आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ आल्हाखण्ड। १५०
युक्ति बनावो अब तुमहीं म्वहिं जासों धर्म रहै यहिकाल ॥
सुनवाँ ब्याही फिरि जावैना औ मरिजाएँ दुष्ट ततकाल ६१
सुनिकै बातें नयपाली की माहिल बोले वचन उदार ॥
बाना तजिकै रजपूती का अब धरि देव ढाल तलवार ६२
नाई वारी सँगमें लैके पाँयन परोजाय ततकाल ॥
जो कछु बोलैं सो कछु मान्यो मड़ये तरे लैआवौ हाल ६३
घरमें लैके चारो भाई मारो नृपति आय ततकाल ॥
इतना कहिकै माहिल चलिभे आदरकीन बहुत नरपाल ६४
भुजा उखारी गईं अभई की माहिल हृदय परी सो शाल ॥
लड़ै सिड़ैकी सखरि नाहीं निन्दाकरत फिरैं सबकाल ९५
जैसे राजै भानुप्रतापी मार्यो रहै तपस्वी ज्वान ॥
यह है गाथा बालकाण्ड में तुलसी राम समर मैदान ६६
तैसे ऊदनके मरिबेमें माहिल चुगुल बने सबद्वार ॥
धर्मसे निन्दा नहिं माहिलकी यामें दिहे शास्त्र अधिकार ६७
औरो गाथा कहु पुराणकी यामें आनि घटावों ज्वान ॥
पै नहिं समया यहि समया में ऐसी परी व्यवस्था आन ६८
माहिल पहुंचे फिरि तम्बूनमें राजै नेगी लीन बुलाय ॥
जहँना तम्बू रहै आल्हा का राजा तहाँ पहुँचे जाय ६६
बड़े प्यार सों राजै लीन्ह्यो आल्हा बैठिगये हर्षाय ॥
मलखे बोले तब राजाते आपन हालदेउ बतलाय १००
कौने मतलब को आयो है सो हम करैं चारिहू भाय ॥
सुनिकै बातें मलखाने की राजा बोले वचन बनाय १०१
हँसी खुशी सों सुनवाँ व्याहैं हमारे मनै गई यह आय ॥
सिंहन घर में कन्या ब्याही स्यारन हँसीकिये का भाय १०२