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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

आल्हाका विवाह । १४३ २७
तम्बू गड़िगे महराजन के डेरा गड़े सिपाहिन केर ॥
आल्हा ऊदन के डेरे ते योजन एक कोस के नेर ७
किश्ती नावै तिहि नदिया में तामें नचैं कंचनी नाच ॥
आल्हा पकरै के कारण में ज्ञानिन युक्ति कीन यह साँच ८
दिखैं तमाशा तहँ नदिया में इत उत दोऊ दिशाके ज्वान ॥
आल्हा ठाकुर त्यहि समया में तहँ पर करै गये असनान ६
होनी होवै सो सच होवै ज्ञानी ध्यानी को दिखलाय ॥
कौन गुमानी अरमानी अस जानी मौत नहीं ज्यहिभाय १०
फिरि अभिमानी नर देही के नेही चरणशरण नहिंजायँ ॥
बिना पियारे रघुनन्दन के चन्दन कौन परै दिखराय ११
बन्दन करिकै रघुनन्दन कों आल्हा नदी अन्हाने जाय ॥
चन्दन अक्षत सों पूजन करि प्रातःकृत्य कीन हर्षाय १२
मेला दीख्यो फिरि नदिया में दोउदिशि रहे नारि नर हेर ॥
नावै किश्तिन के ऊपर में होवै नाच पतुरियन केर १३
दिखै तमाशा तहँ ठाढ़े भे ठाकुर मोहबे के सरदार ॥
नावै आई अरिनन्दन की तिनमाँ होवै अधिक बहार १४
तहँ हरिकारा नैनागढ़ को बोला अरिनन्दन सों बात ॥
नामी ठाकुर मोहबे वाले आये आल्हा क्यरी बरात १५
सुनिकै बातें हरिकारा की बोल्यो अरिनन्दन त्यहिकाल ॥
रहे सगाई देशराज सों आल्हा बड़े पियारे बाल १६
अयो बराते का तिनके हौ पैदल नाच दिखौ महिपाल ॥
सुनिकै बातें अरिनन्दन की बोले देशराज के लाल १७
कौनि सगाई देशराज सों साँचे हाल देव बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये आल्हा की कहअरिनन्दनबचन सुनाय १८