सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 151

३० आल्हखण्ड । १४६
मलखे बोले फिरि आल्हाते लश्कर कूच देव करवाय ॥
यह मन भाई तब आल्हा के डङ्का तुरत दीन बजवाय ४३
हाथी सजिगा पचशब्दा तब आल्हा तुरत भयो असवार ॥
हरनागर घोड़े के ऊपर भैने चढ़ा चँदेले क्यार ४४
घोड़ मनोहर देवा बैठा सिरगा बनरसका सरदार ॥
सोहैं कबूतरी पर मलखे भल ऊदन बेंदुलपर असवार ४५
मन्नागूजर रूपन बारी दोऊ बेगि भये तय्यार ॥
झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ४६
कूचके डङ्का बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥
घोड़ी कबूतरी के ऊपरमाँ आगे फिरैं बीर मलखान ४७
खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं पवनकी चाल ॥
मारु मारु कै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ४८
इतते लश्कर गा आल्हाका जोगा उतै पहूँचा आय ॥
बम्बके गोला छूटन लागे हाहाकारी शब्द सुनाय ४६
जौनै हाथी के गोला लागै मानों गिरा महल अरराय ॥
जौनै क्षत्री के गोला लागै साथै उड़ा चीलहअमजाय ५०
जौनै बछेड़ा के गोला लागै धुनकन रुईसरिस उड़िजाय ॥
गोला लागै ज्यहि सँड़िया के सो मुहभरा गिरै अललाय ५१
जौनै बैलके गोला लागै तरवर पात ऐस गिरि जाय ॥
दुनो गोल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द है जाय ५२
मारु बँदूकै औ मालाकी बलकी कड़ाबीन की मार ॥
चलैं कटारी बूंदीवाली ऊना चलै विलाइत क्यार ५३
कटि कटि क्षत्री गिरैं खेतमें उठि उठि रुण्ड करैं तलवार ॥
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ५४