आंखिन मरतजात बहुप्रानी ॥
तवहूं तनक चेत मननाहीं रटै रामगुणखानी ॥ ३ ॥
हटै अकाल सुकाल बढ़ै जग नाशाय रोग निशानी ॥
सो नहिं होनहार हम देखत होयँ बहुतनरज्ञानी ॥४॥
अभिमानी लाखन हम देखत ज्ञानी दशहु न जानी ॥
होत प्रपंच साधु सन्तनमें पंचन नाहिं ठिकानी ॥ ५ ॥
तजि दुर्गा अर्चन नर पामर गति मुर्गाकी आनी ॥
लैहँड़िपुत्र पौत्र उपजावत अनशिक्षित अभिमानी॥६॥
तेइ मर्य्याद धर्मकी नाशत भाषत झूठ गुमानी ॥
मात पिताको मूरख कहिकै देवत कष्ट महानी ॥ ७ ॥
यह कलियुगकी देखि बड़ाई कहत ललित यहबानी ॥
राघौ राम और रघुनन्दन इन बन्दन दुखहानी ॥ ८ ॥
चलो मन जहाँ बसैं रघुराज । चलो मन जहाँ बसैं रघुराज ॥
यहि दुनिया में कौन हमारो हम क्याहिके क्याहिकाज ॥
देखत जो कछु रहत न सो कछु ढहत काल शिरताज ॥ १ ॥
गहत कौनके रहत कौन नर सोइ कहत हम आज ॥
रघुनन्दन जगवन्दन ज्यहि सुत त्यहि शिरपर दुखभ्राज ॥ २ ॥
सेयो यशोदा नन्द कृष्णको सोऊ न आये काज ॥
वैरिनि त्रिपाति सबहिं शिरऊपर देखिलेहु महराज ॥ ३ ॥
जो मन फैसे जगत के अन्दर बन्दरसम बिनलाज ॥
द्वारद्वार नट तिन्है नचावत ललित पेट के काज ॥ ४ ॥

अथ आल्हखण्ड ॥
मलखानका बिवाह अथवा पथरी-
गढ़की लड़ाई ॥
सवैया ॥
ध्यावत तोहिं सदा हनुमान यही बरदान मिलै मोहिं स्वामी ।
हाथ लिये धनुबान कृपान मिलैं भगवान जे अन्तरयामी ॥
टारे टरैं न कबों उरते तिन राम नमामि नमामि नमामि ।
जान यही ललिते बरदान सुनो हनुमान सदा सुखधामी १
सुमिरन ॥
तुलसी हुलसी अब दुनिया में झुलसी सकल नरनकीकावि ॥
घर घर पोथी रामायण की दर दर फिरैं बगल में दाबि १
गिरिगिरि चन्दन नहिं होवैंकहुँ बन बन नहीं रहैं गजराज ॥
नारि पतिव्रत नाहिं घर घर हैं थल थल नहीं होयँ कविराज २
ग्राहक होवैं नहिं दुनिया में तब गुण जावैं सबै हिराय ॥

२ आल्हाखण्ड । १५८
भोजन खावै हरिको ध्यावै साँचो ग्राहक दीन बताय ३
नाहक जग में कोउ पछतावै भावै नहीं दूसरो काज ॥
देही आपनि गलि गलि जावै आवै फेरि जगत में लाज ४
छूटि सुमिरनी गै ह्वाँते अब शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
ब्याह बखानों मलखाने का लड़िहैं बड़े बड़े सरदार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
यहु गजराजा पथरीगढ़ को ज्याहिको भरी लाग दरबार ॥
बैठक बैठे सब छत्री हैं एकते एक शूर सरदार १
सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरन में महलन नाचिरहे कहुँ मोर ॥
बैठि कबूतर कहुँ घुटकत हैं तीतर बोलिरहे कहुँ जोर २
घोड़ अगिनिया त्यहि राजाके साजा सबै विधाता काज ॥
है गजमोतिनि त्यहिकी बेटी विद्या रूप शील शिरताज ३
सो नित खेलै सँग सखियन में मेलै सदा गले में हाथ ॥
सेमा भगतिनि की चेली है गुटवा ख्यलै सखिन के साथ ४
खेलत खेलत कछु सखियों ने कीन्ही तहाँ ब्याह की बात ॥
कोउकोउ सखियाँ तहँ ब्याहीथीं जानैं भलो श्वशुरपुर नात ५
ब्याही बोलैं अनब्याहिन सों सखियो सुनो हमारी बात ॥
सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुख मिलै श्वशुरपुरंरात ६
सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी तहँ अनब्यहीमनै अकुलायँ ॥
फिरिफिरिपूँछैं तिन सखियनसों कासुखश्वशुरपुरैअधिकाय ७
बतियाँ घतियाँ जे बालम की छतियाँ छुवैं और अठिलायँ ॥
रतियाँ केरी सब बतियाँ को सखियाँ कहैं और हरपायँ ८
सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुखश्वशुरपुरै अधिकाय ॥
सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी मनमाँ गई बात ये छाय ६

मलखानका बिवाह । १५६ ३
सब अनब्याही ब्याकुल ह्वैकै घरका चलीं मनै पछिताय ॥
गै गजमोतिनि निज महलनमें सोई समय रातिको पाय १०
जागे रोवन् शय्या लागी माता लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥
काहे रोवत तुम बेटीहौ हमको हालदेउ बतलाय ११
दीख्यो सपना मैं माता है ब्याहे लिये कोऊ घरजाय ॥
मैं सुधि कीन्ह्यों तहँ बप्पाकी माता रोय उठिउँ अकुलाय १२
सुनिकै बातें ये बेटी की चंपा गोद लीन बैठाय ॥
चूम्यो चाट्यो गले लगायो बातनदियो ताहि बहलाय १३
अवसर पायो जब रानी ने राजा पास पहुंची जाय ॥
बेटी लायक है ब्याहन के टीका देउ आप पठवाय १४
समया आयो अब कलियुगका औ युगधर्म रहा दर्शाय ॥
बातें सुनिकै ये रानी की राजा नेगी लीन बुलाय १५
सूरज बेटा को बुलवायो तासों हाल कह्यो समुझाय ॥
दिल्ली कनउज चहु तहँ जायो जायो जहँ न चँदेलौराय १६
तीन लाख को टीका लैके सूरज कूच दीन करवाय ॥
आठ रोज की मैजलि करिकै पहुँच्च्यो जहाँ पिथौराँराय १७
को गति बरणै तहँ दिल्ली कै जहँपर रहै कौरवनराज ॥
जहँपर गर्जत दुर्योधनरहै जहँपर अये कृष्णमहराज १८
भीषम ऐसे जहँ योधा थे द्रोणाचार्य ऐस द्विजराज ॥
तहँपर गरजे शिरीकृष्णजी जयजयनमोनमो ब्रजराज १९
जब सुधि आवत है दिल्ली कै तब मन आय जात ब्रजराज ॥
सदा पियारे हैं विप्रन के अबहूं देत खानको नाज २०
तहँपर पहुँचे सूरज ठाकुर चिट्ठी तुरत दीन पकराय ॥
आँक आँक सब पृथ्वी बांचा जो कुछ लिखा बिसेनेराय २१

४ आल्हखण्ड । १६०
ब्याह बिसेने के करिवे ना टीका तुरत दीन लौटाय ॥
सूरज चलिभे तहँ दिल्ली ते • कनउज फेरि पहुंचे आय २२
हैं कनौजिया जहाँ बाम्हन बहु बड़ बड़ महल परैं दिखराय ॥
वेद पुराणन की चर्चा तहँ घरघरअधिक२ अधिकाय २३
सूरज पहुँचे जब ड्योढ़ी में बोला द्वारपाल शिरनाय ॥
कौने राजाके लड़िकाहौ राजै खबरि देयँ पहुँचाय २४
बातें सुनिकै द्वारपाल की सूरज हाल दीन समुझाय ॥
द्वारपाल सुनि गा राजा ढिग तुरतै खबरि सुनाई जाय २५
सुनिकै बातें दरवानी की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥
द्वारपाल सूरज ढिग आयो लैके सभा पहुँचा जाय २६
चिट्ठी दीन्ह्यो तहँ सूरज ने जयचँद पढ़ा बहुत मनलाय ॥
क्यहिका लड़का घरभारू है पथरीगढ़ै बियाहन जाय २७
घोड़ अगिनिया जिनकेघरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥
तुरतै टीकाको लौटारयो यहु महराज कनौजीराय २८
चलिभे सूरज तहँ कनउजे ते ठरई फेरि पहुंचे आय ॥
पांचकोस मोहबे के आगे मारै हिरन उदयसिंहराय २६
सूरज ऊदन यकमिल हैगे दूनों कीन्ह्यो रामजुहार ॥
ऊदन पूछैं तहँ सूरज ते ठाकुर पथरी के सरदार ३०
टीको ऐसो का लै गमन्यो नेगी संग तुम्हारे चार ॥
सूरज बोलो तब ऊदन ते ठाकुर बेंदुलके असवार ३१
निकरे हनवन हम गङ्गा के साँचे हाल दीन बतलाय ॥
काह शिकारै तुम आयो है अकसर बनै उदयसिंहराय ३२
सुनिकै बातें ये सूरज की बोला तुरत बनाफरराय ॥
कियो बहाना तुम सूरज है नेगी संग लियेहौ भाय ३३

मलखानका विवाह । १६१ ५
हनवन केरी यह सामा ना झूंठी बात रह्यो बतलाय ॥
सूरज बोले फिरि ऊदन ते सांची सुनो बनाफरराय ३४
टीका लाये हम बहिनी का दिल्ली कनउज आये मँझाय ॥
टीका लीन्ह्यो क्यहु क्षत्री ना जावैं लौटि बनाफरराय ३५
इतना सुनिकै ऊदन बोले हमपर शारद भई सहाय ॥
दादा कोर मलखाने हैं टीका लिहे चलो तुम भाय ३६
सुफल तुम्हारी मेहनत होई हमरो काज सिद्ध है जाय ॥
सुनिकै बातें ये ऊदन की सूरज बोला बचन रिसाय ३७
नहीं आज्ञा महराजा की टीका नग्र मोहोबे जाय ॥
जाति बनाफर की हीनी है कीरति रही जगत में छाय ३८
सुनिकै बातें ये सूरज की बोला उदयसिंह सरदार ॥
नीके जैहौ तौ लैजैहौं नहिं यह देखिलेउ तलवार ३६
सुनिकै बातें ये ऊदन की नाई बारी उठे डेराय ॥
ते समुझावैं भल सूरजको मानो कही बिसेनेराय ४०
रारि न करियो तुम ऊदनते नामी देशराज को लाल ॥
पाँच कोस मोहबा है बाकी जहँ पर बसैं रजापरिमाल ४१
सुनि सुनि बातें सबनेगिनकी सूरज मनै गयो तसआय ॥
नेगिन लैके सूरज ऊदन पहुँचे जहाँ चँदेलोराय ४२
सजी कचहरी परिमालिक की भारी लाग राज दरबार ॥
ब्रह्मा आल्हा मलखे देबा सय्यद बनरसका सरदार ४३
देखिकै सूरजको परिमालिक बोले मधुर वचन मुसुकाय ॥
कहाँते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ४४
सुनिकै बातें परिमालिककी सूरज यथातथ्य गे गाय ॥
हाल जानिकै सब चंदेलो बोला सुनो बनाफरराय ४५
११

६ • आल्हाखण्ड । १६२
टीका आयो पथरीगढ़का ताको तुरत देउ लौटाय ॥
ब्याह बिसेने घर करिबे ना मानों कही उदयसिंहराय ४६
घोड़ अगिनियाँ तिनके घरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥
सुनिकै बातें परिमालिक की बोले तुरत बनाफरराय ४७
दतिया मारि उरैछोमारो पहुँचे सेतुबंध लों जाय ॥
पेशावर मुल्तान कमायूं बूंदी थहर थहर थहराय ४८
अटक पारलों झंडा गड़िगो औ मेवात लीन लुटवाय ॥
गर्व न राखा क्यहु क्षत्री का मानो कही चंदेलोराय ४६
गिनती किनमें बिसियानन की ठाढ़े तखत देउँ उलटाय ॥
हीनी मुखसों तुम भाषतहौ मेरो रजपूती धर्म नशाय ५०
मलखे ब्याहनको रैहैं ना यहु दिन कहिबेको रहिजाय ॥
टीका लौटी ना मोहबे ते राजा सत्य दीन बतलाय ५१
बोला चंदेला तब देबा ते अब तुम शकुन विचारो भाय ॥
कैसी गुजरी पथरीगढ़ में सो सब हाल देउ बतलाय ५२
सुनिकै बातें परिमालिककी देबा पोथी लीन उठाय ॥
शकुन सोचिकै देबा बोला साँची कहौं चंदेलोराय ५३
जीति तुम्हारी है पथरीगढ़ काहू बार न बाँको जाय ॥
आजु कि साइति भल नीकीहै टीका अबै देउ चढ़वाय ५४
सुनिकै बातें ये देबाकी महलन खबरिदीन पहुँचाय ॥
गा हरिकारा दशहरिपुरखा द्यावलि बिरमा लवालवाय ५५
आँगन लीपागा गोबर सों मोतिन चौक दीन पुरवाय ॥
चूड़ामणि पण्डित फिरिआये तुरतै सूरज लये बुलाये ५६
चारो नेगी सँग में लैके सूरज महल पहुँचे आय ॥
चरण लागिकै मलखाने के बीरा मुखमें दीन खवाय ५७

मलखानका बिवाह । १६३ ७

सखियाँ गावन मंगल लागीं नेगिन झगर मचावा आय ॥
सोने चाँदी के गहना को सूरज सबै दीन पहिराय ५८
ऊदन पहुँचे निज कमरामें डिब्बा लाये तुरत उठाय ॥
खूब पहिरावा सब नेगिन को चारों खुशीभये अधिकाय ५६
बचा बचावा जो गहना रहे नेगिन स्वऊ दीन पकराय ॥
औरो नेगी जो पथरीगढ़ तिनको यहौ दिह्यो पहिराय ६०
ऊदन बोले फिरि नेगिनसे तुम गजराज दिह्यो समुझाय ॥
माघ शुक्ल तेरसि की साइति होई ब्याह तहांपर आय ६१
हाथ जोरिकै सूरज बोले आज्ञा देउ चंदेलोराय ॥
हम चलिजावें पथरीगढ़ को राजै खबरि सुनावैं जाय ६२
बातें सुनिकै ये सूरज की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥
राम जुहार तुरत फिरिकरिकै सूरज कूच दीन करवाय ६३
सौ सौ तोपैं दगीं सलामी पठवन चले लहुरवाभाय ॥
बिदा माँगिकै फिरि ऊदनसों अपने नेगी संगलिवाय ६४
सूरज चलिभे पथरीगढ़को माहिल कथा कहौं अब गाय ॥
कहुँ सुधिपाई माहिल ठाकुर टीका चढ़ा मोहोबे जाय ६५
लिल्हीघोड़ी को मँगवायो तापर तुरत भयो असवार ॥
सूरजतेनी आगे पहुँचा ठाकुर उरई का सरदार ६६
सजी कचहरी गजराजा की भारी लाग राज दरबार ॥
झारि बिसेने सब बैठे हैं टिहुननधरे नाँगि तलवार ६७
माहिल पहुँचे त्यहि समया में राजै कीन्ह्यो राम जुहार ॥
बड़ी खातिरी राजै कीन्ह्यो बैठा उरई का सरदार ६८
राजा बोले फिरि माहिलते नीके रहे खूब तुम भाय ॥
माहिल बोले फिरि राजाते भइ अनहोनी कहींनाजाय ६६