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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

आल्हाका विवाह । १३७ २१
गा नैपाली निज मंदिर को लश्कर खुशी बनाफरराय ८४
ऊदन बोले फिर मलखे ते दादा मोहबेके सरदार ॥
कूच करावो अब लश्कर को चलिकै लड़ैं तासुके द्वार ८५
यह मन भाई मलखाने के तुरतै कूच दीन करवाय ॥
कोउ कोउ घोड़ा हंसचाल पर कोउकोउ मोरचालपरजायँ ८६
चित्रचालपर चतुरचालपर कोईकोईचलैं तितुरकी चाल ॥
मारु मारु कै मौहरि बाजैं बाजैं हाव हाव करनाल ८७
बाजैं डंका अहतंका के घूमत जावैं लाल निशान ॥
छाय अँधेरिया गै दशहू दिशि छिपिगे अंधकार में भान ८८
मारु मारु करि क्षत्री बोलैं रणमें बड़े लड़ैता ज्वान ॥
घोड़ी कबुतरी के ऊपर माँ आगे चला बीर मलखान ८६
तीनकोस जब फाटक रहिगा तब पुरबासी उठे डेराय ॥
यक हरिकारा दौरति आवै राजै खबरि सुनाई आय ६०
सुनिकै बातें हरिकाराकी राजा मनै उठा अकुलाय ॥
जोगा भोगा तहँ बैठेथे बोले राजै शीश नवाय ६१
हुकुम जो पावैं महाराजा को डंका अबै देयँ बजवाय ॥
जाय न पावैं मोहबे वाले सबकी कटा लेयँ करवाय ६२
सुनिकै बातें ये लरिकन की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥
जोगा भोगा दोऊ चलिभे लश्कर तुरत पहुंचे आय ६३
बाजे डंका अहतंका के शङ्का करे कोऊ नहिं काल ॥
घोड़ आपनेपर चढ़िबैट्ठ्यो पूरन पटना को नरपाल ६४
जोगा भोगा घोड़े बैठे लश्कर कूच दीन करवाय ॥
बाजे डंका अहतंका के पहुँचे समरभूमि में आय ६५
आगे घोड़ाहै जोगा का पाछे सकल शूर मरदार ॥