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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

आल्हाका बियाह । १३६ २३
जीवत बचिहै जो मुर्च्चा ते पाई खान पान सनमान १०८
जो भगिजाई अब मुर्च्चा ते तेहिको हनों कठिन तलवार ॥
जोगा भोगा की बातें सुनि झूमनलागि शूर सरदार १०९
कटि कटि कल्ला गिरैं बखेड़ा मरि मरि होनलागखरिहान ॥
धरि धरि धमकैं रण खेतन में क्षत्री बड़े लड़ैता ज्वान ११०
मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १११
सवैया ॥
कौन शुमार करै ललिते अतिमार भई सो कहाँ लगगाई ।
खून कि धार बहे नदि नार किनार परैं गज ऊंट दिखाई ॥
नाच पिशाच करैं तहँ साँच लिये करखप्पर योगिनि आई ॥
गावत भूत बजावत ताल तहाँ करतालनकी धुनिछाई ११२
ऊदन बोले मलखाने ते दादा मोहबे के सरदार ॥
कठिन मवासी है नैनागढ़ ह्वाँपर बहुत रहौ हुशियार ११३
मन्नागूजर मोहबे वाले ज़ावो एक तरफ यहिबार ॥
चाचा मालिक सब तुम्हीं हौ राजा बनरस के सरदार ११४
तुम चलिजावो एक तरफको मारो ढूंढि ढूंढि कै ज्वान ॥
हाथिन केरे तुम हौदापर दादा हनो बीर मलखान ११५
इतना कहिकै बघऊदन ने हौदा उपर नचावा घोड़ ॥
काहू मारा तलवारी सों काहू हना तड़ाका गोड़ ११६
बाइस हौदा खाली ह्वैगै अकसर ऊदन के मैदान ॥
घोड़ी कबुतरी के ऊपरते बहुतन हना बीरमलखान ११७
जैसी जावै बनरसवाला आल्हा समर धनी तलवार ॥