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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

२६ - आल्हाखण्ड । १४२
सुमिरन ॥
गोपी घूमैं नहिं गलियनमें नहिंकहुँ नचत फिरतहैं श्याम॥
मानुष देही यह रहिहैना इकलो रही जगत में नाम १
नहीं भरोसा नर देहीको कैसे करै झूठ अभिमान ॥
सदा इकेलो तर बिरवाके मनमें करै रामको ध्यान २
यहै सहाई है दुनिया में गाई बेद पुराणन गाथ ॥
ताते ज्वानो खूब यह समझो गुजरो फेरि न आवै हाथ ३
समय जो पावो कछु दुनियामें ध्यावो सदा राम रघुराज ॥
विगरी सुधरै तुरतै तुम्हरी पूरण होयँ तुम्होरे काज ४
छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
सुन्दरवन को चिट्ठी जाई लड़ि हैं बड़े बड़े सरदार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
उदय दिवाकर भे पूरब में किरणनकीन जगतउजियार ॥
जोगा भोगा त्यहि समया में आये तुरत राज दरबार १
हाथ जोरिकै जोगा बोले बप्पा वचन करो परमान ॥
पाँचलाख फौजै हम लैगे रहिगे तीनिलाख सब ज्वान २
सुनिकै बातें ये जोगा की राजै कागज़ लीन उठाय ॥
चिट्ठी लिखिकै अरिनन्दन को सुन्दरवन को दीन पठाय ३
पाती लैके हरिकारा गो सुन्दर वनै पहुंचा जाय ॥
पढ़िकै पाती अरिनन्दन ने गौरीनन्दन चरण मनाय ४
तुरत बुलायो सेनापति को तासों कह्यो हाल समुझाय ॥
जितनी सेना सुन्दरवन की सबियाँ कूच देव करवाय ५ ।
सुनिकै बातें महराजा की कूचक डङ्का दीन बजाय ॥
कूच कराये सुन्दरवन ते नदी निकट पहुँचे आय ६