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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

२० आल्हखण्ड । १३६
चली भवानी फिरि पूजनको सुन्दरि गीतरहीं सब गाय ७२
जायकै पहुंचीं त्यहि मंदिरमाँ ज्यहिमाँ बसै दुर्गा माय ॥
अक्षत चन्दन सों पूजन करि लौंगनहार दीन पहिराय ७३
शीश नवायो जगदम्बाका सुनवाँ फूलनहार चढ़ाय ॥
भोग लगायो फिरि मेवा का सेवा अधिक कीन हरषाय ७४
किह्यो इशारा फिरि ऊदनको तुरतै लीन्ह्यो ढोल उठाय ॥
कूदि बेंदुलापर चढ़ि बैठ्यो लशकर तुरतपहुंच्योआय ७५
कहाँ कहाँ कहि माली दौरे रहिगे जहाँ तहाँ शिरनाय ॥
खबरि सुनाई नयपाली को सुनतै गयो सनाकाखाय ७६
जायकै पहुंच्यो तेहि मंदिर में जेहि में रहैं दुर्गा माय !
तुरत पंडितन को बुलवायो जानैं तंत्रशास्त्र अधिकाय ७७
इन्द्र यज्ञ नृपने तहँ ठानी स्वाहा स्वाहा परै सुनाय ॥
एकसहसमन होम करायो गायो वेदमंत्र तहँ भाय ७८
हाथ जोरिकै विनय सुनायो मानो सत्यवचन सुरराज ॥
बारह बरसै जब तप कीन्हों तबमोहिंढोल दियोमहराज ७६
जाति बनाफर की ओछी है तिनने चोरी लई कराय ॥
सुनिकै बातें ये राजा की भइ नभवाणि समयसुखदाय ८०
तुम्हरे उनके नहिं काहूघर रहि है ढोल सुनो नृपराय ॥
इन्दर बोले फिरि देवन ते मानो बचन हमारे भाय ८१
आल्हा अम्मर हैं दुनिया में ते कस मरैं यहांपर आय ॥
देवी शारदा का वरदानी आल्हा केर लहुरवा भाय ८२
लै कै ढोलक तुम तम्बू ते पटको तुरत डांड़पर जाय ॥
सुनिकै बातें ये इन्दर की देवता तुरत चले शिरनाय ८३
लै कै ढोलक ते पटकत भे अपने धाम पहुंचे आय ॥

आल्हाका विवाह । १३७ २१
गा नैपाली निज मंदिर को लश्कर खुशी बनाफरराय ८४
ऊदन बोले फिर मलखे ते दादा मोहबेके सरदार ॥
कूच करावो अब लश्कर को चलिकै लड़ैं तासुके द्वार ८५
यह मन भाई मलखाने के तुरतै कूच दीन करवाय ॥
कोउ कोउ घोड़ा हंसचाल पर कोउकोउ मोरचालपरजायँ ८६
चित्रचालपर चतुरचालपर कोईकोईचलैं तितुरकी चाल ॥
मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल ८७
बाजैं डंका अहतंका के घूमत जावैं लाल निशान ॥
छाय अँधेरिया गै दशहू दिशि छिपिगे अंधकार में भान ८८
मारु मारु करि क्षत्री बोलैं रणमें बड़े लड़ैता ज्वान ॥
घोड़ी कबुतरी के ऊपर माँ आगे चला बीर मलखान ८६
तीनकोस जब फाटक रहिगा तब पुरबासी उठे डेराय ॥
यक हरिकारा दौरति आवै राजै खबरि सुनाई आय ६०
सुनिकै बातें हरिकाराकी राजा मनै उठा अकुलाय ॥
जोगा भोगा तहँ बैठेथे बोले राजै शीश नवाय ६१
हुकुम जो पावैं महाराजा को डंका अबै देयँ बजवाय ॥
जाय न पावैं मोहबे वाले सबकी कटा लेयँ करवाय ६२
सुनिकै बातें ये लरिकन की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥
जोगा भोगा दोऊ चलिभे लश्कर तुरत पहुंचे आय ६३
बाजे डंका अहतंका के शङ्का करे कोऊ नहिं काल ॥
घोड़ आपनेपर चढ़िबैट्ठ्यो पूरन पटना को नरपाल ६४
जोगा भोगा घोड़े बैठे लश्कर कूच दीन करवाय ॥
बाजे डंका अहतंका के पहुँचे समरभूमि में आय ६५
आगे घोड़ाहै जोगा का पाछे सकल शूर मरदार ॥

२२ आल्हखण्ड । १३८
घोड़ बेंदुला पर ऊदनहैं लीन्हे हाथ ढाल तलवार ९६
जोगा बोला तब घोड़ेते कौने डांड़ दबायो आय ॥
जितने आये हैं मोहवे के सबके मूड़ लेउँ कटवाय ९७
बातें सुनिकै ये जोगा की ऊदन तहां पहुंचे आय ॥
हमहैं क्षत्री मुहवे वाले हमरो मूडलेउ कटवाय ९८
सुनिकै बातें जोगा ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार ॥
ऐंचिकै मारा बघऊदन को सोऊ लीन ढालपर वार ९६
भोगा चलिभा तब ऊदनपर मलखे तुरत पहुंचे आय ॥
मलखेठाकुर के मूर्चा में कोउ राजपूत न रोकै पायँ १००
मन्नागूजर मोहवे वाला पूरन पटना का सरदार ॥
लड़ें बहादुर दोउ रणखेतन दोऊहाथ करैं तलवार १०१
घोड़ पपीहा की पीठिपर रूपन गरुदेय ललकार ॥
भाला छूटे असवारन के पैदलचलनलागितलवार १०२
गजके हौदा ते शर वर्षे नीचे करैं महावत मार ॥
कझा भिड़िगे तहँ घोड़न के अंकुशभिड़ेमहौतनक्यार १०३
पैदर के सँग पैदर भिड़िगे घोड़न साथ घोड़ असवार ॥
सूंदि लपेटा हाथी भिड़िगे हौदन होय तीर की मार १०४
चलैं कटारी कोनाखानी ऊना चलैं विलाइति केर ॥
लीन्हे भाला नागदवनि को मारैं एक एक को हेर १०५
झुके सिपाही नैनागढ़ के ऐंड़ा बेंड हनैं तलवार ॥
जोगा भोगा दोनों ठाकुर गरूई हाँक दीनललकार १०६
सदा न फूलै यह बन तोरई यारों सदा न सावन होय ॥
अम्मर देही नहिं मानुष कै मरिहै एकदिना सबकोय १०७
है मरदाना ज्यहि को बाना सो लड़ि मरै समर मैदान ॥

आल्हाका बियाह । १३६ २३
जीवत बचिहै जो मुर्च्चा ते पाई खान पान सनमान १०८
जो भगिजाई अब मुर्च्चा ते तेहिको हनों कठिन तलवार ॥
जोगा भोगा की बातें सुनि झूमनलागि शूर सरदार १०९
कटि कटि कल्ला गिरैं बखेड़ा मरि मरि होनलागखरिहान ॥
धरि धरि धमकैं रण खेतन में क्षत्री बड़े लड़ैता ज्वान ११०
मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १११
सवैया ॥
कौन शुमार करै ललिते अतिमार भई सो कहाँ लगगाई ।
खून कि धार बहे नदि नार किनार परैं गज ऊंट दिखाई ॥
नाच पिशाच करैं तहँ साँच लिये करखप्पर योगिनि आई ॥
गावत भूत बजावत ताल तहाँ करतालनकी धुनिछाई ११२
ऊदन बोले मलखाने ते दादा मोहबे के सरदार ॥
कठिन मवासी है नैनागढ़ ह्वाँपर बहुत रहौ हुशियार ११३
मन्नागूजर मोहबे वाले ज़ावो एक तरफ यहिबार ॥
चाचा मालिक सब तुम्हीं हौ राजा बनरस के सरदार ११४
तुम चलिजावो एक तरफको मारो ढूंढि ढूंढि कै ज्वान ॥
हाथिन केरे तुम हौदापर दादा हनो बीर मलखान ११५
इतना कहिकै बघऊदन ने हौदा उपर नचावा घोड़ ॥
काहू मारा तलवारी सों काहू हना तड़ाका गोड़ ११६
बाइस हौदा खाली ह्वैगै अकसर ऊदन के मैदान ॥
घोड़ी कबुतरी के ऊपरते बहुतन हना बीरमलखान ११७
जैसी जावै बनरसवाला आल्हा समर धनी तलवार ॥

२४ आल्हखण्ड । १४०
भगैं सिपाही चौगिर्दा ते भारी होत चलै गलियार ११८
मन्नागूजर ऊजर कीन्हों देवै कठिन कीन तलवार ॥
को गति बरणै तहँ रुपनाकी रणमाँ भली मचाई मार ११९
पूरन राजा पटनावाला भाला लिये हनै दश पांच ॥
को गति बरणै तहँ भोगाकै घोड़ा ऊपर रहा सो नाच १२०
हनि हनि मारै चौगिर्दा ते गरुई हाँक देय 'ललकार ॥
इतना सुनिकै मलखे ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार १२१
ऊदन बोले तब मलखे ते दादा मोहबे के सरदार ॥
सुनवाँ भौजी का भैया है आई मड़ये के त्यवहार १२२
इतना सुनिकै मलखे ठाकुर फ़ौजन तरफ पहूंचाय ॥
बहुतन मार्यो तलवारी सों बहुतनहन्यो ढालके घाय१२३
इतना कहिकै ऊदन चलिभे जोगा पास पहूंचे जाय ॥
जोगा बोला तब ऊदनते मानो कही बनाफरराय १२४
बड़ी दूरिते चलिआयो है आपनि लोह दिखावो आय ॥
सुनिकै बातें ऊदन बोले ठाकुर सत्य देयँ बतलाय १२५
मोरे मोहोबे में किरिया भै जो करि डरी चँदेलोराय ॥
कोऊ आवै समरभूमि में आपनिलोह दिखावैआय १२६
पहिले ल्वाहै वहिकी देखो पाछे आपनि देवदिखाय ॥
मारो मारो समर भूमि में नहिंशककरोमनैकछुभाय१२७
इतना सुनिकै जोगाठाकुर तुरतै लीन्ह्यो साँ ग उठाय ॥
मनाएक के सो अंदाजन ऊदन ऊपर दयोचलाय १२८
घोड़बेंदुला ऊपर उड़िगा नीचे सांगगिरी अरराय ॥
बचा बेंदुलाका चढ़वैया आल्हाकेर लघुरवाभाय १२६
ऊदन बोले फिरि जोगा ते दूसरि वार करो सरदार ॥

आल्हाका विवाह । १४१ २५
सुनिके बातें ये ऊदनकी तुरतै खैंचिलीन तलवार १३०
ऐंचिकै मारा बघऊदनको ऊदन लीन ढाल परवार ॥
ऊदन बोल्यो फिरि जोगाते तिसरि वार करो सरदार १३१
खैंचि तड़ाका धनुही लीन्ह्यो तामें दीन्ह्यो तीर लगाय ॥
ऐंचिकै मारा सो ऊदनके ऊदनलीन्ह्यो वार बचाय १३२
खैंचि झड़ाका तलवारीको तुरतै हना उदयसिंहराय ॥
मूड़ बिसानी सो घोड़ेके बिन शिर परै रुंड दिखराय १३३
कोतल घोड़ा जोगा बैठे सायंकाल पहुंचा आय ॥
मारुबन्दभै दोनों दलमाँ फौजै चलीं थलनको धाय १३४
चरि चरि गौवैं घरका डगरीं उड़ि उड़ि पक्षिन लीन बसेर ॥
तारागण सब चमकनलागे संतन रमा रामको टेर १३५
करों तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥
शमरमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त १३६
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागना-
रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्र
वंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसादकृतऊदनविजय
वर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥

सवैया ॥
शेष महेश गणेश मनाय, सदा वरदान यही हम पावैं ।
हाथगहे धनुबान सुजान, महान सदा ज्यहि वेद बतावैं ॥
कोटिन जन्म जहां उपजैं, रघुनन्दनके ढिगही तहँ आवैं ।
वरदान यही ललितेकर जान,सुजान सदा रघुनन्दन भावैं १

२६ - आल्हाखण्ड । १४२
सुमिरन ॥
गोपी घूमैं नहिं गलियनमें नहिंकहुँ नचत फिरतहैं श्याम॥
मानुष देही यह रहिहैना इकलो रही जगत में नाम १
नहीं भरोसा नर देहीको कैसे करै झूठ अभिमान ॥
सदा इकेलो तर बिरवाके मनमें करै रामको ध्यान २
यहै सहाई है दुनिया में गाई बेद पुराणन गाथ ॥
ताते ज्वानो खूब यह समझो गुजरो फेरि न आवै हाथ ३
समय जो पावो कछु दुनियामें ध्यावो सदा राम रघुराज ॥
विगरी सुधरै तुरतै तुम्हरी पूरण होयँ तुम्होरे काज ४
छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
सुन्दरवन को चिट्ठी जाई लड़ि हैं बड़े बड़े सरदार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
उदय दिवाकर भे पूरब में किरणनकीन जगतउजियार ॥
जोगा भोगा त्यहि समया में आये तुरत राज दरबार १
हाथ जोरिकै जोगा बोले बप्पा वचन करो परमान ॥
पाँचलाख फौजै हम लैगे रहिगे तीनिलाख सब ज्वान २
सुनिकै बातें ये जोगा की राजै कागज़ लीन उठाय ॥
चिट्ठी लिखिकै अरिनन्दन को सुन्दरवन को दीन पठाय ३
पाती लैके हरिकारा गो सुन्दर वनै पहुंचा जाय ॥
पढ़िकै पाती अरिनन्दन ने गौरीनन्दन चरण मनाय ४
तुरत बुलायो सेनापति को तासों कह्यो हाल समुझाय ॥
जितनी सेना सुन्दरवन की सबियाँ कूच देव करवाय ५ ।
सुनिकै बातें महराजा की कूचक डङ्का दीन बजाय ॥
कूच कराये सुन्दरवन ते नदी निकट पहुँचे आय ६

आल्हाका विवाह । १४३ २७
तम्बू गड़िगे महराजन के डेरा गड़े सिपाहिन केर ॥
आल्हा ऊदन के डेरे ते योजन एक कोस के नेर ७
किश्ती नावै तिहि नदिया में तामें नचैं कंचनी नाच ॥
आल्हा पकरै के कारण में ज्ञानिन युक्ति कीन यह साँच ८
दिखैं तमाशा तहँ नदिया में इत उत दोऊ दिशाके ज्वान ॥
आल्हा ठाकुर त्यहि समया में तहँ पर करै गये असनान ६
होनी होवै सो सच होवै ज्ञानी ध्यानी को दिखलाय ॥
कौन गुमानी अरमानी अस जानी मौत नहीं ज्यहिभाय १०
फिरि अभिमानी नर देही के नेही चरणशरण नहिंजायँ ॥
बिना पियारे रघुनन्दन के चन्दन कौन परै दिखराय ११
बन्दन करिकै रघुनन्दन कों आल्हा नदी अन्हाने जाय ॥
चन्दन अक्षत सों पूजन करि प्रातःकृत्य कीन हर्षाय १२
मेला दीख्यो फिरि नदिया में दोउदिशि रहे नारि नर हेर ॥
नावै किश्तिन के ऊपर में होवै नाच पतुरियन केर १३
दिखै तमाशा तहँ ठाढ़े भे ठाकुर मोहबे के सरदार ॥
नावै आई अरिनन्दन की तिनमाँ होवै अधिक बहार १४
तहँ हरिकारा नैनागढ़ को बोला अरिनन्दन सों बात ॥
नामी ठाकुर मोहबे वाले आये आल्हा क्यरी बरात १५
सुनिकै बातें हरिकारा की बोल्यो अरिनन्दन त्यहिकाल ॥
रहे सगाई देशराज सों आल्हा बड़े पियारे बाल १६
अयो बराते का तिनके हौ पैदल नाच दिखौ महिपाल ॥
सुनिकै बातें अरिनन्दन की बोले देशराज के लाल १७
कौनि सगाई देशराज सों साँचे हाल देव बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये आल्हा की कहअरिनन्दनबचन सुनाय १८

२८ आल्हाखण्ड । १४४
तुम चढ़िआवो अब नावन में देखो नाच यहाँ पर आय ॥
कहैं सगाई हम साँची फिरि तुम सों हाल देयें बतलाय १६
सुनिकै बातैं आल्हाठाकुर नावन उपर पहुंचे जाय ॥
किह्यो इशारा अरिनन्दन ने खेवट दीन्ह्यो नाव चलाय २०
डाटिकै बोल्यो आल्हाठाकुर खेई नाव अबै ना जाय ॥
सुनिकैबोल्यो अरिनन्दन फिरि आल्है बार बार समुझाय २१
सोला मिनटन के अर्सा में आवो फेरि यहां पर भाय ॥
लहरा नदिया के तानन में बानन सरिस पहुँचैं जायँ २२
सो मन भावै महराजन के जे शिरताजन के समुदाय ॥
लहरा नदिया के तानन सों बानन सरिस पैरैं दिखराय २३
इतना कहतै अरिनन्दन के पहुंची नाव किनारे आय ॥
उतरी उतरा भा नावनते आल्हा उतरि परे हर्षाय २४
तम्बूलैंगे अरिनन्दन तब बन्दन कैकै शीश नवाय ॥
द्यावलि नन्दन तहँ बैठतभे चन्दन सरिस पैरैं दिखराय २५
कही हकीकति अरिनन्दनतब तुमको कैद कीन हम आय ॥
देखें हम सों बुद्धिमान कोउ मोहवे और पैरै दिखराय २६
इतना कहिकै अरिनन्दन ने तुरतै कूच दीन करवाय ॥
चढ़िकै हाथी आल्हाठाकुर सुन्दरबनै पहुंचे जाय २७
गा हरिकारा नैनागढ़ का राजै खबरि सुनाई जाय ॥
ऊदन ढूँढ़ैं ह्याँ आल्हा को दादा नहीं पैरै दिखराय २८
आज्ञा लैके मलखाने की सोनवाँ पास पहुंचे जाय ॥
भेद बनायो सब सोनवाँ ने फौजन फेरि पहुंचे आय २९
घोड़ा लैके बयपारी बनि सुन्दरबनै पहुंचे जाय ॥
द्वार पहुंचे अरिनन्दन के ऊदन बेंदुल दीन नचाय ३०

आल्हाका विवाह । १४५ २६'
देखि तमाशा द्वारपाल तहँ ऊदन निकट पहुंचे आय ॥
साथ तुम्हारे द्वै घोड़ा हैं औ असवार एक तुम भाय ३१
रूप तुम्हारो बयपारी को आयो कौन देश ते भाय ॥
घोड़ा लायेते काबुलते बेचे सबै कन्नौजै जाय ३२'
एक इकेलो यह बाकी है राजै खबरि सुनावै जाय ॥
इतना सुनिकै द्वारपाल फिरि राजै दीन्ह्यो खबरि बताय ३३
खबरि पायकै अरिनन्दन फिरि द्वारे पौरि पहुंचे आय ॥
घोड़ पपीहा मोहबेवाला राजा देखिगये हरषाय ३४
राजा बोले बघऊदन ते याकी कीमति देवबताय ॥
ऊदन बोले अरिनन्दनते साँचे बचन देयँ बतलाय ३५
पहिले चढ़िकै यहि घोड़ेपर कोऊ ज्वान नचावै आय ॥
हाल देखिल्यो यहि घोड़ेका तब मैं कीमति देउँ बताय ३६'
सुनिकै बातें सौदागरकी राजै हुकुम दीन फर्माय ॥
बैठै क्षत्री जो कोउ जावै घोड़ा टापन देय हटाय ३७
होय मोहबिया कोउ मोहबेका घोड़ा देखि सीध है जाय ॥
टेढ़े घोड़ेके चढ़वैया मोहबे बसैं बनाफरराय ३८
सुनिकै बातें सौदागरकी तुरतै आल्है लीन बुलाय ॥
हुकुम लगायो अरिनन्दनने घोड़ा बैठि नचावोभाय ३६'
हुकुम पायकै अरिनन्दनको घोड़ा चढ़े बनाफरराय ॥
घोड़ नचायो भल आल्हाने ऊदन बोल्यो बचन सुनाय ४०'
जल्दी चलिये अब लश्करको दादा काह रह्यो पछिताय ॥
नाम हमारो उदयसिंहहै ओ अरिनन्दन बात बनाय ४१
इतना कहिकै बघऊदनने आपन घोड़ दीन दौड़ाय ॥
आल्हौ चलिभे फिरिजल्दीसों लश्कर दोऊ पहुंचेभाय ४२'
१०

२. द्वितीय भाग: आल्हा-ऊदल बाल्यकाल, इन्द्रजीत-मलखान पराक्रम व बावन युद्ध आरम्भ

३० आल्हखण्ड । १४६
मलखे बोले फिरि आल्हाते लश्कर कूच देव करवाय ॥
यह मन भाई तब आल्हा के डङ्का तुरत दीन बजवाय ४३
हाथी सजिगा पचशब्दा तब आल्हा तुरत भयो असवार ॥
हरनागर घोड़े के ऊपर भैने चढ़ा चँदेले क्यार ४४
घोड़ मनोहर देवा बैठा सिरगा बनरसका सरदार ॥
सोहैं कबूतरी पर मलखे भल ऊदन बेंदुलपर असवार ४५
मन्नागूजर रूपन बारी दोऊ बेगि भये तय्यार ॥
झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ४६
कूचके डङ्का बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥
घोड़ी कबूतरी के ऊपरमाँ आगे फिरैं बीर मलखान ४७
खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं पवनकी चाल ॥
मारु मारु कै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ४८
इतते लश्कर गा आल्हाका जोगा उतै पहूँचा आय ॥
बम्बके गोला छूटन लागे हाहाकारी शब्द सुनाय ४६
जौनै हाथी के गोला लागै मानों गिरा महल अरराय ॥
जौनै क्षत्री के गोला लागै साथै उड़ा चीलहअमजाय ५०
जौनै बछेड़ा के गोला लागै धुनकन रुईसरिस उड़िजाय ॥
गोला लागै ज्यहि सँड़िया के सो मुहभरा गिरै अललाय ५१
जौनै बैलके गोला लागै तरवर पात ऐस गिरि जाय ॥
दुनो गोल आगे को बढ़िगे तोपन मारु बन्द है जाय ५२
मारु बँदूकै औ मालाकी बलकी कड़ाबीन की मार ॥
चलैं कटारी बूंदीवाली ऊना चलै विलाइत क्यार ५३
कटि कटि क्षत्री गिरैं खेतमें उठि उठि रुण्ड करैं तलवार ॥
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ५४

आल्हाका बिवाह । १४७ ३१
सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे ऊपर करैं महावत मार ॥
पैदर पैदर कै बरनी मै औ असवार साथ असवार ५५
जौने हौदा ऊदन ताकैं बेंबुल तहाँ पहुँचै जाय ॥
हनिकै मारैं असवारे को औ हौदा ते देयँ गिराय ५६
अकसर ऊदन के मारुन में काहू धरा धीर ना जाय ॥
पूरन राजा औ जगनाका परिगासमर बरोबरि आय ५७
मलखे जोगा का संगरहै भोगा बेंबुल का असवार ॥
बिजिया ठाकुर देवा ठाकुर दूनों खूब करैं तलवार ५८
अपने अपने सब मुर्चन में क्षत्री नेक न मानैं हार ॥
मलखे जोगा के मुर्चा में होवै कड़ाबीन की मार ५६
ऊदन भोगा के मुर्चा में कोताखानी चलै कटार ॥
बिजिया देवा के मुर्चा में दोऊ हाथ चलै तलवार ६०
को गति बरणै जगनायक की पूरन पटना को सरदार ॥
मारु बरोबरि दोऊ करिकै गरुई हाँक देयँ ललकार ६१
बड़ी लड़ाई भै नैनागढ़ नदिया बही रक्त की धार ॥
बहीं लहासैं तहँ क्षत्रिनकी पक्षी मानों ख्यलें नेवार ६२
जाँघ औ बाहू रजपूतन की तामें गोह सरिस उतरायँ ॥
छुरी कटारी मछली मानों ढालैं कछुवा सम दिखरायँ ६३
घोड़ा हींसैं हाथी चिघरैं ठाढ़े ऊंट तहाँ अललायँ ॥
बड़ बड़ राजा उमरायन को रणमास्यारकागमिलिखायँ ६४
जोगा ठाकुर के मुर्चापर गरुई हांक दीन मलखान ॥
सँभरिकै बैठो अब घोड़ापर की अब लौटि जाव घरज्वान ६५
सुनिकै बातें मलखाने की तुरतै खैंचि लीन तलवार ॥
ऐंचिकै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ६६

३२ आल्हाखण्ड । १४८
ढाल फाटिगै गैंड़ावाली रणमाँ टूटि गिरी तलवार ॥
उतरि कबूतरी ते मलखाने तुरतै बाँधि लीन सरदार ६७
बंधन हैगा जब जोगाका भोगा लीन्ह्यो सांग उठाय ॥
ताकि कै मारा बघऊदन का ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय ६८
ऊदन बोले फिरि भोगाते ओ बिसिआने बात बनाय ॥
वार दूसरी अब तुम मारै ठाकुर तोरि आहिराहिजाय ६९
बातें सुनिकै बघऊदन की भोगा भालालीन उठाय ॥
दूनों अँगुरिन भाला तौलै कालीनाग ऐस मन्नाय ७०
तारा टूटै आसमानते तौ हिरगास भुईं ना जाय ॥
छूटिग भाला जो अँगुरिनते कम्मर मचा ठनाका आय ७१
बचा दुलरुआ द्यावलिवाला आला देशराज को लाल ॥
ढालकि औझड़ ऊदनमारा भोगा गिरा तहाँ ततकाल ७२
भोगा बँधिगा रणखेतन में विजिया बड़ा लड़ैया ज्वान ॥
अपने मोर्चा में सो हार्यो बांध्यो मैनपुरी चवहान ७३
पूरनराजा जगनायक का मोर्चापरा बरोबरि आय ॥
गुर्ज चलायो पूरन राजा जगना लीन्ह्यो वार बचाय ७४
ऐंड़ा मसक्यो हरनागरके हाथी उपर पहुंचा जाय ॥
खैंचिकै मारा तलवारी को हाथी सूँढ़गिरी अरराय ७५
गिरामहावत तब मस्तकते हाथी बैठिगयो त्यहि ठायँ ॥
बंधन कीन्ह्यो फिरि पूरन को जीतिक डंका दिह्यो बजाय ७६
भगे सिपाही नैनागढ़ के काहू धराधीर ना जाय ॥
बंधन हैगे चारिउ योधा एकते एक बली अधिकाय ७७
जहँना तम्बू रहे आल्हाका तहँना गये सकल सरदार ॥
माहिल बन्धन सबको दीख्यो घोड़ी तुरत भये असवार ७८

[Header] आल्हाका विवाह । १४६ ३३

जहाँ कचहरी नयपाली की माहिल पहुंचिगये त्यहिबार ॥
दीख्यो माहिलको नयपाली राजै बड़ाकीन सतकार ७९
माहिल बोले तब राजाते तुम सुनिलेउ बिसेनेराय ॥
तीनों लड़िका तुम्हरे बँधिगे चौथो पूरन लये बँधाय ८०
सुनवाँ ब्याहीगय आल्हा को तौ रजपूती जाय नशाय ॥
पानी पीहै कोउ क्षत्री ना तुमको सत्य दीन बतलाय ८१
राजा बोले तब माहिलते ठाकुर उरई के सरदार ॥
काह कलङ्की देशराज भे सो तुम कथा कहौ यहिबार ८२
माहिल बोले नयपाली ते सुनिल्यो बचन मोर महराज ॥
चले शिकारै देशराज बन दूसर बच्छराज शिरताज ८३
देवलि बिरमा दूनों बहिनी बेंचिनदही जायँ त्यहिराह ॥
मार्ग सँकोचो त्यहि बनजानो अरनालड़ैं तहाँ नरनाह ८४
पकरिकै सींगैं इक भैंसाकी देवलि दीन्ह्यो दूरि हटाय ॥
दूसर बिरमाने पकरा तहँ पाछे सोऊ पछिलाति जाय ८५
दूनों अरना मारग हटिगे दूनों जोड़ भये इकठोर ॥
देशराज कह बच्छराज सों दूनों बड़ी बली इकजोर ८६
इनको लैकै घरको चलिये होवैं पूत सुपूते भाय ॥
तिनहिन अहिरिन के पेटेते चारो भये बनाफरराय ८७
बाप छत्तरी माता अहिरिनि बेटा कैसे होयँ कुलीन ॥
ब्याह न कीन्ह्यो तुमसुनवाँ का जानोंजातिपांति अकुलीन ८८
पूजन कीन्ह्यो तब माहिल का राजै फेरि कीन सतकार ॥
बड़े पियारे तुम माहिल हौ ठाकुर उरई के सरदार ८९
बहिनि बियाही चंदेले घर जिनको कही रजा परिमाल ॥
किह्योमुलहिजानहिंतिनकोतुम हमसों सत्य कह्यो सबहाल ९०

३४ आल्हाखण्ड। १५०
युक्ति बनावो अब तुमहीं म्वहिं जासों धर्म रहै यहिकाल ॥
सुनवाँ ब्याही फिरि जावैना औ मरिजाएँ दुष्ट ततकाल ६१
सुनिकै बातें नयपाली की माहिल बोले वचन उदार ॥
बाना तजिकै रजपूती का अब धरि देव ढाल तलवार ६२
नाई वारी सँगमें लैके पाँयन परोजाय ततकाल ॥
जो कछु बोलैं सो कछु मान्यो मड़ये तरे लैआवौ हाल ६३
घरमें लैके चारो भाई मारो नृपति आय ततकाल ॥
इतना कहिकै माहिल चलिभे आदरकीन बहुत नरपाल ६४
भुजा उखारी गईं अभई की माहिल हृदय परी सो शाल ॥
लड़ै सिड़ैकी सखरि नाहीं निन्दाकरत फिरैं सबकाल ९५
जैसे राजै भानुप्रतापी मार्यो रहै तपस्वी ज्वान ॥
यह है गाथा बालकाण्ड में तुलसी राम समर मैदान ६६
तैसे ऊदनके मरिबेमें माहिल चुगुल बने सबद्वार ॥
धर्मसे निन्दा नहिं माहिलकी यामें दिहे शास्त्र अधिकार ६७
औरो गाथा कहु पुराणकी यामें आनि घटावों ज्वान ॥
पै नहिं समया यहि समया में ऐसी परी व्यवस्था आन ६८
माहिल पहुंचे फिरि तम्बूनमें राजै नेगी लीन बुलाय ॥
जहँना तम्बू रहै आल्हा का राजा तहाँ पहुँचे जाय ६६
बड़े प्यार सों राजै लीन्ह्यो आल्हा बैठिगये हर्षाय ॥
मलखे बोले तब राजाते आपन हालदेउ बतलाय १००
कौने मतलब को आयो है सो हम करैं चारिहू भाय ॥
सुनिकै बातें मलखाने की राजा बोले वचन बनाय १०१
हँसी खुशी सों सुनवाँ व्याहैं हमारे मनै गई यह आय ॥
सिंहन घर में कन्या ब्याही स्यारन हँसीकिये का भाय १०२

आल्हाका बिवाह । १५१ ३५
धन्य बखानों दुउ रानिनको जिनके पूत सुपूते चार ॥
धन्य बखानों मलखाने को माड़ो भलीकीन तलवार १०३
भुजा उखारयो ज्यहि अभईके आल्हाकेर लहुरवा भाय ॥
तीनों चलिये अब मड़ये को भौंरी तुरत देयँ करवाय १०४
इतना सुनिकै मलखे बोले फौजन डंका देउ बजाय ॥
कह नयपाली सुन मलखाने इकलो दूलह देउ पठाय १०५
कह मलखाने सुन नैपाली तुमसों सत्य देयँ बतलाय ॥
किरिया करलो श्रीगंगाकी ब्याहन तबै तुम्हारे जायँ १०६
यह मनभाई नयपाली के किरिया तुरत कीन सरदार ॥
तीनों लड़का मलखे छोड़े आपौ फाँदिभये असवार १०७
देवा ऊदन मन्नागूजर सय्यद बनरस का सरदार ॥
सजि जगनायक मोहबेवाला रूपन बारी भयो तयार १०८
आल्हा बैठे फिरि पलकी में मनमें श्रीगणेशंपद ध्याय ॥
सबियाँ चलिभे नैनागढ़ को महलन तुरत पहूँचे जाय १०६
खम्भा गड़िगा तहँ चन्दन का मालिन माड़ो कीन तयार ॥
सखियाँ आईं नयपाली घर गावन लगीं मंगलाचार ११०
चढ़ो चढ़उवा जब सुनवाँ का फाटक बन्द लीन करवाय ॥
क्षत्री आये जे लड़ने को ते कोठेपर रखे छिपाय १११
भो गठिबन्धन जब आल्हा को थाल्हा गड़ा शूरमन क्यार ॥
प्रथमै पूज्यो श्रीगणेश को गौरीनन्दन शम्भु कुमार ११२
भाँवरि पहिली के परतैखन पण्डित कीन बेद उच्चार ॥
जोगा मारयो तलवारी को ऊदन लीन ढालपर वार ११३
भाँवरि दूसरिके परतैखन भोगा हनी तुरत तलवार ॥
मलखे ठाढ़े रहैं दहिने पर सो लै लई ढालपर वार ११४

३६ आल्हाखण्ड । १५२
भाँवरि तीसरि के परतैखन बिजिया मारी गुर्ज उठाय ॥
वार बचाई त्यहि देवाने राजा रंगमहल को जाय ११५
भाँवरि चौथी के परतैखन राजा जादू दीन चलाय ॥
जवाँ बन्द भै सब कुँवरन कै सबकी नजरबन्द है जाय ११६
सुनवाँ सोची अपने मनमाँ बैरी हैगा बाप हमार ॥
बीर महम्मद की पुरिया को सुनवाँछोड़िदीनत्यहिबार ११७
भई लड़ाई तहँ जादुनकी सातों भाँवरि लई कराय ॥
आल्हा वाली फिरि पलकी में तुरतै सुनवाँ लीन विठाय ११८
सवैया ॥
भूप दुवार चली तलवार अपार बही तहँ शोणित धारा।
वीर बली मलखान सुजान तहाँ बहु क्षत्रिनको हनिडारा ॥
पूतजुझार महाहुशियार लड़ै तहँ भीषम केर कुमारा ।
कौनकहै बघऊदनको रिपुसूदनसों ललिते त्यहि बारा ११९
सुन्दरखन को अरिनन्दन जो सोऊ आयगयो त्यहि द्वार ॥
आठकोसलों चलै सिरोही नदिया बही रक्त की धार १२०
आगे डोलाहै सुनवाँ को पीछे होय भड़ाभड़ मार ॥
ऊदनमलखे की मारुन में जूझे बड़े बड़े सरदार १२१
आल्हा बँधुवाभे नैनागढ़ जोगा झगा बँधे मलखान ॥
कूच करायो बघऊदन ने लश्कर मागराज नियरान१२२
ऊदन बोले तब सुनवाँ ते भौजी मानों कही हमार ॥
दादा बांधेगे नैनागढ़ कैसी युक्तिकरी यहिवार १२३
सुनिकै बातें बघऊदन की सुनवाँ युक्ति कही समुझाय ॥
सम्मत करिकै दूनों चलिभे नैनागढ़ै पहूंचे आय १२४
पुहपा मालिनि के घर बैठे सुनवाँ सहित लहुरवा भाय ॥

आल्हाका विवाह । १५३ ३७
सुनवाँ पूछ्यो जों मालिनि ते मालिनिखबरिदीनबतलाय १२५
रूप गुजरियाको सुनवाँ करि पहुंची नाह निकट सो जाय ॥
रूप देखिकै त्यहि गूजरिको मोहित भयो बनाफरराय १२६
जस बतलान्यो ये गूजरिसों गूजरि तैस दीन समुझाय ॥
मुंदरी दीन्ह्यो फिरि गूजरिको मालिनिघेरै पहुंची आय १२७
सब समुझायो फिरि ऊदन को सांचे हाल दीन बतलाय ॥
घोड़ करिलिया औ रसबेंदुल लैकै गयो लहुरवाभाय १२८
खबरि पायकै बयपारी कै द्वारे नृपति पहुंचा आय ॥
बनो कबुलिहा बघऊदन है सांचो आगा परै दिखाय १२६
राजा पूछ्यो बयपारी सों सांची कीमत देव बताय ॥
ऊदन बोल्यो नयपाली सों चढ़िकैदेखिलेयकोउआय १३०
चाल देखिल्यो इन घोड़नकी पाछे कीमत देयँ बताय ॥
सुनिकै बातें ब्योपारी की राजै हुकुमदीन फर्माय १३१
जावैं क्षत्री जो घोड़न ढिग ताको टापन देयँ हटाय ॥
मुखसों काटैं ऊपर उलैरैं कोउरजपूतपास ना जाय १३२
देखि तमाशा यहु महाराजा तुरतै आल्हा लीन बुलाय ॥
घोड़ा फेरो तुम फाटक में इनकीचाल देव दिखराय १३३
किह्यो इशारा बघऊदन ने घोड़ा चढ़े बनाफरराय ॥
बैठ बेंदुलापर बघऊदन आपननामदीन बतलाय १३४
बाग उठायो दउ घोड़न की फाटक पार पहुंचे आय ॥
मालिनि घरते सुनवाँ चलिभै तुरतै पलकी लीन मँगाय १३५
तीनों पहुंचे फिरि लश्कर में डंका बजन लाग घहराय ॥
चलि भैं फौजैं मलखाने की पहुंचीं प्रागराज में आय १३६
जितने क्षत्री रहैं लश्कर में सबियाँ करनगये असनान ॥

३८ आल्हखण्ड । १५४
हनवन करिके तिरवेनीको दीन्ह्यो द्विजन दान सब ज्वान १३७
बृक्ष अक्षयबटको पूजन करि पहुंचे भरद्वाज अस्थान ॥
बेनीमाधो के दर्शन करि दीन्ह्यो द्विजन सुवरण दान १३८
हाथी घोड़ा रथ कपड़ा औ गहना दीन द्विजन बुलवाय ॥
भये अयाचक सब याचकगण जय जयरहे बनाफर राय १३६
बैठिकै गंगा के तट ऊपर क्षत्रिन हवन कीन हरषाय ॥
स्वाहा स्वाहा बहु द्विज बोलैं कहुँ २ स्वधा स्वधा गाळाय १४०
स्वधा औ स्वाहा ते छुट्टी करि विप्रन भोजन दीन कराय ॥
भोजन करिकै सब द्विज तहँते अपने घरनगये सुखपाय १४१
कूच करायो फिरि मलखाने डंका बजत फौज में जाय ॥
देवलि बिरमा द्वारे ठाढ़ीं देखें वाट बनाफरराय १४२
राह निहारैं नित पुत्रन की कबधौं ऐहैं पुत्र हमार ॥
जौन मुसाफिर आवत देखें ताको करें बड़ा सत्कार १४३
हाल न पावैं जब पुत्रन को तब फिरि जावैं घरे निराश ॥
रानी मल्हना महलन ऊपर नितप्रतिकरैमिलनकी आश १४४
तबलों रुपना आगे आयो पाछे फौज पहुंची आय ॥
बड़ी खुशहाली भै मोहबे माँ दौरे सबै नारिनर धाय १४५
मल्हना देवलि बिरमा तीनों पलकी पास पहुँचीं जाय ॥
मियादेवन को पलकी गै पूजनकीन बहुरिया आय १४६
आल्हा मलखे देबा ऊदन अक्षत चन्दन फूल चढ़ाय ॥
मियादेवन की परिकरमा क्षत्रिन सबन कीन हर्षाय १४७
तहँते आये फिरि द्वारे को तुरतै पण्डितन लीन बुलाय ॥
आरति लैके फिरि सोने की तामें चौमुख दिया बराय १४८
चर परछौनी मल्हना कीन्ह्यो भीतर गये बनाफर राय ॥

आल्हाका बिवाह । १५५ . ३६
उतरिकै पलकी ते सुनवाँफिरि महलन तुरत पहुंचीजाय १४९
मुहँ दिखलाई रानी मल्हना गलको दीन नौलखाहार ॥
पायँ लागेकै सुनवाँ तहँपर करको कंकण दीन उतार १५०
बाजन बाजे चौगिर्दा ते घर घर भये मंगलाचार ॥
फिरि परिमालिक की ड्योढ़ीमाँ पहुंचे सबै शूर सरदार १५१
राजा पूँछें मलखाने ते ओ बिरमा के राजकुमार ॥
अमरढोल रहे नयपाली के कैसे किह्यो तहाँपर मार १५२
इतना सुनिकै मलखे बोले तुम सुनिलेउ रजापरिमाल ॥
दया तुम्हारी जापर होवै ताकीबिजयहोयसबकाल १५३
हृदय लगायो सब कुँवरन को सबको कीन बड़ा सतकार ॥
जीतिके डंका बाजन लागे नौबति झौरै रजा के द्वार १५४
सौ सौ तोपें दर्गी सलामी चकरन पाई खूब इनाम ॥
पिता हमारे किरपाशंकर कीन्हेनिसबैद्विजनकेकाम १५५
माथ नवाबों पितु अपने को जिनबल पूरिकीन यह गाथ ॥
मोर सहायी जग एकै हैं स्वामी अवधनाथ रघुनाथ १५६
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥
सुखसों जीवो तुम दुनियामें दिनदिनहोउधनीअधिकाय १५७
रहे समुन्दर में जबलों जल जबलौं रहें चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर १५८
इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू
प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां
निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसाद कृत
आल्हापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥
नैनागढ़आल्हाबिवाहसम्पूर्ण
इति ॥