आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ आल्हखण्ड । १३८
घोड़ बेंदुला पर ऊदनहैं लीन्हे हाथ ढाल तलवार ९६
जोगा बोला तब घोड़ेते कौने डांड़ दबायो आय ॥
जितने आये हैं मोहवे के सबके मूड़ लेउँ कटवाय ९७
बातें सुनिकै ये जोगा की ऊदन तहां पहुंचे आय ॥
हमहैं क्षत्री मुहवे वाले हमरो मूडलेउ कटवाय ९८
सुनिकै बातें जोगा ठाकुर तुरतै खैंचिलीन तलवार ॥
ऐंचिकै मारा बघऊदन को सोऊ लीन ढालपर वार ९६
भोगा चलिभा तब ऊदनपर मलखे तुरत पहुंचे आय ॥
मलखेठाकुर के मूर्चा में कोउ राजपूत न रोकै पायँ १००
मन्नागूजर मोहवे वाला पूरन पटना का सरदार ॥
लड़ें बहादुर दोउ रणखेतन दोऊहाथ करैं तलवार १०१
घोड़ पपीहा की पीठिपर रूपन गरुदेय ललकार ॥
भाला छूटे असवारन के पैदलचलनलागितलवार १०२
गजके हौदा ते शर वर्षे नीचे करैं महावत मार ॥
कझा भिड़िगे तहँ घोड़न के अंकुशभिड़ेमहौतनक्यार १०३
पैदर के सँग पैदर भिड़िगे घोड़न साथ घोड़ असवार ॥
सूंदि लपेटा हाथी भिड़िगे हौदन होय तीर की मार १०४
चलैं कटारी कोनाखानी ऊना चलैं विलाइति केर ॥
लीन्हे भाला नागदवनि को मारैं एक एक को हेर १०५
झुके सिपाही नैनागढ़ के ऐंड़ा बेंड हनैं तलवार ॥
जोगा भोगा दोनों ठाकुर गरूई हाँक दीनललकार १०६
सदा न फूलै यह बन तोरई यारों सदा न सावन होय ॥
अम्मर देही नहिं मानुष कै मरिहै एकदिना सबकोय १०७
है मरदाना ज्यहि को बाना सो लड़ि मरै समर मैदान ॥