आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० आल्हखण्ड । १३६
चली भवानी फिरि पूजनको सुन्दरि गीतरहीं सब गाय ७२
जायकै पहुंचीं त्यहि मंदिरमाँ ज्यहिमाँ बसै दुर्गा माय ॥
अक्षत चन्दन सों पूजन करि लौंगनहार दीन पहिराय ७३
शीश नवायो जगदम्बाका सुनवाँ फूलनहार चढ़ाय ॥
भोग लगायो फिरि मेवा का सेवा अधिक कीन हरषाय ७४
किह्यो इशारा फिरि ऊदनको तुरतै लीन्ह्यो ढोल उठाय ॥
कूदि बेंदुलापर चढ़ि बैठ्यो लशकर तुरतपहुंच्योआय ७५
कहाँ कहाँ कहि माली दौरे रहिगे जहाँ तहाँ शिरनाय ॥
खबरि सुनाई नयपाली को सुनतै गयो सनाकाखाय ७६
जायकै पहुंच्यो तेहि मंदिर में जेहि में रहैं दुर्गा माय !
तुरत पंडितन को बुलवायो जानैं तंत्रशास्त्र अधिकाय ७७
इन्द्र यज्ञ नृपने तहँ ठानी स्वाहा स्वाहा परै सुनाय ॥
एकसहसमन होम करायो गायो वेदमंत्र तहँ भाय ७८
हाथ जोरिकै विनय सुनायो मानो सत्यवचन सुरराज ॥
बारह बरसै जब तप कीन्हों तबमोहिंढोल दियोमहराज ७६
जाति बनाफर की ओछी है तिनने चोरी लई कराय ॥
सुनिकै बातें ये राजा की भइ नभवाणि समयसुखदाय ८०
तुम्हरे उनके नहिं काहूघर रहि है ढोल सुनो नृपराय ॥
इन्दर बोले फिरि देवन ते मानो बचन हमारे भाय ८१
आल्हा अम्मर हैं दुनिया में ते कस मरैं यहांपर आय ॥
देवी शारदा का वरदानी आल्हा केर लहुरवा भाय ८२
लै कै ढोलक तुम तम्बू ते पटको तुरत डांड़पर जाय ॥
सुनिकै बातें ये इन्दर की देवता तुरत चले शिरनाय ८३
लै कै ढोलक ते पटकत भे अपने धाम पहुंचे आय ॥